By Malay Ojha | Published: 13 August 2026 at 03:38 PM
पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को लेकर छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों का विरोध अब और तेज होता दिख रहा है। पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 को समाप्त करने के प्रस्ताव के खिलाफ पटना कॉलेज कैंटीन के सामने आइसा की पटना विश्वविद्यालय इकाई ने छात्र-शिक्षक-कर्मचारी परिचर्चा आयोजित की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्रों ने हिस्सा लिया और विश्वविद्यालय की मौजूदा स्वायत्त व्यवस्था को बनाए रखने की मांग उठाई। आइसा ने साफ कहा कि इस मुद्दे पर ‘सेव पटना यूनिवर्सिटी’ अभियान को अब और व्यापक किया जाएगा।
बिहार सरकार की प्रस्तावित नई विश्वविद्यालय व्यवस्था को लेकर पटना विश्वविद्यालय में पहले से ही विरोध सामने आ रहा है। प्रस्तावित बदलाव में डिग्री कॉलेजों की प्रशासनिक व्यवस्था को विश्वविद्यालयों से अलग कर उच्च शिक्षा विभाग के सीधे नियंत्रण में लाने की बात कही गई है। इसी बदलाव को लेकर पटना विश्वविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी और छात्र विश्वविद्यालय की मौजूदा पहचान और स्वायत्तता को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
परिचर्चा में छात्रों ने रखी अपनी बात
आइसा की ओर से आयोजित परिचर्चा में पटना कॉलेज और वाणिज्य महाविद्यालय के छात्रों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम का संचालन पटना विश्वविद्यालय इकाई की सचिव सबा आफ़रीन ने किया। चर्चा के दौरान वक्ताओं ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई कराने वाली संस्था नहीं है, बल्कि छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों की भागीदारी से चलने वाला लोकतांत्रिक संस्थान भी है।
कर्मचारी संघ ने छात्र एकता को बताया जरूरी
पटना विश्वविद्यालय कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सुबोध ने कहा कि पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और उसके लोकतांत्रिक स्वरूप के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कामकाज को पूरी तरह नौकरशाही के नियंत्रण में ले जाने से उच्च शिक्षा की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने कहा कि इस लड़ाई को सिर्फ छात्रों या कर्मचारियों की लड़ाई मानकर नहीं चलना चाहिए। छात्र, शिक्षक और कर्मचारी अगर एक साथ खड़े होते हैं तो विश्वविद्यालय की स्वायत्तता से जुड़े सवाल को मजबूती से उठाया जा सकता है। उन्होंने सभी वर्गों से साझा आंदोलन को आगे बढ़ाने की अपील की।
‘केंद्रीकरण’ के खिलाफ व्यापक आंदोलन की अपील
एआईसीसीटीयू नेता और पटना विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रणविजय ने भी विश्वविद्यालयों में बढ़ते केंद्रीकरण पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षा से जुड़े फैसलों में विश्वविद्यालयों की आंतरिक संस्थाओं और अकादमिक समुदाय की भूमिका बनी रहनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों के ढांचे में होने वाले किसी भी बड़े बदलाव का असर सिर्फ शिक्षकों और कर्मचारियों पर नहीं पड़ता, बल्कि उसका सीधा असर छात्रों की पढ़ाई, शोध और भविष्य पर भी पड़ता है। ऐसे में इस मुद्दे पर व्यापक जनप्रतिरोध खड़ा करने की जरूरत है।
आइसा ने कहा- विश्वविद्यालय सरकारी विभाग नहीं
परिचर्चा को संबोधित करते हुए आइसा नेताओं सबा आफ़रीन, आदर्श, आशीष, अनुज और आज़ाद ने कहा कि विश्वविद्यालय को किसी सरकारी विभाग के विस्तार के रूप में नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार, विश्वविद्यालय की अपनी अकादमिक परंपरा, संस्थागत व्यवस्था और लोकतांत्रिक प्रक्रिया होती है, जिसे कमजोर करने वाले किसी भी कदम का विरोध किया जाएगा।
वक्ताओं ने कहा कि पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का सवाल केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है। अगर विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक अधिकार लगातार कम किए जाते हैं, तो इसका असर बिहार की पूरी उच्च शिक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है।
1976 का कानून क्यों है अहम?
पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 पटना विश्वविद्यालय की प्रशासनिक और अकादमिक व्यवस्था का प्रमुख कानूनी आधार है। इस कानून में विश्वविद्यालय के विभिन्न निकायों, अधिकारियों, शिक्षकों और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े प्रावधान हैं। कानून में सीनेट, सिंडिकेट और अकादमिक परिषद जैसी संस्थाओं की भूमिका भी तय की गई है।
राजभवन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी पटना विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 को विश्वविद्यालय कानूनों की सूची में रखा गया है। इसके तहत समय-समय पर विभिन्न नियम और प्रावधान लागू होते रहे हैं।
पहले भी हो चुका है आंदोलन
विश्वविद्यालय के ढांचे में प्रस्तावित बदलावों के खिलाफ जुलाई में भी पटना विश्वविद्यालय में शिक्षक, कर्मचारी और छात्र आंदोलन कर चुके हैं। उस दौरान शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों ने सामूहिक आकस्मिक अवकाश लेकर विरोध जताया था। विश्वविद्यालय मुख्यालय पर प्रदर्शन के साथ मानव शृंखला और हस्ताक्षर अभियान भी चलाया गया था। प्रदर्शनकारियों ने प्रस्तावित बदलावों को विश्वविद्यालय की अलग पहचान और स्वायत्तता के लिए चुनौती बताया था।
‘सेव पटना यूनिवर्सिटी’ अभियान होगा तेज
आइसा ने अब इस मुद्दे को विश्वविद्यालय परिसर से बाहर भी व्यापक स्तर पर उठाने का संकेत दिया है। संगठन ने कहा कि “एक इंच पीछे नहीं हटेंगे, पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता की गारंटी लेकर रहेंगे”** के संकल्प के साथ ‘सेव पटना यूनिवर्सिटी’ अभियान को आगे बढ़ाया जाएगा।
कार्यक्रम में पटना विश्वविद्यालय इकाई की सचिव सबा आफ़रीन, उपाध्यक्ष आशीष, पटना कॉलेज सचिव आदर्श, दरभंगा हाउस अध्यक्ष आज़ाद के अलावा मोनू, रोहन, अनुज, विवेक आनंद सुंदर, अमृता, शीनू और जुनैद समेत कई छात्र कार्यकर्ता मौजूद रहे।
अब आगे क्या होगा?
परिचर्चा के बाद साफ है कि पटना विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का मुद्दा आने वाले दिनों में छात्र राजनीति के साथ-साथ विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी संगठनों के बीच भी बड़ा मुद्दा बन सकता है। एक तरफ सरकार उच्च शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है, वहीं विश्वविद्यालय समुदाय अपने अधिकारों और संस्थागत स्वायत्तता को लेकर विरोध तेज करने की तैयारी में है। ऐसे में आने वाले दिनों में ‘सेव पटना यूनिवर्सिटी’ अभियान की अगली रणनीति पर सबकी नजर रहेगी।
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