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बिहार के 551 मॉडल स्कूल भगवा रंग में क्यों रंगे गए? नाम भी बदला, फैसले पर विपक्ष के साथ जेडीयू ने उठाए सवाल

By Malay Ojha | Published: 21 July 2026 at 03:08 PM

पटना: बिहार में 551 मॉडल स्कूलों के रंग और नाम को लेकर सियासी विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार ने इन स्कूलों को एक समान रूप देने के तहत बाहरी दीवारों को केसरिया रंग में रंगने का फैसला किया है। साथ ही इन मॉडल स्कूलों को अब ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ के नाम से जाना जाएगा। सरकार के इस फैसले को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं, वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल जेडीयू की ओर से भी स्कूलों के रंग और नाम को लेकर चिंता जताई गई है।

बिहार सरकार के इस फैसले के बाद विपक्षी दलों ने इसे शिक्षा व्यवस्था के राजनीतिकरण से जोड़कर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकारी स्कूलों के नाम और रंग बदलने के बजाय सरकार को पढ़ाई की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता और बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। दूसरी तरफ, सरकार की ओर से इसे सभी मॉडल स्कूलों को एक समान स्वरूप देने की पहल बताया जा रहा है।

जेडीयू ने भी उठाए सवाल
इस पूरे विवाद में खास बात यह है कि सरकार के फैसले पर केवल विपक्ष ही सवाल नहीं उठा रहा, बल्कि भाजपा की सहयोगी जेडीयू की ओर से भी आपत्ति दर्ज कराई गई है। जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि केवल स्कूल का रंग बदलने से बच्चों के शिक्षा के अधिकार की गारंटी नहीं होती। उनके मुताबिक, असली मुद्दा बच्चों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है।

जमीन दान करने वालों के नाम को लेकर भी सवाल
जेडीयू की ओर से स्कूलों के नाम से जुड़े एक और पहलू पर भी सवाल उठाया गया है। पार्टी का कहना है कि जिन लोगों ने स्कूल बनाने के लिए अपनी जमीन दान की, उनके नाम और योगदान का सम्मान भी होना चाहिए। इस तरह यह विवाद केवल स्कूलों के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूलों की नई पहचान और पुराने नामों से जुड़े लोगों की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

मॉडल स्कूलों को मिला नया नाम
बिहार में जिन 551 मॉडल स्कूलों को नई पहचान दी गई है, उन्हें अब ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ नाम दिया गया है। इन विद्यालयों में कक्षा 9 से 12 तक की पढ़ाई पर जोर दिया जाना है। इन स्कूलों का औपचारिक शुभारंभ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बेगूसराय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान किया। सरकार की ओर से इन विद्यालयों को बेहतर शैक्षणिक माहौल और आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने की योजना बताई गई है।

स्कूलों के बाहरी हिस्से का रंग बदलेगा
शिक्षा विभाग की ओर से तय की गई नई रंग योजना के मुताबिक, मॉडल स्कूलों की बाहरी दीवारों को एक समान केसरिया रंग में रंगने की योजना है। वहीं, कक्षाओं के अंदर की दीवारों के लिए सफेद रंग और मुख्य द्वार के लिए हल्के पीले या सुनहरे रंग का इस्तेमाल करने की बात सामने आई है। सरकार का तर्क है कि सभी मॉडल स्कूलों को एक जैसी पहचान देने के लिए यह व्यवस्था लागू की जा रही है।

पहले स्कूलों के रंग को लेकर नहीं था एक जैसा नियम
इससे पहले मॉडल स्कूलों की इमारतों के रंग को लेकर कोई एक तय व्यवस्था नहीं थी। अलग-अलग स्कूलों में पीला, गुलाबी या आसमानी जैसे रंग देखने को मिलते थे। कई जगहों पर स्कूलों के रंग का फैसला स्थानीय स्तर पर किया जाता था। अब शिक्षा विभाग की ओर से सभी मॉडल स्कूलों के लिए एक समान रंग योजना तय किए जाने के बाद पुरानी व्यवस्था में बदलाव किया जा रहा है।

सरकार के फैसले पर विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने स्कूलों को केसरिया रंग में रंगने और नाम बदलने के फैसले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष का कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी तरह का बदलाव बच्चों के हित और पढ़ाई की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर होना चाहिए। विपक्षी नेताओं ने इसे शिक्षा के भगवाकरण से जोड़ते हुए सरकार से फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। दूसरी ओर, भाजपा की ओर से रंग के चुनाव को राजनीतिक फैसले के बजाय सकारात्मकता और ऊर्जा से जोड़कर बचाव किया गया है।

नाम बदलने पर भी उठ रहे सवाल
स्कूलों के रंग के साथ-साथ उनके नाम बदले जाने को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। जिन स्कूलों की पहचान पहले स्थानीय स्तर पर किसी व्यक्ति या जमीन दान करने वाले परिवार से जुड़ी थी, वहां नए नाम को लेकर कुछ लोगों में नाराजगी की बात सामने आई है। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, पुराने नामों को पूरी तरह हटाने के बजाय उनके साथ ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ नाम जोड़े जाने की व्यवस्था की गई है। ऐसे में सरकार का कहना है कि यह बदलाव स्कूलों को एक नई और समान पहचान देने के उद्देश्य से किया गया है।

सरकार के सामने शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल
बिहार के 551 मॉडल स्कूलों को नई पहचान देने की इस पहल के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन बदलावों का असर पढ़ाई पर कितना पड़ेगा। स्कूलों का रंग और नाम बदलने के साथ-साथ अगर बेहतर शिक्षक, स्मार्ट कक्षाएं, आधुनिक शिक्षण व्यवस्था और बच्चों के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, तो इसका सीधा फायदा विद्यार्थियों को मिल सकता है। सरकार की ओर से मॉडल स्कूलों में आधुनिक शैक्षणिक माहौल तैयार करने और स्मार्ट कक्षा जैसी सुविधाओं पर भी जोर दिया जा रहा है।

रंग और नाम से आगे बढ़ेगी बहस?
फिलहाल बिहार में 551 मॉडल स्कूलों को केसरिया रंग देने और ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ नाम देने का फैसला राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है। सरकार इसे स्कूलों में एकरूपता और नई व्यवस्था की शुरुआत के तौर पर देख रही है, जबकि विपक्ष और जेडीयू के एक वर्ग की ओर से इसके तरीके और प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और बढ़ सकता है, क्योंकि अब बहस केवल स्कूलों के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की प्राथमिकता आखिर क्या होनी चाहिए।

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बिहार के 551 मॉडल स्कूल भगवा रंग में क्यों रंगे गए? नाम भी बदला, फैसले पर विपक्ष के साथ जेडीयू ने उठाए सवाल

By Malay Ojha | Published: 21 July 2026 at 03:08 PM

पटना: बिहार में 551 मॉडल स्कूलों के रंग और नाम को लेकर सियासी विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार ने इन स्कूलों को एक समान रूप देने के तहत बाहरी दीवारों को केसरिया रंग में रंगने का फैसला किया है। साथ ही इन मॉडल स्कूलों को अब ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ के नाम से जाना जाएगा। सरकार के इस फैसले को लेकर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं, वहीं सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल जेडीयू की ओर से भी स्कूलों के रंग और नाम को लेकर चिंता जताई गई है।

बिहार सरकार के इस फैसले के बाद विपक्षी दलों ने इसे शिक्षा व्यवस्था के राजनीतिकरण से जोड़कर सवाल खड़े किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकारी स्कूलों के नाम और रंग बदलने के बजाय सरकार को पढ़ाई की गुणवत्ता, शिक्षकों की उपलब्धता और बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए। दूसरी तरफ, सरकार की ओर से इसे सभी मॉडल स्कूलों को एक समान स्वरूप देने की पहल बताया जा रहा है।

जेडीयू ने भी उठाए सवाल
इस पूरे विवाद में खास बात यह है कि सरकार के फैसले पर केवल विपक्ष ही सवाल नहीं उठा रहा, बल्कि भाजपा की सहयोगी जेडीयू की ओर से भी आपत्ति दर्ज कराई गई है। जेडीयू प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि केवल स्कूल का रंग बदलने से बच्चों के शिक्षा के अधिकार की गारंटी नहीं होती। उनके मुताबिक, असली मुद्दा बच्चों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है।

जमीन दान करने वालों के नाम को लेकर भी सवाल
जेडीयू की ओर से स्कूलों के नाम से जुड़े एक और पहलू पर भी सवाल उठाया गया है। पार्टी का कहना है कि जिन लोगों ने स्कूल बनाने के लिए अपनी जमीन दान की, उनके नाम और योगदान का सम्मान भी होना चाहिए। इस तरह यह विवाद केवल स्कूलों के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूलों की नई पहचान और पुराने नामों से जुड़े लोगों की भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।

मॉडल स्कूलों को मिला नया नाम
बिहार में जिन 551 मॉडल स्कूलों को नई पहचान दी गई है, उन्हें अब ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ नाम दिया गया है। इन विद्यालयों में कक्षा 9 से 12 तक की पढ़ाई पर जोर दिया जाना है। इन स्कूलों का औपचारिक शुभारंभ मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बेगूसराय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान किया। सरकार की ओर से इन विद्यालयों को बेहतर शैक्षणिक माहौल और आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने की योजना बताई गई है।

स्कूलों के बाहरी हिस्से का रंग बदलेगा
शिक्षा विभाग की ओर से तय की गई नई रंग योजना के मुताबिक, मॉडल स्कूलों की बाहरी दीवारों को एक समान केसरिया रंग में रंगने की योजना है। वहीं, कक्षाओं के अंदर की दीवारों के लिए सफेद रंग और मुख्य द्वार के लिए हल्के पीले या सुनहरे रंग का इस्तेमाल करने की बात सामने आई है। सरकार का तर्क है कि सभी मॉडल स्कूलों को एक जैसी पहचान देने के लिए यह व्यवस्था लागू की जा रही है।

पहले स्कूलों के रंग को लेकर नहीं था एक जैसा नियम
इससे पहले मॉडल स्कूलों की इमारतों के रंग को लेकर कोई एक तय व्यवस्था नहीं थी। अलग-अलग स्कूलों में पीला, गुलाबी या आसमानी जैसे रंग देखने को मिलते थे। कई जगहों पर स्कूलों के रंग का फैसला स्थानीय स्तर पर किया जाता था। अब शिक्षा विभाग की ओर से सभी मॉडल स्कूलों के लिए एक समान रंग योजना तय किए जाने के बाद पुरानी व्यवस्था में बदलाव किया जा रहा है।

सरकार के फैसले पर विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने स्कूलों को केसरिया रंग में रंगने और नाम बदलने के फैसले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। विपक्ष का कहना है कि शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी तरह का बदलाव बच्चों के हित और पढ़ाई की गुणवत्ता को ध्यान में रखकर होना चाहिए। विपक्षी नेताओं ने इसे शिक्षा के भगवाकरण से जोड़ते हुए सरकार से फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है। दूसरी ओर, भाजपा की ओर से रंग के चुनाव को राजनीतिक फैसले के बजाय सकारात्मकता और ऊर्जा से जोड़कर बचाव किया गया है।

नाम बदलने पर भी उठ रहे सवाल
स्कूलों के रंग के साथ-साथ उनके नाम बदले जाने को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। जिन स्कूलों की पहचान पहले स्थानीय स्तर पर किसी व्यक्ति या जमीन दान करने वाले परिवार से जुड़ी थी, वहां नए नाम को लेकर कुछ लोगों में नाराजगी की बात सामने आई है। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, पुराने नामों को पूरी तरह हटाने के बजाय उनके साथ ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ नाम जोड़े जाने की व्यवस्था की गई है। ऐसे में सरकार का कहना है कि यह बदलाव स्कूलों को एक नई और समान पहचान देने के उद्देश्य से किया गया है।

सरकार के सामने शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल
बिहार के 551 मॉडल स्कूलों को नई पहचान देने की इस पहल के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन बदलावों का असर पढ़ाई पर कितना पड़ेगा। स्कूलों का रंग और नाम बदलने के साथ-साथ अगर बेहतर शिक्षक, स्मार्ट कक्षाएं, आधुनिक शिक्षण व्यवस्था और बच्चों के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, तो इसका सीधा फायदा विद्यार्थियों को मिल सकता है। सरकार की ओर से मॉडल स्कूलों में आधुनिक शैक्षणिक माहौल तैयार करने और स्मार्ट कक्षा जैसी सुविधाओं पर भी जोर दिया जा रहा है।

रंग और नाम से आगे बढ़ेगी बहस?
फिलहाल बिहार में 551 मॉडल स्कूलों को केसरिया रंग देने और ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ नाम देने का फैसला राजनीतिक बहस का मुद्दा बन गया है। सरकार इसे स्कूलों में एकरूपता और नई व्यवस्था की शुरुआत के तौर पर देख रही है, जबकि विपक्ष और जेडीयू के एक वर्ग की ओर से इसके तरीके और प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आने वाले दिनों में यह विवाद और बढ़ सकता है, क्योंकि अब बहस केवल स्कूलों के रंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी उठ रहा है कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की प्राथमिकता आखिर क्या होनी चाहिए।

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