By Malay Ojha | Published: 23 August 2026 at 03:18 PM
फरक्का जल समझौते को लेकर बिहार की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। जदयू ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि 1996 में भारत-बांग्लादेश के बीच हुए फरक्का जल समझौते के समय लालू यादव केंद्र की तत्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार में प्रभावशाली भूमिका में थे और बिहार के मुख्यमंत्री भी थे, लेकिन उन्होंने बिहार के हितों को लेकर उस समय कोई प्रभावी विरोध नहीं किया। जदयू ने सवाल उठाया है कि अब संधि की अवधि खत्म होने के करीब पहुंची तो लालू यादव इसका श्रेय लेने की कोशिश क्यों कर रहे हैं।**
जदयू विधान पार्षद और मुख्य प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार तथा प्रदेश प्रवक्ता पूजा पैट्रिक ने संयुक्त प्रेस वार्ता में यह हमला बोला। दोनों नेताओं ने कहा कि फरक्का जल समझौते को लेकर बिहार की चिंता आज की नहीं है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक बहस में यह सवाल जरूरी है कि 1996 में समझौते के समय बिहार की ओर से क्या रुख अपनाया गया था।
यह विवाद जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा की ओर से फरक्का समझौते के मौजूदा स्वरूप पर सवाल उठाए जाने के बाद तेज हुआ है। संजय झा ने केंद्र से मांग की है कि 30 साल पुराने समझौते को मौजूदा स्वरूप में आगे नहीं बढ़ाया जाए और बिहार की भविष्य की पानी की जरूरतों को ध्यान में रखकर नए सिरे से व्यवस्था पर विचार हो।
जदयू ने 1996 के समय की भूमिका पर उठाए सवाल
नीरज कुमार और पूजा पैट्रिक ने कहा कि 12 दिसंबर 1996 को भारत और बांग्लादेश के बीच फरक्का जल समझौता हुआ था। उस समय लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे और केंद्र की संयुक्त मोर्चा सरकार के राजनीतिक समीकरणों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी।
जदयू नेताओं का आरोप है कि उस समय लालू यादव ने बिहार के हितों से जुड़े इस मुद्दे को मजबूती से नहीं उठाया। उन्होंने कहा कि अगर उस दौर में बिहार की चिंताओं को केंद्र के सामने प्रभावी तरीके से रखा जाता तो आज इस समझौते को लेकर राज्य में जो सवाल उठ रहे हैं, उनकी स्थिति अलग हो सकती थी। हालांकि, यह जदयू का राजनीतिक आरोप है और राजद इस पूरे मुद्दे पर अलग रुख रखता है।
लालू के पुराने वीडियो को लेकर भी सवाल
जदयू नेताओं ने लालू यादव की ओर से साझा किए गए पुराने वीडियो को भी निशाने पर लिया। लालू यादव ने हाल ही में फरक्का बैराज को लेकर अपना पुराना संसदीय भाषण साझा करते हुए दावा किया था कि राजद ने इस मुद्दे का पहले से विरोध किया था। उन्होंने जदयू के नेताओं को फरक्का के इतिहास और भूगोल को समझने की सलाह भी दी थी।
इसके जवाब में जदयू ने दावा किया कि जिस वीडियो के आधार पर लालू यादव अपना पुराना विरोध दिखा रहे हैं, वह बाद के दौर का है। पार्टी ने आरोप लगाया कि सत्ता में रहते हुए बिहार के हितों को लेकर चुप्पी रही और सत्ता से बाहर होने के बाद इस मुद्दे पर विरोध का श्रेय लेने की कोशिश की जा रही है।
‘सत्ता में थे तो आवाज क्यों नहीं उठाई?’
जदयू नेताओं ने लालू यादव से सीधे सवाल किया कि जब वर्ष 1996 में उनके पास बिहार की सत्ता थी और केंद्र में भी उनका राजनीतिक प्रभाव था, तब उन्होंने फरक्का समझौते को लेकर बिहार की चिंताओं को मजबूती से क्यों नहीं उठाया।
उन्होंने कहा कि फरक्का का मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी का विषय नहीं है। इसका संबंध गंगा के जलप्रवाह, गाद जमा होने, बाढ़ और पानी की उपलब्धता जैसे सवालों से जुड़ा है। जदयू का कहना है कि बिहार के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए इस समझौते की समीक्षा जरूरी है।
नीतीश कुमार के पुराने रुख का भी किया जिक्र
प्रेस वार्ता में जदयू नेताओं ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फरक्का बैराज और गंगा में गाद के मुद्दे पर उठाए गए सवालों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार लंबे समय से गंगा में गाद जमा होने और इसके कारण बिहार में पैदा होने वाली समस्याओं को उठाते रहे हैं।
जदयू नेताओं के मुताबिक, बिहार के लिए पानी का सवाल केवल सिंचाई तक सीमित नहीं है। इसका असर खेती, पेयजल, बाढ़ नियंत्रण और राज्य की आने वाली जरूरतों पर भी पड़ता है। इसलिए केंद्र सरकार के सामने बिहार की बात मजबूती से रखना जरूरी है।
संजय झा ने भी समझौते के नवीनीकरण पर उठाए सवाल
दरअसल, संजय कुमार झा ने हाल में फरक्का जल समझौते पर सवाल उठाते हुए कहा है कि 1996 में हुए समझौते के बाद पिछले तीन दशकों के अनुभव और आंकड़ों को देखते हुए अब नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। उनका कहना है कि बिहार की मौजूदा और भविष्य की पानी की जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए।
संजय झा का तर्क है कि वर्ष 2050 तक गंगा बेसिन से जुड़े राज्यों की पानी की जरूरतों को ध्यान में रखकर नई व्यवस्था तैयार की जानी चाहिए। उनका दावा है कि बिहार को बाढ़ और पानी की कमी दोनों तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है और इस पूरे मामले को केवल पुराने आंकड़ों के आधार पर नहीं देखा जा सकता।
लालू यादव ने जदयू को बताया था ‘नौसिखिया’
इससे पहले लालू यादव ने फरक्का के मुद्दे पर जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा पर तीखा हमला किया था। उन्होंने बिना नाम लिए उन्हें ‘नौसिखिया’ बताते हुए कहा था कि इस मुद्दे पर बोलने से पहले इतिहास और भूगोल को समझना चाहिए।
लालू यादव ने दावा किया था कि राजद ने संसद से लेकर राज्य सरकार तक फरक्का बैराज का विरोध किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि उनकी पार्टी ने बिहार को होने वाले संभावित नुकसान को पहले ही पहचान लिया था।
बिहार के हितों को प्राथमिकता देने की मांग
जदयू नेताओं ने कहा कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और उपमुख्यमंत्री विजय चौधरी की ओर से केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रियों से मुलाकात कर बिहार की चिंताओं से अवगत कराया गया है। पार्टी का कहना है कि फरक्का समझौते को लेकर भविष्य में जो भी फैसला हो, उसमें बिहार के हितों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
उन्होंने यह भी मांग रखी कि इस तरह के किसी भी फैसले की प्रक्रिया में बिहार को प्रभावी रूप से शामिल किया जाए। जदयू का कहना है कि राज्य की पानी की जरूरत, खेती, पेयजल और बाढ़ जैसी समस्याओं को नजरअंदाज करके कोई भी नई व्यवस्था तय नहीं की जानी चाहिए।
राजद से जदयू ने पूछे पांच सवाल
जदयू ने राजद और लालू प्रसाद यादव के सामने पांच सवाल भी रखे। पार्टी ने पूछा कि जब राज्यसभा में संजय झा ने फरक्का जल समझौते का मुद्दा उठाया तो राजद के सांसदों ने इस पर क्या रुख अपनाया। जदयू ने यह भी सवाल किया कि 1996 में सत्ता और राजनीतिक प्रभाव होने के बावजूद लालू यादव ने समझौते के खिलाफ आपत्ति क्यों नहीं दर्ज कराई।
इसके अलावा जदयू ने पूछा कि बाद के वर्षों में केंद्र की राजनीति में प्रभाव रखने के बावजूद बिहार के हितों के लिए इस मुद्दे पर पहल क्यों नहीं की गई। पार्टी ने चारा घोटाले से जुड़े मामले को भी राजनीतिक आरोप के तौर पर उठाते हुए पूछा कि क्या उस समय की परिस्थितियों के कारण बिहार के हित प्रभावित हुए।
दिसंबर 2026 में खत्म हो रही है संधि की अवधि
भारत और बांग्लादेश के बीच 1996 में हुआ फरक्का जल समझौता 30 साल की अवधि के लिए हुआ था और इसकी अवधि दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है। इसी वजह से बिहार में इस समझौते को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है।
फरक्का समझौते की अवधि खत्म होने से पहले बिहार की जल सुरक्षा और गंगा के पानी को लेकर राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज होने के आसार हैं। फिलहाल जदयू और राजद आमने-सामने हैं और दोनों पक्ष अपने-अपने पुराने रुख को सही ठहराने में जुटे हैं। आने वाले दिनों में केंद्र सरकार इस समझौते को लेकर क्या रुख अपनाती है, इस पर भी बिहार की नजर रहेगी।
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