National

spot_img

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, अब शादीशुदा बेटियों को भी मिलेगा यह बड़ा अधिकार

By Malay Ojha | Published: 02 June 2026 at 06:50 PM

देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर हजारों परिवारों पर पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल विवाह हो जाने भर से किसी बेटी को परिवार के अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि कोई विवाहित बेटी अपने माता-पिता पर आश्रित रही है और सभी आवश्यक पात्रताओं को पूरा करती है, तो उसे अनुकंपा के आधार पर रोजगार या अन्य संबंधित लाभों से बाहर नहीं किया जा सकता।

यह मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा था, जिसने अपनी मां के निधन के बाद उचित मूल्य की दुकान के लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। महिला विवाहित थी, लेकिन विवाह के बाद भी अपने मायके में रह रही थी। वह अपनी मां के साथ दुकान के संचालन में सहयोग करती थी और परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन भी कर रही थी।

परिवार की जिम्मेदारी निभाने के बावजूद मिला था झटका
महिला की एक दिव्यांग बहन भी थी, जिसकी देखभाल की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी। मां के निधन के बाद उसने दुकान के लाइसेंस के लिए आवेदन किया, लेकिन केवल इस आधार पर उसका आवेदन खारिज कर दिया गया कि वह विवाहित है और सरकारी आदेश के अनुसार परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं मानी जाती।

पुराने सरकारी आदेश पर उठे सवाल
महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और वर्ष 2019 के उस सरकारी आदेश को चुनौती दी, जिसमें विवाहित बेटियों को परिवार की श्रेणी से बाहर रखा गया था। याचिका में कहा गया कि यह व्यवस्था महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में रहे अलग-अलग मत
इस मुद्दे पर पहले भी अलग-अलग मामलों में अलग-अलग राय सामने आ चुकी थी। एक फैसले में अदालत ने माना था कि विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर रखना असंवैधानिक है। वहीं दूसरे फैसलों में कहा गया कि सरकारी आदेश में प्रयुक्त “अविवाहित पुत्री” शब्द भेदभावपूर्ण नहीं माना जा सकता। इन्हीं विरोधाभासी निर्णयों के कारण मामला अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति उसके अधिकारों को निर्धारित करने का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने माना कि यदि विवाहित पुत्रों को ऐसे मामलों में पात्र माना जा सकता है, तो केवल विवाह के आधार पर पुत्रियों को बाहर रखना संविधान की भावना के विपरीत होगा।

समानता के अधिकार को बताया सर्वोपरि
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करते हैं। इसलिए विवाहित बेटियों को केवल उनकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर लाभों से वंचित करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

पीठ ने यह भी कहा कि कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को सहायता देना होता है, न कि परिवार के सदस्यों के साथ भेदभाव करना।

अन्य उच्च न्यायालयों के फैसलों को मिली मजबूती
सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में बंबई उच्च न्यायालय और कर्नाटक उच्च न्यायालय के उन निर्णयों का समर्थन किया, जिनमें कहा गया था कि विवाह किसी बेटी के अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह के बाद भी यदि बेटी परिवार की जिम्मेदारियां निभा रही है और आश्रित है, तो उसे लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विपरीत फैसले निरस्त
सर्वोच्च अदालत ने उन सभी पूर्व निर्णयों को प्रभावहीन मान लिया, जिनमें विवाहित बेटियों के दावों को अस्वीकार किया गया था। अदालत ने कहा कि ऐसे निर्णय संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं।

चार सप्ताह में लाइसेंस जारी करने का आदेश
मामले के तथ्यों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता विवाह के बाद भी अपने परिवार के साथ रह रही थी और दुकान के संचालन में सक्रिय भूमिका निभा रही थी। इसलिए उसका आवेदन खारिज करना पूरी तरह अनुचित था।

फैसले का दूरगामी असर
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर महिला के पक्ष में वैध लाइसेंस जारी करने का निर्देश दिया। माना जा रहा है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे हजारों मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां विवाहित बेटियों को केवल शादीशुदा होने के कारण अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है।

यह निर्णय न केवल महिलाओं के अधिकारों को मजबूती देता है बल्कि यह भी संदेश देता है कि विवाह किसी बेटी के पारिवारिक दायित्वों और अधिकारों को समाप्त नहीं करता।

📢 बड़ी खबर आते ही सबसे पहले जानना चाहते हैं?
Aryavarta Live के WhatsApp Channel से जुड़ें और हर महत्वपूर्ण अपडेट सीधे अपने मोबाइल पर पाएं।

WhatsApp चैनल जॉइन करें
Breaking Hindi News और ताज़ा अपडेट्स पाएं सबसे पहले Aryavarta Live पर। यहां आपको भारत, पाकिस्तान, अमेरिका समेत दुनिया भर की महत्वपूर्ण खबरें मिलेंगी। खेल, मनोरंजन, व्यापार, टेक्नोलॉजी, क्राइम, उत्तर प्रदेश और बिहार की हर बड़ी खबर पढ़ने के लिए जुड़े रहें Aryavarta Live के साथ।

International

spot_img

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, अब शादीशुदा बेटियों को भी मिलेगा यह बड़ा अधिकार

By Malay Ojha | Published: 02 June 2026 at 06:50 PM

देश की सर्वोच्च अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका असर हजारों परिवारों पर पड़ सकता है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल विवाह हो जाने भर से किसी बेटी को परिवार के अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि कोई विवाहित बेटी अपने माता-पिता पर आश्रित रही है और सभी आवश्यक पात्रताओं को पूरा करती है, तो उसे अनुकंपा के आधार पर रोजगार या अन्य संबंधित लाभों से बाहर नहीं किया जा सकता।

यह मामला एक ऐसी महिला से जुड़ा था, जिसने अपनी मां के निधन के बाद उचित मूल्य की दुकान के लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। महिला विवाहित थी, लेकिन विवाह के बाद भी अपने मायके में रह रही थी। वह अपनी मां के साथ दुकान के संचालन में सहयोग करती थी और परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन भी कर रही थी।

परिवार की जिम्मेदारी निभाने के बावजूद मिला था झटका
महिला की एक दिव्यांग बहन भी थी, जिसकी देखभाल की जिम्मेदारी उसी के कंधों पर थी। मां के निधन के बाद उसने दुकान के लाइसेंस के लिए आवेदन किया, लेकिन केवल इस आधार पर उसका आवेदन खारिज कर दिया गया कि वह विवाहित है और सरकारी आदेश के अनुसार परिवार की परिभाषा में शामिल नहीं मानी जाती।

पुराने सरकारी आदेश पर उठे सवाल
महिला ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और वर्ष 2019 के उस सरकारी आदेश को चुनौती दी, जिसमें विवाहित बेटियों को परिवार की श्रेणी से बाहर रखा गया था। याचिका में कहा गया कि यह व्यवस्था महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में रहे अलग-अलग मत
इस मुद्दे पर पहले भी अलग-अलग मामलों में अलग-अलग राय सामने आ चुकी थी। एक फैसले में अदालत ने माना था कि विवाहित बेटियों को परिवार की परिभाषा से बाहर रखना असंवैधानिक है। वहीं दूसरे फैसलों में कहा गया कि सरकारी आदेश में प्रयुक्त “अविवाहित पुत्री” शब्द भेदभावपूर्ण नहीं माना जा सकता। इन्हीं विरोधाभासी निर्णयों के कारण मामला अंततः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक आराधे की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि किसी महिला की वैवाहिक स्थिति उसके अधिकारों को निर्धारित करने का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने माना कि यदि विवाहित पुत्रों को ऐसे मामलों में पात्र माना जा सकता है, तो केवल विवाह के आधार पर पुत्रियों को बाहर रखना संविधान की भावना के विपरीत होगा।

समानता के अधिकार को बताया सर्वोपरि
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 सभी नागरिकों को समान अधिकार प्रदान करते हैं। इसलिए विवाहित बेटियों को केवल उनकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर लाभों से वंचित करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

पीठ ने यह भी कहा कि कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य जरूरतमंद परिवारों को सहायता देना होता है, न कि परिवार के सदस्यों के साथ भेदभाव करना।

अन्य उच्च न्यायालयों के फैसलों को मिली मजबूती
सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में बंबई उच्च न्यायालय और कर्नाटक उच्च न्यायालय के उन निर्णयों का समर्थन किया, जिनमें कहा गया था कि विवाह किसी बेटी के अधिकारों को समाप्त नहीं कर सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि विवाह के बाद भी यदि बेटी परिवार की जिम्मेदारियां निभा रही है और आश्रित है, तो उसे लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के विपरीत फैसले निरस्त
सर्वोच्च अदालत ने उन सभी पूर्व निर्णयों को प्रभावहीन मान लिया, जिनमें विवाहित बेटियों के दावों को अस्वीकार किया गया था। अदालत ने कहा कि ऐसे निर्णय संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं हैं।

चार सप्ताह में लाइसेंस जारी करने का आदेश
मामले के तथ्यों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता विवाह के बाद भी अपने परिवार के साथ रह रही थी और दुकान के संचालन में सक्रिय भूमिका निभा रही थी। इसलिए उसका आवेदन खारिज करना पूरी तरह अनुचित था।

फैसले का दूरगामी असर
सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को चार सप्ताह के भीतर महिला के पक्ष में वैध लाइसेंस जारी करने का निर्देश दिया। माना जा रहा है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे हजारों मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां विवाहित बेटियों को केवल शादीशुदा होने के कारण अधिकारों से वंचित किया जाता रहा है।

यह निर्णय न केवल महिलाओं के अधिकारों को मजबूती देता है बल्कि यह भी संदेश देता है कि विवाह किसी बेटी के पारिवारिक दायित्वों और अधिकारों को समाप्त नहीं करता।

📢 बड़ी खबर आते ही सबसे पहले जानना चाहते हैं?
Aryavarta Live के WhatsApp Channel से जुड़ें और हर महत्वपूर्ण अपडेट सीधे अपने मोबाइल पर पाएं।

WhatsApp चैनल जॉइन करें
Breaking Hindi News और ताज़ा अपडेट्स पाएं सबसे पहले Aryavarta Live पर। यहां आपको भारत, पाकिस्तान, अमेरिका समेत दुनिया भर की महत्वपूर्ण खबरें मिलेंगी। खेल, मनोरंजन, व्यापार, टेक्नोलॉजी, क्राइम, उत्तर प्रदेश और बिहार की हर बड़ी खबर पढ़ने के लिए जुड़े रहें Aryavarta Live के साथ।

National

spot_img

International

spot_img
RELATED ARTICLES