By Malay Ojha | Published: 01 June 2026 at 11:24 AM
मलेशिया ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। सोमवार से देश में नया कानून लागू हो गया है, जिसके तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर खाता बनाना आसान नहीं रहेगा। अब सभी प्रमुख सोशल मीडिया मंचों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके उपयोगकर्ता निर्धारित आयु सीमा पूरी करते हों। इसके लिए उम्र सत्यापन की व्यवस्था अनिवार्य की गई है।
सरकार का कहना है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया आज बच्चों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इसके साथ कई खतरे भी जुड़े हैं। छोटी उम्र में बच्चों के सामने हिंसक, भ्रामक या मानसिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री पहुंच रही है। इसके अलावा ऑनलाइन उत्पीड़न, गलत जानकारी और घंटों तक मोबाइल पर बने रहने की आदत भी चिंता का विषय बनती जा रही है। इसी वजह से सरकार ने यह फैसला लिया है।
बच्चों की सुरक्षा को बताया फैसले का मुख्य उद्देश्य
सरकारी अधिकारियों के अनुसार इस कानून का मकसद बच्चों को इंटरनेट से दूर करना नहीं है, बल्कि उन्हें सुरक्षित डिजिटल माहौल देना है। सरकार का मानना है कि कम उम्र के बच्चे कई बार ऐसे कंटेंट के संपर्क में आ जाते हैं जो उनके मानसिक और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी तय करना जरूरी हो गया था।
नए नियम के तहत सोशल मीडिया मंचों को ऐसी तकनीक और सुरक्षा व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे कम उम्र के बच्चों की पहचान की जा सके और उन्हें खाता बनाने से रोका जा सके। सरकार ने कंपनियों को इन बदलावों को लागू करने के लिए एक निश्चित समय भी दिया है।
नियम तोड़ने पर कंपनियों पर होगी भारी कार्रवाई
कानून में सख्त दंड का भी प्रावधान रखा गया है। यदि कोई सोशल मीडिया कंपनी आयु सत्यापन की अनिवार्यता का पालन नहीं करती है या नाबालिग बच्चों को खाता बनाने से रोकने में विफल रहती है, तो उस पर लाखों रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि बच्चों की सुरक्षा के मामले में किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
हालांकि एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि यदि कोई बच्चा किसी तकनीकी खामी या अन्य तरीके से खाता बनाने में सफल हो जाता है, तो उसके लिए माता-पिता को दंडित नहीं किया जाएगा। जिम्मेदारी मुख्य रूप से मंच संचालकों की मानी जाएगी।
दुनिया के कई देशों में बढ़ रही सख्ती
बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर चिंता केवल मलेशिया तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कई देशों ने इस दिशा में कड़े कदम उठाए हैं। सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने इस विषय पर दुनिया का ध्यान खींचा था। वहां 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर सख्त प्रतिबंध लागू किया गया।
ऑस्ट्रेलिया में लागू नियमों के तहत कम उम्र के बच्चों के कई लोकप्रिय मंचों पर मौजूद खातों को बंद करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसके बाद अन्य देशों ने भी इसी तरह के उपायों पर विचार करना शुरू किया। ब्राजील और इंडोनेशिया जैसे देशों में भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर कड़े नियम लागू किए गए हैं।
फ्रांस में भी चल रही है कानूनी प्रक्रिया
फ्रांस में भी कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को सीमित करने की दिशा में प्रयास जारी हैं। वहां 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव संसद में लाया गया था। प्रस्ताव को समर्थन भी मिला, लेकिन अभी अंतिम मंजूरी की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। इसलिए यह नियम फिलहाल पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में और अधिक देश बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर इसी तरह के कानून ला सकते हैं। बढ़ती तकनीक के दौर में यह मुद्दा सरकारों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है।
सोशल मीडिया कंपनियों ने जताई चिंता
दूसरी तरफ सोशल मीडिया कंपनियां इस तरह के प्रतिबंधों को लेकर कुछ अलग राय रखती हैं। प्रमुख सोशल मीडिया कंपनी मेटा का कहना है कि ऐसे कानूनों का एक अनचाहा असर भी हो सकता है। कंपनी के मुताबिक बच्चे लोकप्रिय और अपेक्षाकृत सुरक्षित मंचों को छोड़कर ऐसे प्लेटफॉर्म की ओर जा सकते हैं जहां निगरानी और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं।
कंपनी का तर्क है कि यदि बच्चे बिना नियंत्रण वाले मंचों का इस्तेमाल करने लगते हैं तो ऑनलाइन जोखिम कम होने के बजाय बढ़ भी सकते हैं। हालांकि बच्चों की सुरक्षा को लेकर सरकारें और कंपनियां दोनों सहमत हैं, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के तरीकों पर बहस जारी है।
डिजिटल युग की नई चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा आने वाले समय का सबसे बड़ा सामाजिक और तकनीकी मुद्दा बनने जा रही है। एक तरफ इंटरनेट शिक्षा और जानकारी का विशाल माध्यम है, वहीं दूसरी तरफ इसके दुष्प्रभाव भी तेजी से सामने आ रहे हैं। ऐसे में सरकारों, अभिभावकों और तकनीकी कंपनियों को मिलकर ऐसा संतुलन बनाना होगा जिससे बच्चों को तकनीक का लाभ भी मिले और वे संभावित खतरों से भी सुरक्षित रह सकें।

