By Malay Ojha | Published: 26 June 2026 at 02:29 PM
भोजपुर के भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक दबाव के बीच बिहार पुलिस पूरी तरह बैकफुट पर नजर आ रही है। महज 36 घंटे के भीतर सरकार और पुलिस को तीन बड़े फैसले लेने पड़े हैं। मामले ने तूल पकड़ा तो अब खुद भोजपुर के पुलिस अधीक्षक पीड़ित परिवार से मिलने उनके घर पहुंचे और निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया।
भरत तिवारी के परिजनों की शिकायत के आधार पर सात दिन बाद आखिरकार पुलिस अधिकारियों पर मामला दर्ज कर लिया गया। भोजपुर के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी और शाहपुर थाना प्रभारी के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है। इस कार्रवाई को पूरे मामले का सबसे बड़ा मोड़ माना जा रहा है। अब जांच शुरू हो गई है और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।
एसडीपीओ का तबादला, मुख्यालय से अटैच
मामले में लगातार उठ रहे सवालों के बीच बिहार सरकार ने भोजपुर के एसडीपीओ को उनके पद से हटाकर पुलिस मुख्यालय से अटैच कर दिया है। एनकाउंटर के बाद से ही सबसे ज्यादा सवाल इसी अधिकारी की भूमिका को लेकर उठ रहे थे। विपक्षी दलों के साथ-साथ सामाजिक संगठनों ने भी उनकी भूमिका की जांच की मांग की थी।
भरत के पिता और भाई को मिली राहत
एनकाउंटर के बाद पुलिस ने भरत तिवारी के पिता और भाई के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया था। आरोप लगाया गया था कि दोनों ने भरत के पास मौजूद अवैध हथियार को छिपाने में मदद की थी। हालांकि अब पुलिस ने अपने ही फैसले से पीछे हटते हुए दोनों के नाम मुकदमे से हटा दिए हैं। इसे भी पुलिस का बड़ा यू-टर्न माना जा रहा है।
क्या हुआ था 17 जून को?
17 जून को शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौटी गांव निवासी भरत भूषण तिवारी की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो गई थी। पुलिस का दावा था कि भरत के पास हथियार था और उसने भागने की कोशिश की थी। दूसरी ओर परिवार का आरोप है कि पुलिस पहले उसे घर से पकड़कर ले गई और बाद में फर्जी मुठभेड़ दिखाकर उसकी हत्या कर दी गई।
वायरल वीडियो ने बढ़ा दिया विवाद
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया। वीडियो में भरत तिवारी को कथित तौर पर हथियार फेंकते हुए देखा गया। इसके बाद सवाल उठने लगे कि आखिर एनकाउंटर की जरूरत क्यों पड़ी। इसी वीडियो के बाद फर्जी एनकाउंटर के आरोप तेज हो गए और पुलिस की कार्रवाई कटघरे में आ गई।
सरकार के भीतर भी उठने लगे सवाल
इस मामले पर सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के नेताओं ने भी सवाल खड़े किए। पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की और पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए। इसके बाद मामला राजनीतिक रूप से और ज्यादा संवेदनशील हो गया।
ब्राह्मण समाज की नाराजगी ने बढ़ाई चिंता
भरत तिवारी मामले को लेकर शहाबाद क्षेत्र समेत राज्यभर में ब्राह्मण समाज के लोग खुलकर सामने आए। कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन और न्याय की मांग की गई। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बिहार में ब्राह्मण मतदाता कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं, ऐसे में सरकार इस मामले को लेकर कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।
मुख्यमंत्री ने न्यायिक जांच के दिए आदेश
विवाद बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री ने खुद मामले का संज्ञान लिया और पटना उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश से पूरे मामले की जांच कराने का फैसला किया। सरकार ने साफ कहा है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट पर
फिलहाल भरत तिवारी एनकाउंटर मामला बिहार की राजनीति और पुलिस व्यवस्था दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। पुलिस के लगातार बदलते रुख ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अब पूरे राज्य की नजर न्यायिक जांच और उसकी रिपोर्ट पर टिकी हुई है।
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