By Malay Ojha | Published: 25 June 2026 at 09:55 PM
भोजपुर के भरत भूषण तिवारी की कथित पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कई वीडियो अब सवालों के घेरे में हैं। करोड़ों बार देखे जा चुके जिन वीडियो को लोग असली एनकाउंटर या आखिरी पलों की रिकॉर्डिंग समझकर शेयर कर रहे हैं, उनमें से कई वीडियो स्क्रिप्टेड, रीक्रिएटेड या भ्रामक बताए जा रहे हैं। मामले ने अब सिर्फ एनकाउंटर की बहस ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर वायरल कंटेंट की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा जिस वीडियो की हो रही है, उसमें छह हथियारबंद पुलिसकर्मियों के सामने एक व्यक्ति खड़ा दिखाई देता है और गोली चलने जैसी आवाज सुनाई देती है। वीडियो देखने वालों को यह किसी वास्तविक मुठभेड़ का दृश्य लगता है। लेकिन पड़ताल में सामने आया कि वीडियो में इस्तेमाल की गई आवाज भरत तिवारी के पुराने लाइव प्रसारण से ली गई है, जबकि बाकी दृश्य कथित तौर पर अलग से तैयार किए गए हैं।
कंटेंट क्रिएटर्स ने भुनाई लोगों की उत्सुकता
भरत तिवारी की मौत के बाद इंटरनेट पर ऐसे वीडियो की बाढ़ आ गई है जिनका उद्देश्य जानकारी देने से ज्यादा लोगों की जिज्ञासा का फायदा उठाना दिखाई देता है। कई कंटेंट क्रिएटर्स ने कथित एनकाउंटर, गिरफ्तारी और आखिरी पलों के नाम पर वीडियो तैयार किए, जिन्हें लाखों और करोड़ों बार देखा गया। इससे उनकी पहुंच और लोकप्रियता में अचानक बढ़ोतरी दर्ज की गई।
एक और वीडियो ने बटोरे करोड़ों व्यूज
एक अन्य वायरल वीडियो में भरत तिवारी की भूमिका निभाने वाला एक व्यक्ति छत पर खड़ा दिखाई देता है और नीचे मौजूद लोगों की ओर हथियार ताने नजर आता है। उसके साथ एक महिला भी दिखाई देती है, जिसे दर्शकों के बीच भरत की मां के रूप में पेश किया गया। इस वीडियो को भी करोड़ों लोगों ने देखा और बड़ी संख्या में साझा किया।
रातोंरात बढ़ी कई पेजों की लोकप्रियता
भरत तिवारी मामले से जुड़े वीडियो अपलोड करने के बाद कई सोशल मीडिया पेजों और खातों के व्यूज में अचानक उछाल देखा गया। कुछ ऐसे पेज, जिनके पुराने वीडियो मुश्किल से हजारों लोगों तक पहुंचते थे, उन्हें एक ही वीडियो पर लाखों और करोड़ों दर्शक मिल गए। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या चर्चित घटनाओं को आधार बनाकर दर्शकों की भावनाओं और उत्सुकता को व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
व्यूज के साथ कमाई का भी खेल
सोशल मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि अधिक व्यूज मिलने से कई कंटेंट निर्माताओं को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ भी होता है। कुछ मंचों पर सदस्यता आधारित सुविधाएं उपलब्ध हैं, जहां दर्शकों की संख्या बढ़ने के साथ आय बढ़ने की संभावना रहती है। यही वजह है कि चर्चित मामलों पर तेजी से वीडियो बनाने की होड़ देखने को मिलती है।
गानों और नाटकीय प्रस्तुतियों की भी भरमार
यह मामला सिर्फ वीडियो तक सीमित नहीं रहा। भरत तिवारी की मौत के बाद कई लोकगीत, बिरहा, वीर रस और अन्य शैली के गीत भी सामने आए। कुछ रचनाकारों ने पूरे घटनाक्रम को गीतों और नाटकीय प्रस्तुतियों के रूप में पेश किया। इन गीतों और वीडियो को भी बड़ी संख्या में लोगों ने देखा और साझा किया।
झूठे दावों के साथ वायरल हुए कई वीडियो
मामले से जुड़े कई वीडियो ऐसे भी सामने आए जिन्हें भरत तिवारी का अंतिम संस्कार, आखिरी वीडियो या कथित मुठभेड़ का दृश्य बताकर प्रसारित किया गया। बाद में जांच और तथ्य जांच करने वाले मंचों ने पाया कि इनमें से कई वीडियो किसी दूसरी घटना से जुड़े थे। इसके बावजूद वे भरत तिवारी के नाम पर तेजी से वायरल होते रहे।
कौन थे भरत तिवारी?
भरत तिवारी खुद को समाजसेवा से जुड़ा व्यक्ति बताते थे और सोशल मीडिया पर नियमित रूप से लाइव प्रसारण करते थे। स्थानीय मुद्दों पर अपनी बात रखने के कारण वह इंटरनेट पर एक पहचान बना चुके थे। उनकी मौत के बाद उनसे जुड़े पुराने वीडियो और तस्वीरें फिर से चर्चा में आ गईं।
मौत के बाद भी जारी है ‘डिजिटल मौजूदगी’
विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति की मौत पर बहस चल रही है, उसी के नाम पर इंटरनेट पर लगातार नया कंटेंट तैयार किया जा रहा है। कई वीडियो में भरत तिवारी को काल्पनिक परिस्थितियों में दिखाया जा रहा है। इससे एक तरफ लोगों की जिज्ञासा बढ़ रही है तो दूसरी तरफ तथ्य और कल्पना के बीच की रेखा भी धुंधली होती जा रही है।
सोशल मीडिया के दौर का बड़ा सवाल
भरत तिवारी प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वायरल हो रहे वीडियो पर आंख बंद करके भरोसा करना कितना खतरनाक हो सकता है। किसी भी संवेदनशील घटना के बाद तेजी से फैलने वाले कंटेंट में सच और झूठ का फर्क समझना पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।
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