By Malay Ojha | Published: 07 July 2026 at 01:09 PM
करीब 18 साल पुराने अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए विशेष अदालत के निर्णय को बरकरार रखा है। अदालत ने 38 दोषियों की फांसी और 11 दोषियों की उम्रकैद की सजा में कोई बदलाव नहीं किया। इसके साथ ही मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और घायलों को 5 लाख रुपये मुआवजा देने का भी आदेश दिया गया है। इस फैसले के साथ देश के सबसे चर्चित आतंकी मामलों में से एक पर हाईकोर्ट की मुहर लग गई है।
गुजरात हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि विशेष अदालत द्वारा दोषियों के खिलाफ दिए गए निर्णय में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। अदालत ने कहा कि सभी 49 दोषियों पर सुनाई गई सजा यथावत रहेगी। इनमें 38 दोषियों को फांसी और 11 को आजीवन कारावास की सजा पहले ही दी जा चुकी थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने भी सही माना है।
पीड़ित परिवारों को भी मिली बड़ी राहत
सजा बरकरार रखने के साथ हाईकोर्ट ने पीड़ित परिवारों के लिए आर्थिक सहायता का भी आदेश दिया। अदालत ने कहा कि धमाकों में जान गंवाने वालों के परिजनों को 10 लाख रुपये और घायलों को 5 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए। अदालत का मानना था कि ऐसे मामलों में न्याय केवल सजा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पीड़ितों को राहत भी मिलनी चाहिए।
फरवरी 2022 में आया था विशेष अदालत का फैसला
इस मामले में विशेष अदालत ने फरवरी 2022 में ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने 77 आरोपियों में से 49 को दोषी ठहराया था, जबकि 28 आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। इसके बाद दोषियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जहां अब विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा गया है।
26 जुलाई 2008 को दहल उठा था अहमदाबाद
26 जुलाई 2008 की शाम अहमदाबाद शहर में कुछ ही मिनटों के अंतराल पर सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। भीड़भाड़ वाले इलाकों, बाजारों, बस स्टैंड, पार्किंग और अस्पतालों समेत 21 स्थानों को निशाना बनाया गया था। इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 250 से अधिक लोग घायल हुए थे। पूरे शहर में अफरा-तफरी मच गई थी और सुरक्षा एजेंसियां तत्काल हरकत में आ गई थीं।
अस्पतालों को भी बनाया गया था निशाना
धमाकों की सबसे भयावह बात यह थी कि आतंकियों ने अस्पतालों को भी नहीं छोड़ा। बाजार में पहला धमाका होने के बाद घायल लोगों को इलाज के लिए अहमदाबाद सिविल अस्पताल और एलजी अस्पताल लाया जा रहा था। इसी दौरान अस्पताल परिसर के बाहर भी विस्फोट किए गए, जिससे बचाव और राहत कार्य भी प्रभावित हुआ। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
जांच में जुटाए गए हजारों सबूत
मामले की जांच बेहद लंबी और जटिल रही। जांच एजेंसियों ने अदालत के सामने करीब छह हजार पन्नों के दस्तावेज पेश किए। सुनवाई के दौरान 1100 से अधिक गवाहों के बयान दर्ज किए गए। इतने बड़े मुकदमे की सुनवाई के दौरान सात बार न्यायाधीश भी बदले, लेकिन आखिरकार सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद विशेष अदालत ने फैसला सुनाया।
कई राज्यों तक फैला था जांच का दायरा
धमाकों के बाद गुजरात पुलिस ने विशेष जांच दल का गठन किया। जांच के दौरान गुजरात के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक फैले नेटवर्क का पता लगाया गया। पुलिस ने कई राज्यों में छापेमारी कर आरोपियों को गिरफ्तार किया। जांच में यह भी सामने आया कि अहमदाबाद के साथ-साथ सूरत में भी बम लगाए गए थे, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण वे फट नहीं सके।
प्रतिबंधित आतंकी संगठन पर लगा था आरोप
जांच एजेंसियों के अनुसार इन धमाकों की जिम्मेदारी इंडियन मुजाहिदीन ने ली थी। जांच में यह भी कहा गया कि यह प्रतिबंधित संगठन सिमी से जुड़े कट्टरपंथी नेटवर्क का हिस्सा था। मामले में जुटाए गए तकनीकी और दस्तावेजी सबूतों को अदालत ने भी महत्वपूर्ण माना।
देश के सबसे बड़े फैसलों में दर्ज हुआ मामला
विशेष अदालत का 2022 का फैसला पहले ही देश के न्यायिक इतिहास में दर्ज हो चुका था, क्योंकि एक ही मामले में 38 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी। अब हाईकोर्ट द्वारा भी उस फैसले को बरकरार रखने के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। माना जा रहा है कि आगे दोषियों के पास सर्वोच्च अदालत में अपील का कानूनी विकल्प मौजूद रहेगा।
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