By Malay Ojha | Published: 02 July 2026 at 03:38 PM
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के गलत इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने एआई से तैयार किए गए फर्जी न्यायिक फैसलों का हवाला देने वाले राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण के आदेश को रद्द कर दिया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था में इस तरह का एआई इस्तेमाल ‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ जैसी अदृश्य और विनाशकारी गैस की तरह है, जो पूरी न्यायिक प्रक्रिया को दूषित कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एसेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स से जुड़े दिवालियापन मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में ऐसे पुराने फैसलों का हवाला दिया था, जो वास्तविकता में मौजूद ही नहीं थे। जांच में सामने आया कि ये कथित फैसले एआई टूल की मदद से तैयार किए गए थे। इसी आधार पर अदालत ने राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण, दोनों के आदेश रद्द कर दिए। साथ ही मामले की दोबारा सुनवाई कर वास्तविक तथ्यों और कानूनी रिकॉर्ड के आधार पर नया फैसला देने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों जताई चिंता?
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि अदालतों में एआई का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन इसका अनियंत्रित उपयोग न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। पीठ ने स्पष्ट किया कि तकनीक केवल एक सहायक साधन हो सकती है। अंतिम निर्णय, तथ्यों की जांच और कानून की व्याख्या का अधिकार हमेशा इंसान के हाथ में ही रहना चाहिए।
‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ से की तुलना
सुप्रीम कोर्ट की सबसे चर्चित टिप्पणी एआई की तुलना भोपाल गैस त्रासदी में इस्तेमाल हुई जहरीली गैस मिथाइल आइसोसाइनेट से करना रही। अदालत ने कहा कि एआई द्वारा तैयार की गई फर्जी और काल्पनिक कानूनी सामग्री भी उसी तरह अदृश्य खतरा पैदा करती है। जब तक इसकी पहचान होती है, तब तक यह न्यायिक प्रक्रिया और फैसले की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा चुकी होती है। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक फैसलों में झूठी सामग्री का प्रवेश पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा कर सकता है।
वकीलों और जजों दोनों को दी चेतावनी
सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई वकील बिना जांच किए एआई से तैयार फर्जी फैसलों का हवाला देता है, तो इसे पेशेवर कदाचार माना जाएगा। वहीं यदि कोई न्यायाधीश ऐसे अस्तित्वहीन फैसलों के आधार पर आदेश पारित करता है, तो यह भी गंभीर न्यायिक चूक होगी। अदालत ने कहा कि ऐसे किसी भी आदेश को कानून की नजर में वैध फैसला नहीं माना जाएगा और उसे रद्द किया जा सकता है।
बार काउंसिल को दिए अहम निर्देश
अदालत ने कहा कि न्यायालय आमतौर पर वकीलों की ओर से पेश किए गए फैसलों पर भरोसा करता है। यदि हर मामले में अदालत को प्रत्येक निर्णय की अलग-अलग जांच करनी पड़े तो न्यायिक प्रक्रिया काफी धीमी हो जाएगी। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वह एआई से जुड़े ऐसे मामलों को रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करे और जरूरत पड़ने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान बनाए।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एसेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स की निलंबित निदेशक पूजा रमेश सिंह की याचिका से जुड़ा था। उन्होंने राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें जम्मू-कश्मीर बैंक की याचिका स्वीकार करते हुए कंपनी के खिलाफ दिवालियापन की प्रक्रिया शुरू करने की मंजूरी दी गई थी। यह विवाद 200 करोड़ रुपये के कर्ज और उसकी कॉर्पोरेट गारंटी से जुड़ा था। बैंक का कहना था कि कंपनी की गारंटी अब भी प्रभावी है, जबकि कंपनी ने इसका विरोध किया था।
जांच में खुली एआई की बड़ी गलती
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के दौरान पाया कि न्यायाधिकरण ने अपने आदेश में जिन न्यायिक फैसलों का उल्लेख किया था, वे किसी भी कानूनी डेटाबेस में मौजूद नहीं थे। बाद में स्पष्ट हुआ कि वे एआई द्वारा तैयार किए गए काल्पनिक उदाहरण थे। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक व्यवस्था में एआई का इस्तेमाल तभी स्वीकार्य है, जब हर स्तर पर इंसानी निगरानी बनी रहे और सभी तथ्यों का स्वतंत्र सत्यापन किया जाए।
कोर्ट का साफ संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एआई आने वाले समय में न्यायिक व्यवस्था का सहायक उपकरण बन सकता है, लेकिन यदि इस पर पूरी तरह निर्भरता बढ़ी तो यह न्याय की निष्पक्षता और विश्वसनीयता के लिए खतरा बन जाएगा। अदालत ने दोहराया कि तकनीक इंसानों की मदद के लिए है, उनकी जगह लेने के लिए नहीं। न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने के लिए हर दस्तावेज और हर कानूनी उदाहरण की जांच अनिवार्य है।
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