By Malay Ojha | Published: 23 August 2026 at 06:41 PM
फरक्का बैराज और भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि के नवीनीकरण को लेकर बिहार की सियासत गरमा गई है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने साफ कहा है कि संधि के नवीनीकरण के दौरान बिहार के जल हितों से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार अपने अधिकारों को मजबूती से केंद्र के सामने रख रहा है और फरक्का का सवाल सिर्फ पानी के बंटवारे का नहीं, बल्कि बाढ़, गाद, सिंचाई, पेयजल और राज्य के भविष्य से जुड़ा है।
1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई गंगा जल संधि की अवधि 12 दिसंबर 2026 को पूरी हो रही है। केंद्र सरकार के अनुसार यह समझौता फरक्का में गंगा के पानी के बंटवारे से जुड़ा है और सूखे मौसम में जनवरी से मई के बीच पानी के बंटवारे की व्यवस्था तय करता है। अब इसके नवीनीकरण से पहले बिहार की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया जा रहा है।
केंद्र के सामने रखी गई बिहार की चिंता
हाल में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार के प्रतिनिधिमंडल ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात कर फरक्का बैराज और गंगा जल संधि से जुड़े राज्य के मुद्दे उठाए। बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी के मुताबिक विदेश मंत्री ने भरोसा दिया कि संधि के नवीनीकरण के दौरान बिहार की चिंताओं को उचित मंच पर उठाया जाएगा। इस मुलाकात के बाद भाजपा अब इसे बिहार के दीर्घकालिक जल हितों की दिशा में अहम पहल बता रही है।
सरावगी ने लालू प्रसाद पर साधा निशाना
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने इस मुद्दे पर राष्ट्रीय जनता दल और लालू प्रसाद यादव को भी घेरा। उन्होंने कहा कि वर्ष 1996 में जब भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल संधि हुई, उस समय लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे। सरावगी का सवाल है कि उस समय बिहार की राजनीतिक स्थिति मजबूत होने के बावजूद राज्य के जल हितों को लेकर पर्याप्त दबाव क्यों नहीं बनाया गया।
‘अब पुराने वीडियो से ज्ञान क्यों?’
सरावगी ने कहा कि संधि की अवधि समाप्त होने का समय करीब आने के बाद पुराने वीडियो और पुराने बयानों के जरिए राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने विपक्ष से सवाल किया कि जब 1996 में बिहार के पास अपनी बात मजबूती से रखने के राजनीतिक अवसर मौजूद थे, तब राज्य के हितों के लिए क्या कदम उठाए गए थे।
उनका कहना है कि आज जब संधि के नवीनीकरण का समय सामने है, तब राजनीतिक बयानबाजी के बजाय इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि बिहार की मौजूदा और आने वाले वर्षों की पानी की जरूरतों को नए समझौते में किस तरह शामिल किया जाए।
मामला सिर्फ पानी के बंटवारे का नहीं
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि फरक्का को केवल भारत और बांग्लादेश के बीच पानी के बंटवारे के सवाल के रूप में देखना सही नहीं होगा। इसका सीधा असर बिहार में गंगा के प्रवाह, गाद जमने, बाढ़ की स्थिति, सिंचाई, पेयजल और खेती पर पड़ने वाले प्रभाव से भी जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि बिहार की आबादी, खेती की जरूरत और औद्योगिक गतिविधियां समय के साथ बढ़ी हैं। ऐसे में तीन दशक पुराने आंकड़ों के आधार पर भविष्य की जरूरतों का फैसला करना पर्याप्त नहीं होगा। इसी वजह से संधि के नवीनीकरण के समय बिहार की वर्तमान जरूरतों के साथ आने वाले वर्षों की आवश्यकताओं को भी सामने रखना जरूरी है।
संजय झा पहले ही उठा चुके हैं सवाल
फरक्का संधि को लेकर जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य संजय कुमार झा भी केंद्र के सामने बिहार का पक्ष रख चुके हैं। उन्होंने राज्यसभा में कहा था कि 1996 की संधि के नवीनीकरण से पहले बिहार की दीर्घकालिक जल सुरक्षा और विकास की जरूरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने मौजूदा समझौते को उसी रूप में आगे बढ़ाने पर भी सवाल उठाए हैं।
बिहार की भविष्य की जरूरत पर जोर
संजय कुमार झा ने यह भी तर्क दिया है कि पिछले तीन दशकों में बिहार की आबादी और पानी की जरूरतों में बड़ा बदलाव आया है। उनके मुताबिक अब संधि की समीक्षा केवल पुराने जल प्रवाह के आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की जरूरतों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। इस मुद्दे पर बिहार में सत्ता पक्ष के अलग-अलग घटकों की चिंता एक जैसी दिखाई दे रही है।
भाजपा बोली- राजनीति नहीं, तथ्य चाहिए
संजय सरावगी ने विपक्ष से कहा कि फरक्का के मुद्दे पर बयान देने से पहले 1996 की संधि और उससे जुड़े दस्तावेजों का अध्ययन किया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि अधूरी जानकारी के आधार पर लोगों के बीच भ्रम पैदा करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
सरावगी के मुताबिक बिहार के जल अधिकार का सवाल किसी एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है। इसलिए इस पर आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी यह है कि राज्य सरकार अपने आंकड़ों और जरूरतों के साथ केंद्र के सामने मजबूत पक्ष रखे और भविष्य के लिए ऐसी व्यवस्था बने जिससे बिहार के हित सुरक्षित रहें।
गाद और बाढ़ का मुद्दा भी अहम
फरक्का से जुड़ी बहस में गाद और बाढ़ का सवाल भी लगातार उठता रहा है। बिहार में गंगा और उसकी सहायक नदियों से जुड़ी बाढ़ की समस्या पहले से गंभीर रही है। भाजपा का कहना है कि संधि के नवीनीकरण के दौरान केवल पानी की मात्रा पर चर्चा करने के बजाय नदी की स्थिति, गाद, बाढ़ और सिंचाई जैसी समस्याओं को भी व्यापक रूप से देखा जाना चाहिए।
सरावगी ने कहा कि बिहार के लिए गंगा सिर्फ धार्मिक आस्था का विषय नहीं है। यह खेती, पेयजल, रोजगार, कारोबार और राज्य की अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़ी हुई है। इसलिए नदी से जुड़े किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते में बिहार की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
‘बिहार के हित सर्वोपरि’
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बिहार अपने जल अधिकारों को लेकर स्पष्ट है। उनका कहना है कि राज्य सरकार का रुख किसी देश या किसी राज्य के खिलाफ नहीं है, बल्कि बिहार की जरूरतों को मजबूती से सामने रखने का है।
उन्होंने कहा कि भारत और बांग्लादेश के संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इन संबंधों के साथ बिहार की जल सुरक्षा को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए। संधि के नवीनीकरण के समय दोनों देशों के बीच बातचीत के साथ बिहार की जमीन पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
‘नारेबाजी नहीं, ठोस पहल’ पर जोर
सरावगी ने कहा कि बिहार का रुख नारेबाजी का नहीं, बल्कि तथ्यों, संवाद और ठोस पहल का है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में राज्य की पानी की जरूरत और बढ़ने वाली है। ऐसे में अभी से दीर्घकालिक व्यवस्था पर काम करना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि बिहार के हितों को लेकर केंद्र के सामने बात रखी जा रही है और केंद्र की ओर से भी राज्य की चिंताओं को उचित मंच पर उठाने का भरोसा मिला है। भाजपा इसे विपक्ष की बयानबाजी से अलग एक गंभीर पहल के तौर पर पेश कर रही है। ([The Times of India][1])
लालू प्रसाद पर फिर उठाया सवाल
सरावगी ने एक बार फिर 1996 की संधि का जिक्र करते हुए लालू प्रसाद यादव और राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं से जवाब मांगा। उन्होंने कहा कि उस समय बिहार के हितों की पर्याप्त रक्षा क्यों नहीं हुई, यह सवाल आज भी पूछा जाना चाहिए।
हालांकि, मौजूदा राजनीतिक बहस अब सिर्फ अतीत की जिम्मेदारी तय करने तक सीमित नहीं है। संधि की समय-सीमा नजदीक होने के कारण असली सवाल यह है कि नए समझौते में बिहार की जरूरतों को किस तरह जगह मिलेगी और राज्य को भविष्य के लिए पर्याप्त जल सुरक्षा कैसे मिलेगी।
बिहार के लिए आगे की चुनौती
1996 की संधि की अवधि पूरी होने में अब कुछ ही महीने बचे हैं। ऐसे में बिहार की राजनीति में फरक्का का मुद्दा आने वाले दिनों में और जोर पकड़ सकता है। जनता दल यूनाइटेड की ओर से पहले ही इस पर कड़ा रुख सामने आ चुका है, जबकि भाजपा भी बिहार के जल हितों को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुकी है।
संजय सरावगी ने कहा कि फरक्का को लेकर बिहार की लड़ाई किसी राजनीतिक दल की लड़ाई नहीं है। यह राज्य के भविष्य, जल सुरक्षा और लोगों के अधिकार से जुड़ा सवाल है। उन्होंने दोहराया कि बिहार के जल हित सर्वोपरि हैं और इनके साथ किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जाएगा।
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