By Malay Ojha | Published: 02 July 2026 at 04:39 PM
लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा दिलाने की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल कर रहे सोनम वांगचुक के आंदोलन को अब राजनीतिक समर्थन भी मिलने लगा है। गुरुवार को सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने खुलकर वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के साथ खड़े होने का ऐलान किया। पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष धनंजय कुमार सिन्हा ने कहा कि उनकी पार्टी दोनों आंदोलनों का समर्थन करती है और सरकार को इन मुद्दों पर गंभीरता से फैसला लेना चाहिए।
सोशलिस्ट पार्टी ने किया खुला समर्थन
जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन के बीच सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष धनंजय कुमार सिन्हा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि सोनम वांगचुक जिस मुद्दे को लेकर संघर्ष कर रहे हैं, वह केवल लद्दाख का सवाल नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक सुरक्षा से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इस आंदोलन का समर्थन करती है।
धनंजय सिन्हा ने यह भी कहा कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रही कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के साथ भी सोशलिस्ट पार्टी मजबूती से खड़ी है। उनका कहना था कि जनता से जुड़े मुद्दों को दबाने के बजाय सरकार को बातचीत के जरिए समाधान निकालना चाहिए।
भूख हड़ताल का चौथा दिन, स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता
इस बीच सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल गुरुवार को चौथे दिन में पहुंच गई। आंदोलन से जुड़े लोगों के मुताबिक, अनशन शुरू होने के बाद उनका करीब दो किलोग्राम वजन कम हो चुका है। साथ ही उनका रक्तचाप लगातार नीचे जा रहा है, जिसे देखते हुए डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी सेहत पर नजर बनाए हुए है।
हालांकि स्वास्थ्य बिगड़ने की खबरों के बावजूद वांगचुक ने साफ कहा है कि वह अपनी मांगों से पीछे हटने वाले नहीं हैं। जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में छात्र, किसान, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक पहुंचकर उन्हें समर्थन दे रहे हैं।
‘मजबूरी में करना पड़ रहा है आंदोलन’
सोनम वांगचुक ने कहा कि वह दोबारा आंदोलन करने के पक्ष में नहीं थे। उन्हें उम्मीद थी कि सरकार के साथ बातचीत के जरिए समाधान निकल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से किए गए कई वादे पूरे नहीं हुए और बातचीत की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ सकी।
उन्होंने कहा कि अनशन करना किसी के लिए आसान नहीं होता, लेकिन जब सभी रास्ते बंद हो जाएं तो लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाना ही आखिरी विकल्प बचता है। वांगचुक ने कहा कि यदि जरूरत पड़ी तो वह अपने संघर्ष से पीछे नहीं हटेंगे।
क्या हैं आंदोलन की प्रमुख मांगें?
वांगचुक का कहना है कि लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत विशेष संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए। इसके अलावा उन्होंने लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और केंद्र शासित प्रदेश के लिए अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की भी मांग उठाई है।
उनका आरोप है कि इन मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन अब तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है।
सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप
वांगचुक ने कहा कि वर्ष दो हजार पच्चीस में हुए आंदोलन के दौरान उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था और कई महीने बाद रिहाई मिली। इसके बाद सरकार के साथ दो दौर की बातचीत हुई, जिससे उन्हें उम्मीद जगी थी कि समाधान निकलेगा।
उन्होंने आरोप लगाया कि बैठकों में बनी सहमति को लिखित रूप नहीं दिया गया और सरकार बार-बार अपने पुराने आश्वासनों से पीछे हटती रही। उनका कहना है कि इससे लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है।
संसद में चर्चा की उठाई मांग
सोनम वांगचुक ने कहा कि केवल किसी मंत्री के इस्तीफे से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने मांग की कि संसद के आगामी सत्र में लद्दाख के मुद्दे पर गंभीर चर्चा हो और सरकार स्पष्ट रूप से बताए कि आगे क्या कदम उठाए जाएंगे।
उन्होंने युवाओं से भी लोकतांत्रिक तरीके से संघर्ष जारी रखने की अपील करते हुए कहा कि न्याय के लिए आवाज उठाने से डरना नहीं चाहिए।
शिक्षा और पर्यावरण को बताया सबसे बड़ा मुद्दा
वांगचुक ने कहा कि उनका आंदोलन केवल लद्दाख तक सीमित नहीं है। शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पर्यावरण संरक्षण भी उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हैं। उनका कहना है कि लद्दाख देश की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील इलाका है। ऐसे में वहां के लोगों की चिंताओं का जल्द समाधान होना राष्ट्रीय हित में भी जरूरी है।
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