By Malay Ojha | Published: 22 August 2026 at 10:36 AM
समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के ‘चवन्नी से रुपया’ वाले बयान को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में घमासान बढ़ता जा रहा है। राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी की आपत्ति के बाद अब बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती भी इस विवाद में खुलकर उतर आई हैं। मायावती ने अखिलेश के बयान को अमर्यादित, अशोभनीय और अहंकारी बताते हुए उनसे जयंत चौधरी के साथ-साथ पूरे जाट समाज से माफी मांगने की मांग की है।
मायावती ने शनिवार को सोशल मीडिया पर लंबी पोस्ट के जरिए अखिलेश यादव पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि किसी राजनीतिक सहयोगी के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है। उनका कहना है कि यह मामला केवल जयंत चौधरी या राष्ट्रीय लोकदल तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे चौधरी चरण सिंह के परिवार और जाट समाज की भावनाएं भी जुड़ी हैं।
‘चवन्नी से रुपया’ पर शुरू हुआ विवाद
दरअसल, अखिलेश यादव ने हाल में एक कार्यक्रम में पुराने गठबंधन सहयोगियों पर निशाना साधते हुए कहा था कि उनकी पार्टी ने कुछ लोगों को ‘चवन्नी का रुपया’ बना दिया, लेकिन इसके बावजूद वे समाजवादी पार्टी का साथ छोड़कर चले गए। अखिलेश ने किसी का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया था, लेकिन उनके बयान को राष्ट्रीय लोकदल और जयंत चौधरी से जोड़कर देखा गया। इसके बाद रालोद की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई।
जयंत के बाद मायावती की एंट्री
इस विवाद में जयंत चौधरी पहले ही अखिलेश यादव को जवाब दे चुके हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी ताकत है और वही किसी को बनाती या बिगाड़ती है। इसके बाद अब मायावती के बयान ने विवाद को और बड़ा राजनीतिक रंग दे दिया है।
‘अखिलेश को तुरंत माफी मांगनी चाहिए’
मायावती ने कहा कि इस तरह की टिप्पणी के लिए अखिलेश यादव को राष्ट्रीय लोकदल और उसके नेता से माफी मांगनी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने चौधरी चरण सिंह के परिवार का अपमान किए जाने की बात कहते हुए पूरे जाट समाज से भी माफी मांगने को कहा। मायावती के मुताबिक राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन विरोधियों और सहयोगियों के लिए भाषा की एक मर्यादा होनी चाहिए।
सपा की राजनीति पर भी मायावती का हमला
बसपा प्रमुख ने इस बहाने समाजवादी पार्टी की पुरानी राजनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा का राजनीतिक रवैया केवल विरोधी दलों के साथ ही नहीं, बल्कि उसके पुराने सहयोगियों के साथ भी कई बार संकीर्ण और अविश्वसनीय रहा है। मायावती का दावा है कि ऐसे राजनीतिक विवादों का फायदा कई मौकों पर भारतीय जनता पार्टी को मिला और विपक्षी ताकतें कमजोर हुईं।
1993 के गठबंधन से लेकर गेस्ट हाउस कांड तक का जिक्र
मायावती ने अपने बयान में समाजवादी पार्टी और बसपा के पुराने रिश्तों का भी जिक्र किया। उन्होंने 1993 में मुलायम सिंह यादव के साथ हुए सपा-बसपा गठबंधन और उसके बाद रिश्तों में आई दरार को याद किया। इसके बाद 2 जून 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड का उल्लेख करते हुए उन्होंने सपा पर गंभीर आरोप लगाए। मायावती ने कहा कि गठबंधन टूटने के बाद उनके खिलाफ हुई उस घटना को वह आज भी नहीं भूली हैं।
अखिलेश के साथ गठबंधन का भी याद दिलाया इतिहास
मायावती ने अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुए सपा-बसपा गठबंधन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान दोनों दल साथ आए थे और उस समय अखिलेश यादव की ओर से पुराने विवाद दोबारा नहीं दोहराने का भरोसा दिया गया था। हालांकि चुनावी नतीजों के बाद दोनों दलों का गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चल सका। मायावती ने इसके लिए समाजवादी पार्टी के रवैये को जिम्मेदार ठहराया।
‘सपा काम निकलते ही रंग बदल लेती है’
बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी गठबंधन की राजनीति में अपने राजनीतिक फायदे को प्राथमिकता देती है। उन्होंने कहा कि सपा को जब किसी दल या नेता की जरूरत होती है तो वह उसके साथ खड़ी दिखाई देती है, लेकिन राजनीतिक जरूरत खत्म होने के बाद वही सहयोगी निशाने पर आ जाता है। मायावती ने इस रवैये को सपा की पुरानी राजनीति बताया और जनता से सावधान रहने की अपील की।
पीडीए फॉर्मूले पर भी मायावती का निशाना
मायावती ने अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले को लेकर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि अखिलेश अपनी राजनीतिक जरूरत के हिसाब से पीडीए में ‘पी’ का मतलब कभी पिछड़ा वर्ग तो कभी पंडित बताते हैं। मायावती ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी पिछड़े वर्गों में अपनी जाति के अलावा दूसरे पिछड़े समुदायों, अल्पसंख्यकों और खासकर ब्राह्मण समाज की वास्तविक हितैषी नहीं रही है।
दलित-पिछड़े और ब्राह्मणों को लेकर भी सवाल
बसपा प्रमुख ने समाजवादी पार्टी की पिछली सरकारों के कामकाज पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा सरकारों में दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और ब्राह्मण समाज के हितों की अनदेखी हुई। साथ ही उन्होंने सपा शासन के दौरान कानून-व्यवस्था को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए और कहा कि उस दौर में अपराधी तत्वों को बढ़ावा मिलने की शिकायतें लगातार सामने आती थीं।
चुनाव से पहले बढ़ सकती है राजनीतिक गर्मी
मायावती का यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगले विधानसभा चुनाव को लेकर दलों की तैयारियां तेज हैं। ‘चवन्नी’ विवाद अब केवल अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच की बयानबाजी नहीं रह गया है। इसमें मायावती की सीधी एंट्री से विपक्षी राजनीति के भीतर पुरानी तल्खियां भी सामने आने लगी हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका को देखते हुए इस विवाद पर आगे भी बयानबाजी तेज होने की संभावना है।
अब निशाने पर अखिलेश, सपा की रणनीति पर सवाल
फिलहाल इस पूरे विवाद में अखिलेश यादव का बयान, जयंत चौधरी का पलटवार और मायावती की प्रतिक्रिया तीनों चर्चा के केंद्र में हैं। अखिलेश के बयान को जहां रालोद ने किसान समाज और चौधरी चरण सिंह की विरासत से जोड़कर आपत्तिजनक बताया, वहीं मायावती ने इसे जाट समाज के सम्मान का मुद्दा बना दिया है। ऐसे में आने वाले दिनों में यह विवाद उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में किस तरह असर डालता है, इस पर सबकी नजर रहेगी।
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