By Malay Ojha | Published: 22 June 2026 at 01:12 PM
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी तेज हो चुकी है और इसी बीच बसपा प्रमुख मायावती ने बड़ा सियासी दांव चल दिया है। मायावती ने साफ संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी इस बार फिर ब्राह्मण समाज पर खास फोकस कर रही है। उन्होंने दावा किया है कि यह रणनीति विपक्ष, खासकर समाजवादी पार्टी की बेचैनी बढ़ा रही है और 2007 जैसा चुनावी परिणाम दोहराया जा सकता है।
बसपा प्रमुख मायावती ने सोमवार को सोशल मीडिया पर एक के बाद एक पोस्ट कर अपनी रणनीति साफ कर दी। उन्होंने कहा कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए ब्राह्मण समाज के लोगों को उम्मीदवार बना रही है। यह सिर्फ टिकट बांटने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक समीकरण तैयार करने की कोशिश है।
समाजवादी पार्टी पर साधा निशाना
मायावती ने दावा किया कि बसपा की इस रणनीति से सबसे ज्यादा बेचैनी समाजवादी पार्टी में दिखाई दे रही है। उनका कहना है कि विपक्ष को यह डर सता रहा है कि अगर ब्राह्मण समाज फिर बसपा के साथ मजबूती से खड़ा हो गया तो सत्ता का समीकरण पूरी तरह बदल सकता है।
2007 की जीत का दिलाया याद
मायावती ने अपने बयान में वर्ष 2007 का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उस चुनाव में ब्राह्मण समाज के समर्थन ने बसपा को पूर्ण बहुमत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। अब पार्टी उसी सामाजिक गठजोड़ को दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
‘ब्राह्मणों का हित बसपा में सुरक्षित’
बसपा प्रमुख ने कहा कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ब्राह्मण समाज का सम्मान और हित बसपा में सबसे ज्यादा सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने हमेशा ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की नीति पर काम किया है और सरकार में रहते हुए हर वर्ग को बराबर भागीदारी दी।
दूसरी पार्टियों पर उपेक्षा का आरोप
मायावती ने बिना नाम लिए अन्य दलों पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि दूसरी सरकारों में ब्राह्मण समाज ने खुद को उपेक्षित, असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस किया है। यही वजह है कि अब यह वर्ग नए विकल्प की तलाश में है और बसपा की ओर देख रहा है।
उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया जारी
मायावती ने कहा कि पार्टी लगातार ब्राह्मण समाज से आने वाले चेहरों को टिकट देने की प्रक्रिया में है। उन्होंने भरोसा जताया कि अगर बसपा सत्ता में आती है तो पहले की तरह इस वर्ग को पूरा सम्मान और भागीदारी मिलेगी।
यूपी की सियासत में बदलेंगे समीकरण?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर बसपा ब्राह्मण और दलित समीकरण को फिर से मजबूत करने में सफल होती है तो यह चुनावी लड़ाई को पूरी तरह बदल सकता है। खासकर तब, जब राज्य में जातीय समीकरण पहले से ही बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।
क्या 2027 में लौटेगा पुराना फॉर्मूला?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मायावती का यह नया दांव 2007 की तरह असर दिखा पाएगा या फिर बदलते राजनीतिक हालात में यह रणनीति कमजोर पड़ जाएगी। आने वाले महीनों में इसका असर साफ दिख सकता है।
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