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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने अमित शाह के ‘अंगद के पैर’ वाले बयान पर उठाए सवाल, योगी सरकार को लेकर कही बड़ी बात

By Malay Ojha | Published: 04 November 2026 at 01:02 PM

गृहमंत्री अमित शाह के उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार की स्थिति को ‘अंगद के पैर’ जैसा बताने वाले बयान पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अंगद का पैर किसी सत्ता, अहंकार या राजनीतिक ताकत के कारण नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के धर्म, सत्य और न्याय की शक्ति से जमा था। राजनीतिक नेताओं को धार्मिक ग्रंथों के प्रसंगों का इस्तेमाल करते समय उनके वास्तविक अर्थ को भी समझना चाहिए।

अंगद के पैर का उदाहरण देकर अमित शाह को समझाया अर्थ
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि रामायण में अंगद का प्रसंग केवल शक्ति प्रदर्शन का उदाहरण नहीं है। अंगद ने रावण की सभा में अपना पैर इसलिए जमाया था, क्योंकि उनके पीछे भगवान श्रीराम के धर्म, सत्य और न्याय की शक्ति थी। इसे किसी राजनीतिक सत्ता या शासक के अहंकार से जोड़कर देखना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि धर्मग्रंथों के रूपकों को अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करना धर्म का सम्मान नहीं है। ऐसा करने से धार्मिक प्रसंगों का वास्तविक अर्थ ही बदल जाता है। राजनीतिज्ञों को इन प्रसंगों की मूल भावना समझने की जरूरत है।

योगी सरकार को रामराज्य मानने से किया इनकार
शंकराचार्य ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जिस शासन में बटुकों की चोटियां खींची जाएं, संतों पर निर्ममता से प्रहार किया जाए और लाखों गौमाताओं को कटवाया जाए, उसकी तुलना रामराज्य से नहीं की जा सकती।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि रामराज्य की पहचान धर्म, न्याय, मर्यादा और जीवों के प्रति करुणा से होती है। ऐसे में केवल धार्मिक प्रतीकों और प्रसंगों का उल्लेख करने से किसी शासन व्यवस्था को रामराज्य नहीं कहा जा सकता।

काशी से गुजरात रवाना होने से पहले दिया बयान
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने यह टिप्पणी श्रीकाशी से गुजरात रवाना होने से पहले अपने प्रवचन के दौरान की। उनके मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने इसकी जानकारी दी।

दरअसल, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार की स्थिति की तुलना रामायण के पात्र अंगद के पैर से की थी। इसी संदर्भ में शंकराचार्य ने अंगद के प्रसंग का उल्लेख करते हुए राजनीतिक सत्ता और धर्म के बीच अंतर समझाने की कोशिश की।

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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने अमित शाह के ‘अंगद के पैर’ वाले बयान पर उठाए सवाल, योगी सरकार को लेकर कही बड़ी बात

By Malay Ojha | Published: 04 November 2026 at 01:02 PM

गृहमंत्री अमित शाह के उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार की स्थिति को ‘अंगद के पैर’ जैसा बताने वाले बयान पर शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि अंगद का पैर किसी सत्ता, अहंकार या राजनीतिक ताकत के कारण नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के धर्म, सत्य और न्याय की शक्ति से जमा था। राजनीतिक नेताओं को धार्मिक ग्रंथों के प्रसंगों का इस्तेमाल करते समय उनके वास्तविक अर्थ को भी समझना चाहिए।

अंगद के पैर का उदाहरण देकर अमित शाह को समझाया अर्थ
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि रामायण में अंगद का प्रसंग केवल शक्ति प्रदर्शन का उदाहरण नहीं है। अंगद ने रावण की सभा में अपना पैर इसलिए जमाया था, क्योंकि उनके पीछे भगवान श्रीराम के धर्म, सत्य और न्याय की शक्ति थी। इसे किसी राजनीतिक सत्ता या शासक के अहंकार से जोड़कर देखना उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि धर्मग्रंथों के रूपकों को अपनी राजनीतिक सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करना धर्म का सम्मान नहीं है। ऐसा करने से धार्मिक प्रसंगों का वास्तविक अर्थ ही बदल जाता है। राजनीतिज्ञों को इन प्रसंगों की मूल भावना समझने की जरूरत है।

योगी सरकार को रामराज्य मानने से किया इनकार
शंकराचार्य ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन पर भी तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि जिस शासन में बटुकों की चोटियां खींची जाएं, संतों पर निर्ममता से प्रहार किया जाए और लाखों गौमाताओं को कटवाया जाए, उसकी तुलना रामराज्य से नहीं की जा सकती।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि रामराज्य की पहचान धर्म, न्याय, मर्यादा और जीवों के प्रति करुणा से होती है। ऐसे में केवल धार्मिक प्रतीकों और प्रसंगों का उल्लेख करने से किसी शासन व्यवस्था को रामराज्य नहीं कहा जा सकता।

काशी से गुजरात रवाना होने से पहले दिया बयान
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने यह टिप्पणी श्रीकाशी से गुजरात रवाना होने से पहले अपने प्रवचन के दौरान की। उनके मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने इसकी जानकारी दी।

दरअसल, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार की स्थिति की तुलना रामायण के पात्र अंगद के पैर से की थी। इसी संदर्भ में शंकराचार्य ने अंगद के प्रसंग का उल्लेख करते हुए राजनीतिक सत्ता और धर्म के बीच अंतर समझाने की कोशिश की।

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