By aryavartalive | Published: 24 August 2026 at 08:45 AM
पद्मश्री पंडित सियाराम तिवारी की 28वीं पुण्यतिथि के मौके पर पटना में 14वीं ध्रुपद संध्या का आयोजन किया गया। नाद-विस्तार समिति और लेट्स इंस्पायर बिहार के गार्गी अध्याय के संयुक्त आयोजन में संगीत और नृत्य की शानदार प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को देर तक बांधे रखा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि डॉ. अनिल सुलभ ने कहा कि ऐसे आयोजन बिहार की सांस्कृतिक और सांगीतिक विरासत को जीवंत रखने का काम करते हैं।
रविवार को आयोजित इस विशेष संध्या में कला और संगीत जगत से जुड़े कई जाने-माने लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम में डॉ. कुमार अरुणोदय, डॉ. किशोर सिन्हा, पूनम चौधरी, अमरावती सिंह और भावना शर्मा समेत कई गणमान्य अतिथियों ने शिरकत की। आयोजन का उद्देश्य पंडित सियाराम तिवारी की संगीत साधना और उनकी विरासत को याद करने के साथ नई पीढ़ी को शास्त्रीय संगीत से जोड़ना रहा।
डॉ. रमा दास को मिला विशेष सम्मान
कार्यक्रम का सबसे खास आकर्षण प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना डॉ. रमा दास को दिया गया सम्मान रहा। उन्हें पंडित सियाराम तिवारी स्मृति लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड-2026 से सम्मानित किया गया। लंबे समय से भारतीय शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में योगदान दे रहीं डॉ. रमा दास के सम्मान पर सभागार में मौजूद कलाकारों और संगीत प्रेमियों ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया।
डॉ. अनिल सुलभ ने बताई ऐसे आयोजनों की अहमियत
मुख्य अतिथि डॉ. अनिल सुलभ ने अपने संबोधन में कहा कि संगीत और कला से जुड़े आयोजन सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं होते। इनसे समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहता है। उन्होंने कहा कि लगातार होने वाले ऐसे कार्यक्रम बिहार की धरती को सांस्कृतिक रूप से सींचते हैं और यहां की सांगीतिक परंपरा को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं।
कुमार वंश प्रभात ने ध्रुपद से बांधा समां
संगीत संध्या की शुरुआत दरभंगा घराने के युवा गायक और प्रशिक्षु कुमार वंश प्रभात के ध्रुपद गायन से हुई। उन्होंने राग मियां मल्हार में ध्रुपद, धमार और सूलताल की प्रस्तुति दी। उनकी गायकी में पारंपरिक ध्रुपद शैली की गंभीरता और राग की बारीकियों की झलक देखने को मिली। प्रस्तुति के दौरान सभागार पूरी तरह शास्त्रीय संगीत के रंग में डूब गया।
पखावज की संगत ने बढ़ाई प्रस्तुति की खूबसूरती
कुमार वंश प्रभात के साथ पखावज पर घराने के प्रसिद्ध वादक गौरव शंकर उपाध्याय ने संगत की। उनके पखावज वादन ने गायन को मजबूत आधार दिया। दोनों कलाकारों के बीच ताल और सुर का तालमेल श्रोताओं को खासा पसंद आया और प्रस्तुति के बाद सभागार तालियों से गूंज उठा।
डॉ. रीता दास ने सरोद से जीता दिल
दूसरी प्रस्तुति प्रसिद्ध सरोद वादिका डॉ. प्रो. रीता दास की रही। उन्होंने राग रागेश्वरी में आलाप, जोड़, मसीतखानी गत, द्रुत गत और झाला की प्रस्तुति दी। इसके बाद मेघ राग में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में पहाड़ी धुन की प्रस्तुति ने माहौल को और खुशनुमा बना दिया। उनके सरोद वादन ने श्रोताओं को देर तक बांधे रखा।
तबले पर सुरजीत मुखर्जी ने दी संगत
डॉ. रीता दास के साथ तबले पर कोलकाता के प्रसिद्ध तबला वादक सुरजीत मुखर्जी ने संगत की। सरोद और तबले के बीच तालमेल ने प्रस्तुति को प्रभावशाली बना दिया। रागों की प्रस्तुति के दौरान दोनों कलाकारों की जुगलबंदी को श्रोताओं की खूब सराहना मिली।
पंडित राजेंद्र सिजवार की गायकी ने बांधा समां
तीसरी प्रस्तुति गया और बनारस घराने के प्रसिद्ध गायक पंडित राजेंद्र सिजवार की रही। उन्होंने राग मेघ में मध्य लय तीनताल की बंदिश से शुरुआत की। ‘कजरा कारे-कारे लगे अति प्यारे’ की प्रस्तुति के बाद उन्होंने ‘आयो गर्जत बदरवा’ को द्रुत तीनताल में सुनाया। उनकी गायकी पर श्रोताओं ने जमकर तालियां बजाईं।
मियां मल्हार और ठुमरी-दादरा ने मोहा मन
पंडित राजेंद्र सिजवार ने इसके बाद राग मियां मल्हार में मध्य लय तीनताल की बंदिश पेश की। बारिश और विरह के भाव से जुड़े इन रागों की प्रस्तुति ने पूरे सभागार का माहौल बदल दिया। कार्यक्रम के अंतिम हिस्से में मिश्र खमाज में ठुमरी और दादरा सुनाकर उन्होंने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया।
मंच संचालन और धन्यवाद ज्ञापन
पूरे कार्यक्रम का मंच संचालन नम्रता कुमारी ने किया। उन्होंने प्रस्तुतियों और कलाकारों के बारे में श्रोताओं को जानकारी देते हुए कार्यक्रम को सहजता से आगे बढ़ाया। अंत में समिति की सचिव आशा पाठक ने सभी कलाकारों, अतिथियों और संगीत प्रेमियों के प्रति आभार जताया।
संगीत की विरासत को आगे बढ़ाने की पहल
14वीं ध्रुपद संध्या सिर्फ एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पंडित सियाराम तिवारी की संगीत साधना को याद करने और उनकी विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक प्रयास भी रही। ध्रुपद, सरोद, शास्त्रीय गायन, ठुमरी और दादरा जैसी प्रस्तुतियों ने एक ही मंच पर भारतीय संगीत की विविधता को सामने रखा। कार्यक्रम में कलाकारों और श्रोताओं की मौजूदगी ने यह भी दिखाया कि बिहार में शास्त्रीय संगीत के प्रति आज भी गहरी रुचि मौजूद है।
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