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राहुल गांधी के मनुस्मृति बयान पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का पलटवार, कहा- शास्त्रों पर टिप्पणी से पहले करें अध्ययन

By Malay Ojha | Published: 26 August 2026 at 04:01 PM

पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में राहुल गांधी के मनुस्मृति और सनातन परंपरा से जुड़े बयान पर ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि धार्मिक ग्रंथों के श्लोकों को उनके मूल संदर्भ से अलग करके पेश करना उचित नहीं है। शंकराचार्य ने राहुल गांधी से सनातन धर्मग्रंथों पर टिप्पणी करने से पहले उनका गंभीर अध्ययन करने की बात कही।

शंकराचार्य ने राहुल गांधी द्वारा उद्धृत किए गए मनुस्मृति के श्लोक ‘पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने…’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे केवल स्त्री की परतंत्रता के अर्थ में देखना सही नहीं है। उनके अनुसार इस श्लोक की व्याख्या उसके शास्त्रीय और व्यावहारिक संदर्भ में की जानी चाहिए।

बोले- राजनीतिक लाभ के लिए शास्त्रों का इस्तेमाल ठीक नहीं
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि राजनीतिक बहस के लिए प्राचीन धर्मग्रंथों के अंशों को संदर्भ से हटाकर पेश करने से समाज में गलत संदेश जाता है। उन्होंने इसे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के प्रति अनुचित रवैया बताया और कहा कि किसी भी धर्मग्रंथ की बात रखने से पहले उसके अर्थ और संदर्भ को समझना जरूरी है।

राहुल गांधी के पुराने बयानों का भी जिक्र
शंकराचार्य ने कहा कि राहुल गांधी की ओर से मनुस्मृति को लेकर पहले भी कई बयान दिए जा चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे बयानों से सनातन धर्म और हिंदू धर्मशास्त्रों को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा होती है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर धर्मग्रंथों के बारे में बोलते समय तथ्य और शास्त्रीय आधार का ध्यान रखा जाना चाहिए।

कांग्रेस को भी दी बयानबाजी से बचने की सलाह
शंकराचार्य ने राहुल गांधी और कांग्रेस को सलाह दी कि बिना पर्याप्त शास्त्रीय जानकारी के सनातन धर्मग्रंथों पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि इस तरह के बयान आगे भी जारी रहे तो सनातन परंपरा में विश्वास रखने वाला समाज इसका विरोध करता रहेगा।

मीडिया प्रभारी ने दी जानकारी
शंकराचार्य की प्रतिक्रिया की जानकारी उनके मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने दी। बयान में कहा गया कि सनातन धर्म और उसके धर्मग्रंथों को लेकर किसी भी सार्वजनिक टिप्पणी में उनके मूल संदर्भ और अर्थ को समझना जरूरी है।

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राहुल गांधी के मनुस्मृति बयान पर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का पलटवार, कहा- शास्त्रों पर टिप्पणी से पहले करें अध्ययन

By Malay Ojha | Published: 26 August 2026 at 04:01 PM

पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में राहुल गांधी के मनुस्मृति और सनातन परंपरा से जुड़े बयान पर ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि धार्मिक ग्रंथों के श्लोकों को उनके मूल संदर्भ से अलग करके पेश करना उचित नहीं है। शंकराचार्य ने राहुल गांधी से सनातन धर्मग्रंथों पर टिप्पणी करने से पहले उनका गंभीर अध्ययन करने की बात कही।

शंकराचार्य ने राहुल गांधी द्वारा उद्धृत किए गए मनुस्मृति के श्लोक ‘पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने…’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे केवल स्त्री की परतंत्रता के अर्थ में देखना सही नहीं है। उनके अनुसार इस श्लोक की व्याख्या उसके शास्त्रीय और व्यावहारिक संदर्भ में की जानी चाहिए।

बोले- राजनीतिक लाभ के लिए शास्त्रों का इस्तेमाल ठीक नहीं
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि राजनीतिक बहस के लिए प्राचीन धर्मग्रंथों के अंशों को संदर्भ से हटाकर पेश करने से समाज में गलत संदेश जाता है। उन्होंने इसे भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के प्रति अनुचित रवैया बताया और कहा कि किसी भी धर्मग्रंथ की बात रखने से पहले उसके अर्थ और संदर्भ को समझना जरूरी है।

राहुल गांधी के पुराने बयानों का भी जिक्र
शंकराचार्य ने कहा कि राहुल गांधी की ओर से मनुस्मृति को लेकर पहले भी कई बयान दिए जा चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे बयानों से सनातन धर्म और हिंदू धर्मशास्त्रों को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा होती है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक मंचों पर धर्मग्रंथों के बारे में बोलते समय तथ्य और शास्त्रीय आधार का ध्यान रखा जाना चाहिए।

कांग्रेस को भी दी बयानबाजी से बचने की सलाह
शंकराचार्य ने राहुल गांधी और कांग्रेस को सलाह दी कि बिना पर्याप्त शास्त्रीय जानकारी के सनातन धर्मग्रंथों पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि इस तरह के बयान आगे भी जारी रहे तो सनातन परंपरा में विश्वास रखने वाला समाज इसका विरोध करता रहेगा।

मीडिया प्रभारी ने दी जानकारी
शंकराचार्य की प्रतिक्रिया की जानकारी उनके मीडिया प्रभारी संजय पाण्डेय ने दी। बयान में कहा गया कि सनातन धर्म और उसके धर्मग्रंथों को लेकर किसी भी सार्वजनिक टिप्पणी में उनके मूल संदर्भ और अर्थ को समझना जरूरी है।

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