By Malay Ojha | Published: 30 June 2026 at 08:58 PM
अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े कथित चढ़ावा गड़बड़ी मामले ने नया मोड़ ले लिया है। पहली बार श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उसके महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा ने अपने-अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि ट्रस्ट ने साफ किया है कि इन इस्तीफों पर अंतिम फैसला अगली बैठक में लिया जाएगा। दूसरी ओर, ट्रस्ट का कहना है कि श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई गई नकदी, चांदी की ईंटें, सोना, आभूषण और अन्य कीमती सामान पूरी तरह सुरक्षित हैं और उनका पूरा रिकॉर्ड मौजूद है।
इस पूरे विवाद की शुरुआत मंदिर में आए चढ़ावे के कथित गबन के आरोपों से हुई। आरोप लगाया गया कि दान पेटियों से निकली वास्तविक राशि और रिकॉर्ड में दर्ज रकम में अंतर था। इसके साथ ही सोने-चांदी समेत अन्य बहुमूल्य वस्तुओं के हिसाब-किताब को लेकर भी सवाल उठाए गए। मामले के सामने आने के बाद जांच शुरू हुई और कई लोगों की गिरफ्तारी भी हुई। इसी वजह से अब ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और उसके अधिकारों पर भी चर्चा तेज हो गई है।
जांच कहां तक पहुंची और अब तक क्या कार्रवाई हुई?
जांच के दौरान गठित विशेष जांच दल ने अपनी रिपोर्ट गृह विभाग को सौंपते हुए मुकदमा दर्ज करने की सिफारिश की। इसके बाद ट्रस्ट सदस्य कृष्ण मोहन की शिकायत पर मामला दर्ज हुआ और आठ लोगों को गिरफ्तार किया गया। अदालत ने सभी आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इसी बीच निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा ने अपने पद छोड़ने का फैसला किया। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी ने बताया कि इन इस्तीफों पर अंतिम निर्णय ट्रस्ट की अगली बैठक में लिया जाएगा।
राम मंदिर ट्रस्ट आखिर बना कैसे था?
राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले के बाद मंदिर निर्माण के लिए अलग ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया गया था। इसके बाद केंद्र सरकार ने पांच फरवरी दो हजार बीस को संसद में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की। इस ट्रस्ट को मंदिर निर्माण, संचालन, दान, वित्तीय प्रबंधन और प्रशासन की जिम्मेदारी सौंपी गई। शुरुआत से ही इसे एक स्वतंत्र संस्था के रूप में स्थापित किया गया था।
क्या केंद्र सरकार ट्रस्ट के फैसलों में दखल दे सकती है?
इस सवाल को लेकर अक्सर लोगों के मन में भ्रम रहता है। सरकार पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि ट्रस्ट का गठन भले ही उसके माध्यम से हुआ हो, लेकिन उसके रोजमर्रा के कामकाज या वित्तीय फैसलों में केंद्र सरकार का कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं है। ट्रस्ट अपने नियमों के अनुसार स्वतंत्र रूप से फैसले लेता है और मंदिर से जुड़े प्रशासनिक मामलों का संचालन खुद करता है।
ट्रस्ट को यह अधिकार कहां से मिला है?
धार्मिक संस्थाओं को अपने धार्मिक मामलों के संचालन का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत मिलता है। इसी संवैधानिक व्यवस्था के कारण राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट भी अपने प्रशासन, संपत्ति, दान, मंदिर संचालन और विकास से जुड़े फैसले स्वयं लेने के लिए अधिकृत है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि ट्रस्ट कानून से ऊपर है।
अगर ट्रस्ट स्वतंत्र है तो जांच कौन करता है?
किसी भी संस्था की तरह ट्रस्ट भी देश के कानून के दायरे में आता है। यदि चोरी, धोखाधड़ी, गबन या किसी अन्य आपराधिक मामले के आरोप सामने आते हैं तो राज्य पुलिस, विशेष जांच एजेंसियां और अदालतें कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती हैं। यानी प्रशासनिक स्वतंत्रता होने के बावजूद कानूनी जवाबदेही पूरी तरह बनी रहती है।
ट्रस्ट में नए सदस्य कैसे चुने जाते हैं?
ट्रस्ट में किसी सदस्य के निधन, इस्तीफे या पद खाली होने की स्थिति में नए सदस्य का चयन ट्रस्ट की बैठक में आपसी सहमति से किया जाता है। हाल ही में दिवंगत सदस्य कामेश्वर चौपाल के स्थान पर कृष्ण मोहन को सर्वसम्मति से सदस्य बनाया गया। वहीं एक अन्य खाली सीट पर अब तक सहमति नहीं बन पाने के कारण नियुक्ति नहीं हो सकी है। ट्रस्ट के सभी सदस्यों का हिंदू धर्म का अनुयायी होना जरूरी है।
ट्रस्ट की व्यवस्था कैसे चलती है?
राम मंदिर ट्रस्ट में अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष की अलग-अलग जिम्मेदारियां तय हैं। मंदिर में आने वाले दान की गिनती कई स्तरों पर होती है और इसमें अधिकृत एजेंसियों की निगरानी रहती है। नकदी की गिनती दो शिफ्ट में की जाती है और बड़ी संख्या में कर्मचारी व स्वयंसेवक मंदिर के संचालन में लगे रहते हैं। राज्य सरकार की भूमिका मुख्य रूप से सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक समन्वय तक सीमित रहती है।
किस स्थिति में ट्रस्ट सदस्य की सदस्यता खत्म हो सकती है?
यदि कोई सदस्य इस्तीफा दे दे, उसका निधन हो जाए, किसी गंभीर अपराध में दोषी ठहराया जाए, दिवालिया घोषित हो या कानूनी रूप से अयोग्य हो जाए तो उसकी सदस्यता समाप्त हो सकती है। इसके अलावा ट्रस्ट के हित में दो-तिहाई बहुमत से किसी सदस्य को हटाने का भी प्रावधान है। हालांकि वरिष्ठ अधिवक्ता के. परासरन को आजीवन सदस्य का विशेष दर्जा प्राप्त है।
आखिर यह विवाद इतना बड़ा क्यों बन गया?
राम मंदिर देश की करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। ऐसे में चढ़ावे से जुड़ी किसी भी तरह की अनियमितता का आरोप स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता है। फिलहाल ट्रस्ट सभी आरोपों से इनकार करते हुए दावा कर रहा है कि मंदिर का पूरा हिसाब सुरक्षित है। वहीं दूसरी ओर जांच एजेंसियां अपने स्तर पर मामले की पड़ताल कर रही हैं। आने वाले दिनों में जांच रिपोर्ट और ट्रस्ट की अगली बैठक के फैसले पर सभी की नजर रहेगी।
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