By Malay Ojha | Published: 23 August 2026 at 05:13 PM
उत्तर प्रदेश में निषाद आरक्षण का मुद्दा विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर गरमा गया है। विकासशील इंसान पार्टी के प्रमुख मुकेश सहनी ने साफ कहा है कि अगर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले निषाद समाज को आरक्षण नहीं मिला तो समाज भाजपा को वोट नहीं देगा। आगरा में गंगाजल हाथ में लेकर लिए गए संकल्प के बाद सहनी ने अब गांव-गांव अभियान तेज करने की बात कही है।
सहनी ने कहा कि सरकार की ओर से उनके अभियान में कथित तौर पर रोक-टोक की जा रही है, इसलिए उनकी पार्टी ने आगे की रणनीति तैयार कर ली है। उन्होंने इसे ‘प्लान बी’ बताते हुए कहा कि अब निषाद समाज के युवा खुद गांव, प्रखंड और क्षेत्र स्तर पर घर-घर जाएंगे और लोगों को आरक्षण के मुद्दे पर संकल्प दिलाएंगे।
‘संजय निषाद सिर्फ मंत्री पद की बात न करें’
मुकेश सहनी ने निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री संजय निषाद के उस बयान पर भी निशाना साधा, जिसमें उन्होंने आरक्षण के लिए मंत्री पद छोड़ने तक की बात कही थी। सहनी ने कहा कि अगर समाज के अधिकार का सवाल है तो केवल पद छोड़ने की बात करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि सरकार से स्पष्ट समयसीमा में आरक्षण लागू कराने की मांग करनी चाहिए।
संजय निषाद ने हाल में आरक्षण में देरी पर चिंता जताते हुए कहा था कि जरूरत पड़ी तो वह मंत्री पद भी छोड़ने को तैयार हैं। उन्होंने भाजपा के साथ रहते हुए भी निषाद समाज के आरक्षण के मुद्दे पर अपना दबाव बनाए रखने की बात कही थी।
‘आरक्षण नहीं तो गठबंधन नहीं’ का पुराना नारा
सहनी ने अपने पुराने राजनीतिक रुख का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के गठन के समय से ही उनका नारा रहा है कि आरक्षण नहीं तो भाजपा से गठबंधन नहीं। उनके मुताबिक मंत्री पद और सत्ता स्थायी नहीं हैं, लेकिन समाज के अधिकार की लड़ाई लंबे समय तक चलने वाली है।
सहनी ने कहा कि उनका लक्ष्य किसी व्यक्ति विशेष को राजनीतिक नुकसान पहुंचाना नहीं है। उन्होंने संजय निषाद से भी समाज के हित में मजबूत रुख अपनाने की अपील की और कहा कि यदि वह आरक्षण की लड़ाई मजबूती से लड़ते हैं तो उन्हें उनका समर्थन मिलेगा।
‘निषाद समाज अब अपना फैसला खुद करेगा’
मुकेश सहनी ने दावा किया कि निषाद समाज अब किसी नेता के कहने भर से अपना राजनीतिक फैसला नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि समाज के लोग अपने मुद्दों को समझ रहे हैं और चुनाव में अपने अधिकारों के आधार पर निर्णय लेने की स्थिति में आ चुके हैं।
आगरा में हुए संकल्प कार्यक्रम को उन्होंने इसी बदलाव का उदाहरण बताया। सहनी के मुताबिक बड़ी संख्या में युवाओं की मौजूदगी यह दिखाती है कि आरक्षण का मुद्दा अब केवल नेताओं की बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के स्तर पर भी इसे लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो रही है।
उत्तर प्रदेश में लगातार बढ़ा रहे सक्रियता
मुकेश सहनी पिछले कई महीनों से उत्तर प्रदेश में निषाद आरक्षण के मुद्दे को लेकर सक्रिय हैं। उन्होंने 101 दिन की ‘निषाद आरक्षण संकल्प यात्रा’ का ऐलान किया था, जिसके जरिए गांव-गांव जाकर लोगों से आरक्षण के पक्ष में संकल्प लेने की योजना बनाई गई।
अलग-अलग जिलों में आयोजित कार्यक्रमों में सहनी लगातार यह संदेश दे रहे हैं कि यदि 2027 से पहले निषाद समाज को आरक्षण नहीं मिला तो राजनीतिक तौर पर अलग रास्ता अपनाया जाएगा। फतेहपुर और दूसरे इलाकों में भी वह इसी मुद्दे पर सरकार को घेर चुके हैं।
‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर भी बोले
मुकेश सहनी ने अपने संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का भी इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि यदि अपने अधिकारों के लिए सरकार से सवाल करना और अपने समाज को जागरूक करना इसी नाम से पुकारा जाता है तो उन्हें यह कहे जाने पर कोई आपत्ति नहीं है।
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे सरकार की नीतियों और अपने अधिकारों को लेकर सवाल करें। सहनी ने कहा कि लोकतंत्र में जनता के पास सबसे बड़ी ताकत उसका वोट है और चुनाव के समय इसी ताकत का इस्तेमाल करके सरकारों से जवाब मांगा जा सकता है।
महंगाई और रोजगार के मुद्दे भी उठाए
निषाद आरक्षण के साथ सहनी ने महंगाई, रोजगार और सरकारी योजनाओं को लेकर भी केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि गरीब परिवारों को मुफ्त राशन या आर्थिक सहायता मिलना जरूरी हो सकता है, लेकिन इसे विकास का एकमात्र पैमाना नहीं माना जा सकता।
उन्होंने युवाओं के लिए रोजगार और परिवारों की स्थायी आमदनी बढ़ाने पर जोर दिया। सहनी ने कहा कि केवल तत्काल राहत देने से परिवार आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होते। इसके लिए रोजगार, शिक्षा और बेहतर अवसर जरूरी हैं।
जातिगत जनगणना और हिस्सेदारी का मुद्दा
सहनी ने जातिगत जनगणना और आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि जिन वर्गों की जितनी आबादी है, उन्हें उसी अनुपात में राजनीतिक और सामाजिक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
उन्होंने आरक्षण की मौजूदा सीमा को लेकर भी सवाल उठाया और वंचित वर्गों को उनकी आबादी के अनुपात में अधिकार देने की मांग दोहराई। इसी दौरान उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सामाजिक न्याय से जुड़ी राजनीति की सराहना भी की।
‘निषाद समाज मेरे लिए परिवार’
मुकेश सहनी ने कहा कि निषाद समाज उनके लिए सिर्फ एक जाति या राजनीतिक समूह नहीं, बल्कि परिवार की तरह है। उन्होंने कहा कि इसी वजह से वह अपने व्यक्तिगत राजनीतिक हितों से ऊपर समाज के मुद्दों को रखते हैं।
उन्होंने युवाओं और छात्रों का भी आभार जताया, जो आरक्षण और सामाजिक अधिकारों के सवाल पर उनके अभियान में शामिल हो रहे हैं। सहनी ने कहा कि शिक्षा और जागरूकता के बिना किसी भी समाज के लिए अपने अधिकारों की लड़ाई को मजबूत करना मुश्किल है।
संजय निषाद के बयान से बढ़ी सियासी गर्मी
निषाद आरक्षण के मुद्दे पर मुकेश सहनी और संजय निषाद के बयानों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया दबाव पैदा कर दिया है। एक तरफ संजय निषाद भाजपा के साथ रहते हुए आरक्षण की मांग पर सरकार को चेतावनी दे रहे हैं, वहीं सहनी सीधे भाजपा को चुनावी नुकसान की चेतावनी दे रहे हैं।
ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले निषाद आरक्षण का मुद्दा केवल सामाजिक अधिकार की मांग तक सीमित रहने के बजाय राजनीतिक गठजोड़ और वोट के समीकरण को भी प्रभावित कर सकता है। मुकेश सहनी ने संकेत दिया है कि आने वाले दिनों में उनका अभियान और तेज होगा और घर-घर संकल्प अभियान के जरिए इस मुद्दे को समाज के बीच ले जाया जाएगा।
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