By Malay Ojha | Published: 22 August 2026 at 03:31 PM
बिहार में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच कथित टकराव को लेकर राष्ट्रीय जनता दल ने राज्य सरकार पर हमला बोला है। राजद नेता एजाज अहमद ने आरोप लगाया कि सरकार बार-बार अधिकारियों को सांसद, विधायक और पंचायती राज प्रतिनिधियों के प्रोटोकॉल और सम्मान का ध्यान रखने के निर्देश देती है, लेकिन इसके बावजूद स्थिति नहीं बदल रही। उन्होंने मधुबनी की एक बैठक का हवाला देते हुए कहा कि अधिकारियों के नहीं पहुंचने के कारण सांसदों और विधायकों के साथ होने वाली बैठक स्थगित करनी पड़ी।
एजाज अहमद ने कहा कि मधुबनी में हाल ही में सांसदों और विधायकों के साथ होने वाली बैठक में जिला अधिकारी के शामिल नहीं होने के कारण बैठक स्थगित करनी पड़ी। उन्होंने इसे बेहद गंभीर स्थिति बताते हुए कहा कि अधिकारी की गैरमौजूदगी के कारण जनप्रतिनिधियों की बैठक का रुक जाना प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
‘अधिकारी नहीं आए तो बैठक ही स्थगित’
राजद नेता ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की बैठक में संबंधित अधिकारी की मौजूदगी इसलिए जरूरी होती है, क्योंकि उनके क्षेत्र की जनता से जुड़े कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर उसी बैठक में चर्चा होती है। अगर अधिकारी ही बैठक में मौजूद नहीं होंगे तो सांसद और विधायक अपने क्षेत्र की समस्याओं को प्रशासन के सामने किस तरह रखेंगे और उनका समाधान कैसे होगा, यह बड़ा सवाल है।
प्रोटोकॉल के लिए सरकार बार-बार कर रही पत्राचार
एजाज अहमद के मुताबिक बिहार सरकार की ओर से समय-समय पर अधिकारियों और पदाधिकारियों को प्रोटोकॉल का पालन करने के लिए पत्र भेजे जाते हैं। इन पत्रों में सांसदों, विधायकों और पंचायती राज प्रतिनिधियों के सम्मान के साथ उनके फोन और जनहित से जुड़े कामों को प्राथमिकता देने की बात भी कही जाती है। इसके बावजूद जमीन पर तस्वीर अलग दिखाई दे रही है।
फोन तक को प्राथमिकता नहीं मिलने का आरोप
राजद नेता ने आरोप लगाया कि अधिकारियों की ओर से जनप्रतिनिधियों के फोन और उनके द्वारा उठाए जाने वाले जनहित के मामलों को भी अपेक्षित प्राथमिकता नहीं दी जाती। उन्होंने कहा कि सांसद या विधायक अपने क्षेत्र की जनता की समस्याओं को लेकर अधिकारियों से संपर्क करते हैं, लेकिन जब उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जाता तो इसका सीधा असर आम लोगों के काम पर पड़ता है।
‘मनोबल इतना बढ़ गया कि बैठक में भी नहीं आते’
एजाज अहमद ने कहा कि अधिकारियों का मनोबल इस कदर बढ़ गया है कि अब वे सांसदों, विधायकों और दूसरे जनप्रतिनिधियों की बैठकों में भी नहीं पहुंच रहे हैं। उनका कहना है कि प्रशासनिक अधिकारियों का निर्वाचित प्रतिनिधियों के प्रति ऐसा रवैया लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
‘आजादी के बाद ऐसी घटना नहीं देखी’
एजाज अहमद ने मधुबनी की घटना को लेकर बेहद तीखा दावा किया। उन्होंने कहा कि देश की आजादी के बाद यह पहली बार हुआ है कि किसी अधिकारी के बैठक में नहीं पहुंचने के कारण बैठक ही स्थगित करनी पड़ी। हालांकि यह उनका राजनीतिक बयान है और इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि इस खबर में नहीं की जा रही है।
लोकतंत्र बनाम अफसरशाही का सवाल
राजद नेता ने आरोप लगाया कि बिहार में अब लोकतंत्र पर अफसरशाही भारी पड़ती दिखाई दे रही है। उनके मुताबिक जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर विधानसभा, संसद और पंचायतों तक भेजती है, लेकिन अगर उन्हीं प्रतिनिधियों को प्रशासनिक स्तर पर महत्व नहीं मिलेगा तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होगी।
‘जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होते हैं’
एजाज अहमद ने कहा कि सांसद और विधायक किसी व्यक्ति के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आवाज होते हैं। इसी तरह पंचायत स्तर के चुने हुए प्रतिनिधि भी अपने इलाके के लोगों की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाते हैं। इसलिए अधिकारियों का दायित्व है कि वे निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार व्यवहार करें।
एनडीए सरकार पर सीधा हमला
राजद नेता ने सवाल उठाया कि आखिर एनडीए सरकार के कार्यकाल में ही अधिकारियों के प्रोटोकॉल को लेकर बार-बार शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं। उन्होंने कहा कि सरकार खुद अधिकारियों को नियमों का पालन करने के निर्देश दे रही है, फिर भी अगर अधिकारी उन निर्देशों को नजरअंदाज कर रहे हैं तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है।
‘पत्र निकलते हैं, लेकिन असर नहीं होता’
एजाज अहमद ने कहा कि सिर्फ सरकारी पत्र जारी कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। अगर किसी अधिकारी को प्रोटोकॉल का पालन करने का निर्देश दिया जाता है और उसके बाद भी वह उसका पालन नहीं करता, तो सरकार को यह भी देखना चाहिए कि ऐसे मामलों में कार्रवाई क्यों नहीं होती। उनके मुताबिक जवाबदेही तय किए बिना सिर्फ पत्राचार करने से व्यवस्था में बदलाव नहीं आएगा।
संरक्षण का आरोप, सरकार से मांगा जवाब
राजद नेता ने आरोप लगाया कि सरकार के भीतर बैठे बड़े नेताओं के संरक्षण के कारण कुछ अधिकारी मनमानी कर रहे हैं। उनका दावा है कि ऐसे अधिकारियों को राजनीतिक संरक्षण मिलने की वजह से वे जनप्रतिनिधियों के सम्मान और प्रोटोकॉल की परवाह नहीं करते। हालांकि उन्होंने अपने बयान में किसी खास नेता या अधिकारी का नाम नहीं लिया।
अधिकारियों और नेताओं के बीच तालमेल क्यों जरूरी?
सांसद और विधायक अपने क्षेत्र में सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और दूसरी समस्याओं को लेकर अधिकारियों से लगातार संपर्क में रहते हैं। किसी इलाके में विकास से जुड़ी योजना हो या किसी समस्या का तत्काल समाधान, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल के बिना काम आगे बढ़ाना मुश्किल होता है। इसलिए दोनों के बीच संवाद और सम्मान लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा माना जाता है।
बैठक में अधिकारी नहीं तो जनता के सवालों का क्या होगा?
एजाज अहमद ने कहा कि जनप्रतिनिधियों की बैठक केवल औपचारिक कार्यक्रम नहीं होती। उसमें जनता की समस्याओं और सरकारी योजनाओं की प्रगति पर चर्चा होती है। अधिकारी मौजूद नहीं होंगे तो कई सवालों का जवाब नहीं मिलेगा और समस्याएं आगे बढ़ती रहेंगी। उनका कहना है कि इसका नुकसान अंततः आम जनता को ही उठाना पड़ता है।
राजद ने सरकार की नीयत पर उठाए सवाल
राजद नेता ने कहा कि अगर सरकार वास्तव में प्रोटोकॉल और जनप्रतिनिधियों के सम्मान को लेकर गंभीर है तो उसे अधिकारियों के व्यवहार की निगरानी करनी चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि बार-बार पत्र जारी करने के बावजूद अगर वही शिकायतें दोहराई जा रही हैं तो सरकार की व्यवस्था में कमी कहां है।
मामला अब राजनीतिक मुद्दा बनने की ओर
मधुबनी की बैठक का मुद्दा सामने आने के बाद राजद ने इसे केवल एक प्रशासनिक घटना के तौर पर नहीं, बल्कि सरकार के कामकाज और लोकतांत्रिक व्यवस्था से जोड़ दिया है। एजाज अहमद के बयान से साफ है कि विपक्ष आने वाले दिनों में अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच कथित दूरी को राजनीतिक मुद्दा बना सकता है।
सरकार के जवाब से साफ होगी तस्वीर
फिलहाल एजाज अहमद के आरोपों पर सरकार या संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में मधुबनी की बैठक में वास्तव में क्या परिस्थितियां थीं, अधिकारी क्यों शामिल नहीं हुए और बैठक स्थगित करने की नौबत क्यों आई, इन सवालों का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।
‘लोकतंत्र में अधिकारी नहीं, जनता सर्वोपरि’
एजाज अहमद ने अंत में कहा कि लोकतंत्र में अधिकारी व्यवस्था चलाने की जिम्मेदारी निभाते हैं, जबकि जनप्रतिनिधि जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं। दोनों के बीच टकराव की स्थिति किसी के हित में नहीं है। उनका कहना है कि अधिकारियों को नियमों और प्रोटोकॉल का पालन करते हुए जनप्रतिनिधियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए, ताकि जनता से जुड़े काम बिना रुकावट आगे बढ़ सकें।
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