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बिहार में 92 हजार करोड़ रुपये कहां खर्च हुए? CAG रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, 5 सरकारी विभागों पर उठे सवाल

By Malay Ojha | Published: 24 July 2026 at 02:24 PM

बिहार में सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों पर खर्च होने वाली बड़ी रकम के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। विधानसभा में पेश नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की वित्त वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2025 तक 92,132.75 करोड़ रुपये से जुड़े 62,632 उपयोगिता प्रमाण-पत्र लंबित थे। यानी सरकारी विभागों ने जिन कामों के लिए पैसा खर्च किया, उसका पूरा हिसाब अभी तक महालेखाकार कार्यालय को नहीं दिया गया है। सबसे ज्यादा लंबित राशि वाले विभागों में स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, शहरी विकास, शिक्षा और पंचायती राज शामिल हैं।

उपयोगिता प्रमाण-पत्र किसी भी सरकारी खर्च का बेहद अहम दस्तावेज होता है। इसके जरिए संबंधित विभाग या एजेंसी यह प्रमाणित करती है कि सरकार से मिली रकम का इस्तेमाल उसी योजना या काम में किया गया, जिसके लिए पैसा जारी हुआ था। ऐसे में हजारों करोड़ रुपये से जुड़े प्रमाण-पत्र लंबे समय तक लंबित रहने से सरकारी धन के इस्तेमाल और उसकी निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

पांच विभागों में सबसे ज्यादा रकम के प्रमाण-पत्र लंबित
रिपोर्ट के अनुसार, लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्रों के मामले में पांच विभाग खास तौर पर सामने आए हैं। इनमें स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, शहरी विकास, शिक्षा और पंचायती राज विभाग शामिल हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने कहा है कि उपयोगिता प्रमाण-पत्र जमा नहीं होने की स्थिति में सरकारी राशि के गलत इस्तेमाल का जोखिम बना रहता है।

सीएजी ने सरकार से जवाबदेही तय करने को कहा
रिपोर्ट में राज्य सरकार को इस मामले पर गंभीरता से निगरानी करने की सलाह दी गई है। संबंधित अधिकारियों और विभागों को समय पर उपयोगिता प्रमाण-पत्र जमा कराने के लिए जवाबदेह बनाने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला बिहार सरकार के वित्त विभाग के सामने भी उठाया गया था, लेकिन जनवरी 2026 से अब तक जवाब का इंतजार है।

आखिर उपयोगिता प्रमाण-पत्र इतना जरूरी क्यों है?
सरकार जब किसी योजना, विकास कार्य या संस्थान के लिए अनुदान या वित्तीय सहायता जारी करती है, तो संबंधित विभाग को बाद में यह बताना होता है कि रकम कहां और किस काम में खर्च हुई। यही जानकारी उपयोगिता प्रमाण-पत्र के जरिए दी जाती है। इससे यह पता चलता है कि स्वीकृत राशि का इस्तेमाल तय उद्देश्य के लिए हुआ या नहीं।

अगली किस्त पर भी पड़ सकता है असर
नियम के मुताबिक, पिछले खर्च का उपयोगिता प्रमाण-पत्र जमा नहीं होने पर आगे की राशि जारी करने में दिक्कत आ सकती है। खासकर केंद्र प्रायोजित योजनाओं में इसका असर गंभीर हो सकता है। समय पर प्रमाण-पत्र नहीं मिलने पर अगली किस्त रुकने का खतरा रहता है, जिससे योजनाओं की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।

बजट में बड़ी रकम रखी गई, लेकिन पूरा खर्च नहीं हुआ
सीएजी की रिपोर्ट में बिहार के बजट प्रबंधन को लेकर भी कई सवाल उठाए गए हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में राज्य का कुल बजट 3,64,518.87 करोड़ रुपये था। इसमें से 2,87,178.49 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके। यानी कुल बजट का करीब 78.78 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च हुआ और 77,340.38 करोड़ रुपये की बचत रह गई।

77 हजार करोड़ की बचत में सिर्फ 10 हजार करोड़ रुपये ही सरेंडर
रिपोर्ट के अनुसार, कुल बची हुई रकम में से केवल 10,388.35 करोड़ रुपये ही सरकार को वापस किए गए। सीएजी ने इसे अवास्तविक बजट अनुमान और बजट प्रावधान तथा वास्तविक खर्च के बीच तालमेल की कमी से जोड़कर देखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अनुपूरक बजट के जरिए मूल बजट अनुमान में 28.81 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई थी, लेकिन वास्तविक खर्च मूल बजट से सिर्फ 1.48 प्रतिशत अधिक रहा।

साल के आखिर में खर्च करने की जल्दबाजी पर सवाल
रिपोर्ट में सरकारी खर्च के तरीके पर भी सवाल उठाया गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल सरकारी खर्च का 39.85 प्रतिशत हिस्सा आखिरी तिमाही में हुआ। सीएजी के मुताबिक, इससे यह संकेत मिलता है कि वित्त वर्ष खत्म होने से पहले बड़ी रकम खर्च करने की जल्दबाजी हुई। इस तरह का खर्च बजट प्रबंधन और वित्तीय अनुशासन के लिहाज से चिंता का विषय माना जाता है।

केंद्र प्रायोजित योजनाओं में भी राशि हस्तांतरण में कमी
रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए राज्य सरकार ने जरूरी केंद्रीय हिस्से से 441.29 करोड़ रुपये कम हस्तांतरित किए। इसके अलावा, एकल नोडल एजेंसी को केंद्र और राज्य का हिस्सा पहुंचाने में भी काफी देरी हुई। केंद्र का हिस्सा पहुंचाने में 167 दिन और राज्य का हिस्सा पहुंचाने में 246 दिन तक की देरी सामने आई। सीएजी ने माना कि इस देरी से राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा।

मनरेगा में 44 प्रतिशत पद खाली मिले
ग्रामीण रोजगार योजना के क्रियान्वयन को लेकर भी रिपोर्ट में कई कमियां सामने आई हैं। वर्ष 2019 से 2024 के बीच ग्राम पंचायत स्तर पर काम की मांग और स्थानीय रोजगार की स्थिति का सही आकलन करने के लिए कोई आधारभूत सर्वे नहीं कराया गया। इसके अलावा, योजना के लिए स्वीकृत 13,798 पदों में से 6,086 पद खाली थे। यानी करीब 44 प्रतिशत पदों पर कर्मचारी ही नहीं थे।

कुछ पदों पर 80 प्रतिशत तक रिक्तियां
रिपोर्ट में बताया गया है कि अलग-अलग पदों पर रिक्तियों की स्थिति अलग रही। जिला कार्यक्रम अधिकारी के स्तर पर करीब 16 प्रतिशत पद खाली थे, जबकि कंप्यूटर ऑपरेटर के पदों पर रिक्तियों का आंकड़ा 80 प्रतिशत तक पहुंच गया था। सीएजी ने यह भी बताया कि मार्च 2024 तक विभिन्न क्रियान्वयन एजेंसियों के पास पांच साल से ज्यादा समय से 36.22 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि का समायोजन नहीं हुआ था।

निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल
राज्य रोजगार गारंटी परिषद की कार्यप्रणाली को लेकर भी रिपोर्ट में टिप्पणी की गई है। सीएजी के अनुसार, परिषद की बैठक कितनी बार, कहां और किस प्रक्रिया के तहत होगी, इसके लिए राज्य सरकार ने स्पष्ट नियम नहीं बनाए थे। इसी वजह से 2021 से 2023 के बीच परिषद की सिर्फ तीन बैठकें हुईं। इससे योजना की राज्य स्तर पर निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।

तटबंध निर्माण में 28.97 करोड़ रुपये खर्च बेअसर
जल संसाधन विभाग से जुड़ी एक परियोजना में भी गंभीर खामी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अधवारा बेसिन के तहत कुछ नदियों के किनारे जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण तटबंधों का निर्माण लगातार और एकसाथ नहीं हो सका। इसके चलते जिस इलाके में करीब 5.26 लाख लोगों और 17,400 हेक्टेयर कृषि भूमि को बाढ़ से सुरक्षा देने का लक्ष्य था, वह पूरा नहीं हो पाया। इस पर खर्च हुए 28.97 करोड़ रुपये के प्रभावी इस्तेमाल पर सवाल खड़े हुए हैं।

शिक्षा विभाग को देना पड़ा 8.47 करोड़ रुपये का ब्याज
शिक्षा विभाग से जुड़ी एक अन्य गड़बड़ी में 161 सरकारी इमारतों के सेवा शुल्क का समय पर आकलन और भुगतान नहीं किया गया। यह मामला 1995 से 2023 की अवधि से संबंधित है। समय पर भुगतान नहीं होने के कारण विभाग को 8.47 करोड़ रुपये बतौर दंडात्मक ब्याज देना पड़ा। सीएजी ने इसे ऐसा खर्च माना जिसे समय पर कार्रवाई करके बचाया जा सकता था।

हर घर नल का जल योजना में भी सामने आई कमियां
ग्रामीण इलाकों में नल से पानी पहुंचाने की योजना के क्रियान्वयन पर भी रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। सीएजी के अनुसार, शुरुआत में सही सर्वे नहीं होने के कारण योजना के तहत घरों की पहचान और वास्तविक जरूरत का आकलन भरोसेमंद नहीं रहा। जन स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग 46,633 ग्रामीण वार्डों में 11.22 लाख घरों तक सुविधा नहीं पहुंचा सका। इनमें पानी की गुणवत्ता से प्रभावित इलाकों के 8.07 लाख घर भी शामिल थे।

बिना काम के भुगतान का भी मामला सामने आया
रिपोर्ट में पांच जन स्वास्थ्य प्रमंडलों की जांच के दौरान एक और गंभीर मामला सामने आया। सीएजी के अनुसार, ठेकेदारों को ऐसे कामों के लिए 2.31 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया, जो वास्तव में किए ही नहीं गए थे। यह मामला सरकारी योजनाओं की निगरानी और भुगतान प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इन सभी मामलों के बीच राज्य के उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव की ओर से यह कहा गया है कि राज्य में धन की कोई कमी नहीं है। हालांकि, सीएजी की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े यह सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि जब बजट में पर्याप्त प्रावधान है, तो योजनाओं पर खर्च, खर्च की निगरानी और उसके हिसाब-किताब में इतनी बड़ी कमियां क्यों बनी हुई हैं।

सीएजी ने लंबित प्रमाण-पत्रों को लेकर क्या सुझाव दिया?
सीएजी ने लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्रों के निपटारे के लिए विशेष अभियान चलाने और स्पष्ट समय सीमा तय करने की जरूरत बताई है। साथ ही उन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई है, जिनकी वजह से वर्षों से प्रमाण-पत्र लंबित हैं। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि पिछले खर्च का प्रमाण-पत्र जमा होने तक नई राशि जारी करने की व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए।

डिजिटल निगरानी से पकड़ी जा सकती है गड़बड़ी
सीएजी की सिफारिशों में उपयोगिता प्रमाण-पत्रों की निगरानी को डिजिटल बनाने पर भी जोर दिया गया है। अगर हर विभाग और योजना के खर्च की ऑनलाइन निगरानी हो और यह जानकारी आसानी से उपलब्ध हो कि किस योजना का कितना पैसा खर्च हुआ और उसका प्रमाण-पत्र कब जमा हुआ, तो लंबे समय तक पेंडेंसी को रोकने में मदद मिल सकती है।

92 हजार करोड़ का आंकड़ा क्यों बना सबसे बड़ा सवाल?
सीएजी रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सरकारी खजाने से पैसा जारी होना ही पर्याप्त नहीं है। उस पैसे का सही जगह इस्तेमाल होना और उसका समय पर हिसाब देना भी उतना ही जरूरी है। 92,132.75 करोड़ रुपये से जुड़े 62,632 उपयोगिता प्रमाण-पत्रों का लंबित रहना इसी व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी को सामने लाता है। अब देखना होगा कि बिहार सरकार इन लंबित प्रमाण-पत्रों को लेकर क्या कदम उठाती है और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ती है।

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बिहार में 92 हजार करोड़ रुपये कहां खर्च हुए? CAG रिपोर्ट में बड़ा खुलासा, 5 सरकारी विभागों पर उठे सवाल

By Malay Ojha | Published: 24 July 2026 at 02:24 PM

बिहार में सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों पर खर्च होने वाली बड़ी रकम के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। विधानसभा में पेश नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की वित्त वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2025 तक 92,132.75 करोड़ रुपये से जुड़े 62,632 उपयोगिता प्रमाण-पत्र लंबित थे। यानी सरकारी विभागों ने जिन कामों के लिए पैसा खर्च किया, उसका पूरा हिसाब अभी तक महालेखाकार कार्यालय को नहीं दिया गया है। सबसे ज्यादा लंबित राशि वाले विभागों में स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, शहरी विकास, शिक्षा और पंचायती राज शामिल हैं।

उपयोगिता प्रमाण-पत्र किसी भी सरकारी खर्च का बेहद अहम दस्तावेज होता है। इसके जरिए संबंधित विभाग या एजेंसी यह प्रमाणित करती है कि सरकार से मिली रकम का इस्तेमाल उसी योजना या काम में किया गया, जिसके लिए पैसा जारी हुआ था। ऐसे में हजारों करोड़ रुपये से जुड़े प्रमाण-पत्र लंबे समय तक लंबित रहने से सरकारी धन के इस्तेमाल और उसकी निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

पांच विभागों में सबसे ज्यादा रकम के प्रमाण-पत्र लंबित
रिपोर्ट के अनुसार, लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्रों के मामले में पांच विभाग खास तौर पर सामने आए हैं। इनमें स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, शहरी विकास, शिक्षा और पंचायती राज विभाग शामिल हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने कहा है कि उपयोगिता प्रमाण-पत्र जमा नहीं होने की स्थिति में सरकारी राशि के गलत इस्तेमाल का जोखिम बना रहता है।

सीएजी ने सरकार से जवाबदेही तय करने को कहा
रिपोर्ट में राज्य सरकार को इस मामले पर गंभीरता से निगरानी करने की सलाह दी गई है। संबंधित अधिकारियों और विभागों को समय पर उपयोगिता प्रमाण-पत्र जमा कराने के लिए जवाबदेह बनाने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला बिहार सरकार के वित्त विभाग के सामने भी उठाया गया था, लेकिन जनवरी 2026 से अब तक जवाब का इंतजार है।

आखिर उपयोगिता प्रमाण-पत्र इतना जरूरी क्यों है?
सरकार जब किसी योजना, विकास कार्य या संस्थान के लिए अनुदान या वित्तीय सहायता जारी करती है, तो संबंधित विभाग को बाद में यह बताना होता है कि रकम कहां और किस काम में खर्च हुई। यही जानकारी उपयोगिता प्रमाण-पत्र के जरिए दी जाती है। इससे यह पता चलता है कि स्वीकृत राशि का इस्तेमाल तय उद्देश्य के लिए हुआ या नहीं।

अगली किस्त पर भी पड़ सकता है असर
नियम के मुताबिक, पिछले खर्च का उपयोगिता प्रमाण-पत्र जमा नहीं होने पर आगे की राशि जारी करने में दिक्कत आ सकती है। खासकर केंद्र प्रायोजित योजनाओं में इसका असर गंभीर हो सकता है। समय पर प्रमाण-पत्र नहीं मिलने पर अगली किस्त रुकने का खतरा रहता है, जिससे योजनाओं की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।

बजट में बड़ी रकम रखी गई, लेकिन पूरा खर्च नहीं हुआ
सीएजी की रिपोर्ट में बिहार के बजट प्रबंधन को लेकर भी कई सवाल उठाए गए हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में राज्य का कुल बजट 3,64,518.87 करोड़ रुपये था। इसमें से 2,87,178.49 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके। यानी कुल बजट का करीब 78.78 प्रतिशत हिस्सा ही खर्च हुआ और 77,340.38 करोड़ रुपये की बचत रह गई।

77 हजार करोड़ की बचत में सिर्फ 10 हजार करोड़ रुपये ही सरेंडर
रिपोर्ट के अनुसार, कुल बची हुई रकम में से केवल 10,388.35 करोड़ रुपये ही सरकार को वापस किए गए। सीएजी ने इसे अवास्तविक बजट अनुमान और बजट प्रावधान तथा वास्तविक खर्च के बीच तालमेल की कमी से जोड़कर देखा है। रिपोर्ट के मुताबिक, अनुपूरक बजट के जरिए मूल बजट अनुमान में 28.81 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई थी, लेकिन वास्तविक खर्च मूल बजट से सिर्फ 1.48 प्रतिशत अधिक रहा।

साल के आखिर में खर्च करने की जल्दबाजी पर सवाल
रिपोर्ट में सरकारी खर्च के तरीके पर भी सवाल उठाया गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल सरकारी खर्च का 39.85 प्रतिशत हिस्सा आखिरी तिमाही में हुआ। सीएजी के मुताबिक, इससे यह संकेत मिलता है कि वित्त वर्ष खत्म होने से पहले बड़ी रकम खर्च करने की जल्दबाजी हुई। इस तरह का खर्च बजट प्रबंधन और वित्तीय अनुशासन के लिहाज से चिंता का विषय माना जाता है।

केंद्र प्रायोजित योजनाओं में भी राशि हस्तांतरण में कमी
रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र प्रायोजित योजनाओं के लिए राज्य सरकार ने जरूरी केंद्रीय हिस्से से 441.29 करोड़ रुपये कम हस्तांतरित किए। इसके अलावा, एकल नोडल एजेंसी को केंद्र और राज्य का हिस्सा पहुंचाने में भी काफी देरी हुई। केंद्र का हिस्सा पहुंचाने में 167 दिन और राज्य का हिस्सा पहुंचाने में 246 दिन तक की देरी सामने आई। सीएजी ने माना कि इस देरी से राज्य के खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा।

मनरेगा में 44 प्रतिशत पद खाली मिले
ग्रामीण रोजगार योजना के क्रियान्वयन को लेकर भी रिपोर्ट में कई कमियां सामने आई हैं। वर्ष 2019 से 2024 के बीच ग्राम पंचायत स्तर पर काम की मांग और स्थानीय रोजगार की स्थिति का सही आकलन करने के लिए कोई आधारभूत सर्वे नहीं कराया गया। इसके अलावा, योजना के लिए स्वीकृत 13,798 पदों में से 6,086 पद खाली थे। यानी करीब 44 प्रतिशत पदों पर कर्मचारी ही नहीं थे।

कुछ पदों पर 80 प्रतिशत तक रिक्तियां
रिपोर्ट में बताया गया है कि अलग-अलग पदों पर रिक्तियों की स्थिति अलग रही। जिला कार्यक्रम अधिकारी के स्तर पर करीब 16 प्रतिशत पद खाली थे, जबकि कंप्यूटर ऑपरेटर के पदों पर रिक्तियों का आंकड़ा 80 प्रतिशत तक पहुंच गया था। सीएजी ने यह भी बताया कि मार्च 2024 तक विभिन्न क्रियान्वयन एजेंसियों के पास पांच साल से ज्यादा समय से 36.22 करोड़ रुपये की अग्रिम राशि का समायोजन नहीं हुआ था।

निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल
राज्य रोजगार गारंटी परिषद की कार्यप्रणाली को लेकर भी रिपोर्ट में टिप्पणी की गई है। सीएजी के अनुसार, परिषद की बैठक कितनी बार, कहां और किस प्रक्रिया के तहत होगी, इसके लिए राज्य सरकार ने स्पष्ट नियम नहीं बनाए थे। इसी वजह से 2021 से 2023 के बीच परिषद की सिर्फ तीन बैठकें हुईं। इससे योजना की राज्य स्तर पर निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठते हैं।

तटबंध निर्माण में 28.97 करोड़ रुपये खर्च बेअसर
जल संसाधन विभाग से जुड़ी एक परियोजना में भी गंभीर खामी सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, अधवारा बेसिन के तहत कुछ नदियों के किनारे जमीन उपलब्ध नहीं होने के कारण तटबंधों का निर्माण लगातार और एकसाथ नहीं हो सका। इसके चलते जिस इलाके में करीब 5.26 लाख लोगों और 17,400 हेक्टेयर कृषि भूमि को बाढ़ से सुरक्षा देने का लक्ष्य था, वह पूरा नहीं हो पाया। इस पर खर्च हुए 28.97 करोड़ रुपये के प्रभावी इस्तेमाल पर सवाल खड़े हुए हैं।

शिक्षा विभाग को देना पड़ा 8.47 करोड़ रुपये का ब्याज
शिक्षा विभाग से जुड़ी एक अन्य गड़बड़ी में 161 सरकारी इमारतों के सेवा शुल्क का समय पर आकलन और भुगतान नहीं किया गया। यह मामला 1995 से 2023 की अवधि से संबंधित है। समय पर भुगतान नहीं होने के कारण विभाग को 8.47 करोड़ रुपये बतौर दंडात्मक ब्याज देना पड़ा। सीएजी ने इसे ऐसा खर्च माना जिसे समय पर कार्रवाई करके बचाया जा सकता था।

हर घर नल का जल योजना में भी सामने आई कमियां
ग्रामीण इलाकों में नल से पानी पहुंचाने की योजना के क्रियान्वयन पर भी रिपोर्ट में सवाल उठाए गए हैं। सीएजी के अनुसार, शुरुआत में सही सर्वे नहीं होने के कारण योजना के तहत घरों की पहचान और वास्तविक जरूरत का आकलन भरोसेमंद नहीं रहा। जन स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग 46,633 ग्रामीण वार्डों में 11.22 लाख घरों तक सुविधा नहीं पहुंचा सका। इनमें पानी की गुणवत्ता से प्रभावित इलाकों के 8.07 लाख घर भी शामिल थे।

बिना काम के भुगतान का भी मामला सामने आया
रिपोर्ट में पांच जन स्वास्थ्य प्रमंडलों की जांच के दौरान एक और गंभीर मामला सामने आया। सीएजी के अनुसार, ठेकेदारों को ऐसे कामों के लिए 2.31 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया गया, जो वास्तव में किए ही नहीं गए थे। यह मामला सरकारी योजनाओं की निगरानी और भुगतान प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
इन सभी मामलों के बीच राज्य के उपमुख्यमंत्री और वित्त मंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव की ओर से यह कहा गया है कि राज्य में धन की कोई कमी नहीं है। हालांकि, सीएजी की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़े यह सवाल जरूर खड़ा करते हैं कि जब बजट में पर्याप्त प्रावधान है, तो योजनाओं पर खर्च, खर्च की निगरानी और उसके हिसाब-किताब में इतनी बड़ी कमियां क्यों बनी हुई हैं।

सीएजी ने लंबित प्रमाण-पत्रों को लेकर क्या सुझाव दिया?
सीएजी ने लंबित उपयोगिता प्रमाण-पत्रों के निपटारे के लिए विशेष अभियान चलाने और स्पष्ट समय सीमा तय करने की जरूरत बताई है। साथ ही उन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई है, जिनकी वजह से वर्षों से प्रमाण-पत्र लंबित हैं। रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि पिछले खर्च का प्रमाण-पत्र जमा होने तक नई राशि जारी करने की व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए।

डिजिटल निगरानी से पकड़ी जा सकती है गड़बड़ी
सीएजी की सिफारिशों में उपयोगिता प्रमाण-पत्रों की निगरानी को डिजिटल बनाने पर भी जोर दिया गया है। अगर हर विभाग और योजना के खर्च की ऑनलाइन निगरानी हो और यह जानकारी आसानी से उपलब्ध हो कि किस योजना का कितना पैसा खर्च हुआ और उसका प्रमाण-पत्र कब जमा हुआ, तो लंबे समय तक पेंडेंसी को रोकने में मदद मिल सकती है।

92 हजार करोड़ का आंकड़ा क्यों बना सबसे बड़ा सवाल?
सीएजी रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सरकारी खजाने से पैसा जारी होना ही पर्याप्त नहीं है। उस पैसे का सही जगह इस्तेमाल होना और उसका समय पर हिसाब देना भी उतना ही जरूरी है। 92,132.75 करोड़ रुपये से जुड़े 62,632 उपयोगिता प्रमाण-पत्रों का लंबित रहना इसी व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी को सामने लाता है। अब देखना होगा कि बिहार सरकार इन लंबित प्रमाण-पत्रों को लेकर क्या कदम उठाती है और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कितनी तेजी से आगे बढ़ती है।

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