By Malay Ojha | Published: 03 August 2026 at 06:18 PM
बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की भूमिका अब सिर्फ चुनावी रणनीतिकार या बाहर से सरकार पर सवाल उठाने वाले नेता की नहीं रहने वाली है। बांकीपुर उपचुनाव जीतने के बाद वह पहली बार बिहार विधानसभा में पहुंचने जा रहे हैं। जन सुराज के इकलौते विधायक के तौर पर उनकी एंट्री ऐसे समय हो रही है, जब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार को लेकर वह पहले ही अपने तेवर साफ कर चुके हैं। उनका जोर शिक्षा, रोजगार, पलायन रोकने और बेहतर शासन पर है।
बांकीपुर में जीत की ओर बढ़ने के बाद प्रशांत किशोर ने अपने पहले बयान में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अगर बिहार की सत्ता किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में होगी, जिस पर गंभीर सवाल उठते हैं, तो राज्य का विकास मुश्किल होगा। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि बहुमत भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पास है, इसलिए मुख्यमंत्री भी उसी खेमे से होगा। उनका आग्रह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से है कि बिहार को ऐसा मुख्यमंत्री मिले, जो ईमानदार, सक्षम और बेहतर चरित्र वाला हो।
अब प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, सदन में आमना-सामना होगा
प्रशांत किशोर की राजनीति के लिए यह बदलाव बेहद अहम है। अब तक वह सभाओं, यात्राओं और प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए सरकार और राजनीतिक दलों पर सवाल उठाते रहे हैं। लेकिन विधानसभा पहुंचने के बाद उनके सवाल सदन की कार्यवाही का हिस्सा होंगे। सबसे दिलचस्प बात यह होगी कि जिन मुद्दों पर वह लंबे समय से सम्राट चौधरी को घेरते रहे हैं, उन्हीं सवालों पर अब मुख्यमंत्री को सदन के भीतर जवाब देना पड़ सकता है।
नौ महीने में बिहार की राजनीति का बदला समीकरण
कुछ समय पहले तक बिहार की राजनीति की तस्वीर बिल्कुल अलग थी। उस समय नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे और प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज विधानसभा चुनाव में खाता खोलने में भी कामयाब नहीं हुई थी। अब स्थिति बदल चुकी है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर सम्राट चौधरी हैं और प्रशांत किशोर खुद चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच चुके हैं। यानी जिस नेता को कुछ समय पहले तक सिर्फ चुनावी रणनीति बनाने वाला चेहरा माना जाता था, अब वह खुद कानून बनाने वाली संस्था का हिस्सा बनने जा रहा है।
2025 के चुनाव में खुद नहीं लड़े, इस बार सीधे मैदान में उतरे
प्रशांत किशोर की राजनीति में बांकीपुर की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ा था। उस समय जन सुराज के उम्मीदवारों को लेकर मतदाताओं के बीच यह सवाल भी उठा था कि पार्टी का नेतृत्व करने वाला चेहरा खुद चुनावी मैदान से दूर क्यों है। इस बार प्रशांत किशोर ने यह जोखिम खुद उठाया। उन्होंने बांकीपुर से चुनाव लड़ा, प्रचार किया और जीत हासिल की। इससे जन सुराज को पहली बार विधानसभा में अपना निर्वाचित चेहरा मिल गया है।
भाजपा के मजबूत गढ़ में मिली जीत ने बढ़ाई चर्चा
बांकीपुर की जीत को सिर्फ एक उपचुनाव का नतीजा मानना प्रशांत किशोर की राजनीति को छोटा करके देखने जैसा होगा। यह सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी के मजबूत इलाकों में गिनी जाती रही है। नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद खाली हुई इस सीट को भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल माना जा रहा था। लेकिन चुनाव परिणाम ने पार्टी के इस भरोसे को बड़ा झटका दिया कि बांकीपुर में उसका संगठन और परंपरागत समर्थन उसे आसानी से जीत दिला देगा।
भाजपा की रणनीति पर भी उठे सवाल
चुनाव के दौरान उम्मीदवार चयन को लेकर असंतोष की खबरें सामने आईं। इसके अलावा पार्टी के भीतर यह भरोसा भी दिखाई दिया कि बांकीपुर में जीत लगभग तय है। वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद के उस बयान की भी खूब चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि भाजपा यहां किसी को भी टिकट दे दे, जीत सकती है। चुनाव परिणाम के बाद यही बयान पार्टी के अति आत्मविश्वास के उदाहरण के तौर पर देखा गया। राजनीति में कई बार विपक्ष की रणनीति से ज्यादा अपने ही दल का आत्मविश्वास हार की वजह बन जाता है।
अब अकेले विधायक हैं, लेकिन आवाज छोटी नहीं होगी
बिहार विधानसभा में जन सुराज के पास फिलहाल सिर्फ एक विधायक होगा। संख्या के लिहाज से यह बेहद छोटी राजनीतिक ताकत है। भाजपा, राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड जैसे बड़े दलों के मुकाबले प्रशांत किशोर के पास न तो संख्या होगी और न ही संसदीय ताकत। लेकिन उनकी राजनीति का असर सिर्फ संख्या से तय नहीं होगा। अगर वह सदन में लगातार ऐसे मुद्दे उठाते हैं, जिनका सीधा संबंध आम लोगों की जिंदगी से है, तो उनकी आवाज राजनीतिक रूप से काफी प्रभावी हो सकती है।
शिक्षा और रोजगार से लेकर पलायन तक उठेंगे सवाल
प्रशांत किशोर ने अपनी राजनीतिक यात्रा के दौरान शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और बिहार से होने वाले पलायन को प्रमुख मुद्दा बनाया है। अब विधानसभा में उनके सामने इन मुद्दों को सिर्फ भाषण तक सीमित रखने के बजाय सरकार से जवाब मांगने की जिम्मेदारी होगी। सरकारी स्कूलों की स्थिति, स्वास्थ्य व्यवस्था, युवाओं को रोजगार, शराबबंदी, सरकारी योजनाओं का जमीन पर असर और बिहार से युवाओं का बाहर जाना जैसे सवाल उनकी राजनीति के केंद्र में रह सकते हैं।
आंकड़ों के साथ सरकार को घेरने की होगी कोशिश
प्रशांत किशोर की एक अलग पहचान यह भी रही है कि वह अपने राजनीतिक तर्कों को आंकड़ों और सर्वे के सहारे रखने की कोशिश करते हैं। चुनावी रणनीतिकार के तौर पर उन्होंने लंबे समय तक अलग-अलग राज्यों की राजनीति और सरकारी योजनाओं का अध्ययन किया है। अब अगर वह इसी शैली को विधानसभा में लेकर आते हैं, तो सरकार के लिए उनके सवालों का जवाब देना आसान नहीं होगा। सदन में सिर्फ राजनीतिक आरोप लगाने के बजाय आंकड़ों के साथ सवाल उठाना उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।
सम्राट चौधरी सरकार के सामने पहली बड़ी चुनौती
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए प्रशांत किशोर की विधानसभा में मौजूदगी इसलिए भी अहम होगी क्योंकि दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेद पहले से सार्वजनिक हैं। प्रशांत किशोर लगातार सरकार की कार्यशैली और मुख्यमंत्री के राजनीतिक व्यक्तित्व पर सवाल उठाते रहे हैं। अब मुख्यमंत्री को उन्हीं सवालों का जवाब सदन के भीतर देना होगा। ऐसे में आने वाले विधानसभा सत्रों में दोनों के बीच राजनीतिक टकराव बिहार की राजनीति का बड़ा आकर्षण बन सकता है।
तेजस्वी यादव के लिए भी आसान नहीं होगी नई चुनौती
प्रशांत किशोर की मौजूदगी का असर सिर्फ सत्ता पक्ष पर नहीं पड़ेगा। मुख्य विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव के सामने भी एक नई चुनौती खड़ी हो सकती है। अब तक सरकार के खिलाफ विपक्ष की सबसे प्रमुख आवाज तेजस्वी यादव रहे हैं। लेकिन विधानसभा में अगर प्रशांत किशोर भी लगातार सरकार को घेरते हैं, तो मीडिया और जनता की नजर इस बात पर होगी कि सरकार को ज्यादा मुश्किल सवाल कौन पूछ रहा है।
पीके की राजनीति राजद को भी घेरेगी?
प्रशांत किशोर खुद को सिर्फ सरकार विरोधी नेता के तौर पर पेश नहीं करते। उनकी राजनीति का निशाना बिहार की पूरी राजनीतिक व्यवस्था रही है। यही वजह है कि सदन में वह सरकार के साथ-साथ विपक्षी दलों से भी सवाल कर सकते हैं। शिक्षा, रोजगार, पलायन और प्रशासन की बदहाली जैसे मुद्दों पर वह यह सवाल उठा सकते हैं कि इन समस्याओं के लिए पिछली सरकारें कितनी जिम्मेदार रही हैं। ऐसे में उनकी राजनीति का असर राजद पर भी पड़ सकता है।
बिहार विधानसभा में बन सकता है नया राजनीतिक त्रिकोण
आने वाले दिनों में बिहार विधानसभा में एक दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर देखने को मिल सकती है। एक तरफ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार होगी, दूसरी तरफ मुख्य विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव और इनके बीच जन सुराज के इकलौते विधायक प्रशांत किशोर। संख्या के लिहाज से वह अकेले होंगे, लेकिन अगर उन्होंने अपने मुद्दों को लगातार जनता से जोड़कर रखा, तो उनकी राजनीतिक मौजूदगी उनकी संख्या से कहीं बड़ी हो सकती है।
अब बांकीपुर की जनता भी मांगेगी हिसाब
हालांकि प्रशांत किशोर के सामने सबसे बड़ी चुनौती विधानसभा से बाहर उनके अपने क्षेत्र में होगी। बांकीपुर के मतदाता अब उनसे सड़क, नाली, बिजली, पानी, जलजमाव, स्वास्थ्य और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों पर काम की उम्मीद करेंगे। अब उनके लिए सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि व्यवस्था खराब है। उन्हें यह भी बताना होगा कि विधायक बनने के बाद उन्होंने व्यवस्था बदलने के लिए क्या कदम उठाए।
जीत के बाद शुरू हुई असली परीक्षा
बांकीपुर का चुनाव जीतना प्रशांत किशोर के लिए बड़ी राजनीतिक उपलब्धि जरूर है, लेकिन उनकी असली परीक्षा अब शुरू होगी। अगर वह विधानसभा में तथ्य और आंकड़ों के साथ सरकार को घेरते हैं, अपने क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं और बिहार की राजनीति में शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों को लगातार केंद्र में रखते हैं, तो जन सुराज को एक गंभीर राजनीतिक विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है।
लेकिन अगर उनकी राजनीति सिर्फ बयानों और सुर्खियों तक सीमित रही, तो उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या एक सफल चुनावी रणनीतिकार एक प्रभावी जनप्रतिनिधि भी बन पाया? बांकीपुर की जीत ने प्रशांत किशोर को विधानसभा तक पहुंचा दिया है। अब आने वाला समय तय करेगा कि वह सदन के भीतर अपनी जगह बनाते हैं या बिहार की राजनीति में सिर्फ एक और चर्चित चेहरा बनकर रह जाते हैं।
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