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वाराणसी में काशी की साहित्यिक परंपरा पर चर्चा, प्रो. चंद्रबली सिंह और ठाकुर प्रसाद सिंह के योगदान को किया याद

By Malay Ojha | Published: 29 October 2026 at 06:14 PM

वाराणसी। काशी की साहित्यिक विरासत और हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले रचनाकारों के योगदान पर गुरुवार को जिला पुस्तकालय में चर्चा हुई। अर्दली बाजार स्थित पुस्तकालय में साहित्यिक संघ और विद्याश्री न्यास की ओर से आयोजित ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ व्याख्यानमाला की 19वीं कड़ी में प्रो. चंद्रबली सिंह और ठाकुर प्रसाद सिंह के साहित्यिक जीवन और रचनाधर्मिता पर विचार रखे गए।

आलोचना और काव्यानुवाद से प्रो. चंद्रबली सिंह ने बनाई पहचान
डॉ. महेंद्र प्रताप सिंह ने मार्क्सवादी चिंतक और साहित्यकार प्रो. चंद्रबली सिंह के योगदान पर चर्चा करते हुए कहा कि अंग्रेजी साहित्य के शिक्षक होने के बावजूद उन्होंने हिंदी साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध किया। आलोचना और काव्यानुवाद उनकी रचनात्मक यात्रा के प्रमुख क्षेत्र रहे। विदेशी भाषाओं के प्रसिद्ध कवियों की कविताओं का लयात्मक हिंदी अनुवाद कर उन्होंने साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। मार्क्सवादी साहित्य के गहन अध्ययन का असर उनकी आलोचना दृष्टि में भी दिखाई देता है।

ठाकुर प्रसाद सिंह की रचनाओं में दिखे जीवन के अनुभव
डॉ. उमेश प्रसाद सिंह ने रचनाकार ठाकुर प्रसाद सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि ठाकुर प्रसाद सिंह केवल एक रचनाकार नहीं थे, बल्कि उनका व्यक्तित्व भी किसी रचना और अद्भुत काव्य की तरह था। उनकी रचनाओं में जीवन के अनुभवों, संवेदनाओं और आत्मसंघर्ष की झलक मिलती है।

अध्यक्ष ने दोनों साहित्यकारों की विशेषताएं बताईं
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. अशोक कुमार सिंह ने कहा कि व्याख्यानमाला में दो समकालीन साहित्यकारों के योगदान को याद किया गया। ठाकुर प्रसाद सिंह ने गीतकार, कथाकार और निबंधकार के रूप में अपनी पहचान बनाई, जबकि प्रो. चंद्रबली सिंह मार्क्सवादी समीक्षक और विश्वप्रसिद्ध कविताओं के अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं।

सेवानिवृत्त पुस्तकालयाध्यक्ष का किया अभिनंदन
इस मौके पर विद्याश्री न्यास और साहित्यिक संघ की ओर से सेवानिवृत्त हो रहे पुस्तकालयाध्यक्ष कंचन सिंह परिहार का अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत आनंद कृष्ण मासूम की सरस्वती वंदना से हुई। दयानिधि मिश्र ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि हिमांशु उपाध्याय ने काव्यपाठ किया। राज नारायण सिंह ने ठाकुर प्रसाद सिंह से जुड़े रोचक संस्मरण सुनाए।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. रचना शर्मा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन पत्रिका ‘सोच विचार’ के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने दिया। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह, प्रकाश उदय, शिवकुमार पराग, प्रो. श्रद्धानंद, राज नारायण सिंह, गिरिजेश तिवारी, डॉ. इंदीवर, गिरीश पांडेय और संतोष प्रीत समेत कई कवि व लेखक मौजूद रहे।

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वाराणसी में काशी की साहित्यिक परंपरा पर चर्चा, प्रो. चंद्रबली सिंह और ठाकुर प्रसाद सिंह के योगदान को किया याद

By Malay Ojha | Published: 29 October 2026 at 06:14 PM

वाराणसी। काशी की साहित्यिक विरासत और हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले रचनाकारों के योगदान पर गुरुवार को जिला पुस्तकालय में चर्चा हुई। अर्दली बाजार स्थित पुस्तकालय में साहित्यिक संघ और विद्याश्री न्यास की ओर से आयोजित ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ व्याख्यानमाला की 19वीं कड़ी में प्रो. चंद्रबली सिंह और ठाकुर प्रसाद सिंह के साहित्यिक जीवन और रचनाधर्मिता पर विचार रखे गए।

आलोचना और काव्यानुवाद से प्रो. चंद्रबली सिंह ने बनाई पहचान
डॉ. महेंद्र प्रताप सिंह ने मार्क्सवादी चिंतक और साहित्यकार प्रो. चंद्रबली सिंह के योगदान पर चर्चा करते हुए कहा कि अंग्रेजी साहित्य के शिक्षक होने के बावजूद उन्होंने हिंदी साहित्य को अपनी रचनाओं से समृद्ध किया। आलोचना और काव्यानुवाद उनकी रचनात्मक यात्रा के प्रमुख क्षेत्र रहे। विदेशी भाषाओं के प्रसिद्ध कवियों की कविताओं का लयात्मक हिंदी अनुवाद कर उन्होंने साहित्य जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। मार्क्सवादी साहित्य के गहन अध्ययन का असर उनकी आलोचना दृष्टि में भी दिखाई देता है।

ठाकुर प्रसाद सिंह की रचनाओं में दिखे जीवन के अनुभव
डॉ. उमेश प्रसाद सिंह ने रचनाकार ठाकुर प्रसाद सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि ठाकुर प्रसाद सिंह केवल एक रचनाकार नहीं थे, बल्कि उनका व्यक्तित्व भी किसी रचना और अद्भुत काव्य की तरह था। उनकी रचनाओं में जीवन के अनुभवों, संवेदनाओं और आत्मसंघर्ष की झलक मिलती है।

अध्यक्ष ने दोनों साहित्यकारों की विशेषताएं बताईं
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. अशोक कुमार सिंह ने कहा कि व्याख्यानमाला में दो समकालीन साहित्यकारों के योगदान को याद किया गया। ठाकुर प्रसाद सिंह ने गीतकार, कथाकार और निबंधकार के रूप में अपनी पहचान बनाई, जबकि प्रो. चंद्रबली सिंह मार्क्सवादी समीक्षक और विश्वप्रसिद्ध कविताओं के अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं।

सेवानिवृत्त पुस्तकालयाध्यक्ष का किया अभिनंदन
इस मौके पर विद्याश्री न्यास और साहित्यिक संघ की ओर से सेवानिवृत्त हो रहे पुस्तकालयाध्यक्ष कंचन सिंह परिहार का अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत आनंद कृष्ण मासूम की सरस्वती वंदना से हुई। दयानिधि मिश्र ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि हिमांशु उपाध्याय ने काव्यपाठ किया। राज नारायण सिंह ने ठाकुर प्रसाद सिंह से जुड़े रोचक संस्मरण सुनाए।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. रचना शर्मा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन पत्रिका ‘सोच विचार’ के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने दिया। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. राम सुधार सिंह, प्रकाश उदय, शिवकुमार पराग, प्रो. श्रद्धानंद, राज नारायण सिंह, गिरिजेश तिवारी, डॉ. इंदीवर, गिरीश पांडेय और संतोष प्रीत समेत कई कवि व लेखक मौजूद रहे।

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