By Malay Ojha | Published: 26 August 2026 at 03:55 PM
वाराणसी के दुर्गाघाट स्थित देव निवास में मराठी समाज के ऋग्वेदी ब्राह्मणों ने श्रवण नक्षत्र में श्रावणी उपाकर्म संस्कार किया। पं. श्रीनिवास देव के आचार्यत्व में आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान में 30 से अधिक ऋग्वेदी ब्राह्मण शामिल हुए। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पुराने यज्ञोपवीत को बदलकर अभिमंत्रित नया यज्ञोपवीत धारण किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत गणपति पूजन और हवन से हुई। इसके बाद दुर्गाघाट पर देव तर्पण, ऋषि तर्पण और पितृ तर्पण किया गया। सप्तऋषियों का पूजन, सूर्योपासना और मां गायत्री की वैदिक मंत्रों के साथ पूजा की गई। अनुष्ठान के दौरान पूरे वातावरण में वैदिक मंत्रों की गूंज सुनाई देती रही।
आत्मशुद्धि और प्रायश्चित से जुड़ा है संस्कार
पं. श्रीनिवास देव ने बताया कि श्रावणी उपाकर्म वैदिक काल से चली आ रही परंपरा है। इसका उद्देश्य वर्षभर में जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए प्रायश्चित करना, आत्मशुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करना है। इसके प्रमुख अंग प्रायश्चित, संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय माने गए हैं।
नदी और जलाशय के तट पर होता है अनुष्ठान
उन्होंने बताया कि यह संस्कार आम तौर पर नदी या सरोवर के तट पर व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से किया जाता है। इसमें हेमाद्रि स्नान सहित बाहरी और आंतरिक शुद्धि की धार्मिक प्रक्रिया पूरी की जाती है। वैदिक मंत्रों के साथ भस्म, कुशा, अपामार्ग और नदी की रज आदि का भी विधान में उपयोग किया जाता है।
यज्ञोपवीत का किया गया पूजन
श्रावणी उपाकर्म के दौरान वर्षभर धारण किए जाने वाले यज्ञोपवीतों का विधिवत पूजन कर उन्हें अभिमंत्रित किया गया। इसके बाद ब्राह्मणों ने पुराने यज्ञोपवीत को उतारकर नया अभिमंत्रित यज्ञोपवीत धारण किया। इस प्रक्रिया को श्रावणी संस्कार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
30 से अधिक ऋग्वेदी ब्राह्मण हुए शामिल
अनुष्ठान में संतोष सोलापुरकर, श्रीनिधि देव, संदीप कोटेकर, माधव जनार्दन रटाटे, अनिल किंजवडेकर, प्रवीण पटवर्धन, मुकुंद केलकर, उल्हास गुरुजी, रतन पुण्तांबेकर, राकेश केलकर, राहुल बक्षी, गजानन सोमण, अरुण भागवत और विजय भारदे सहित 30 से अधिक ऋग्वेदी ब्राह्मण उपस्थित रहे।
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