By Malay Ojha | Published: 22 July 2026 at 09:54 AM
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर बेहद कड़ी चिंता जताई है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने एक फैसले में कहा कि अगर राम मंदिर जैसे पवित्र धार्मिक स्थल पर चढ़ावे की चोरी जैसी घटना भी समाज को झकझोर नहीं पाती, तो यह ईमानदारी और नैतिकता के गिरते स्तर का गंभीर संकेत है। उन्होंने यह तक कहा कि सरकार अगर भ्रष्टाचार पर सच में लगाम लगाना चाहती है तो गंभीर मामलों में दोषियों को मृत्युदंड देने के लिए भ्रष्टाचार निरोधक कानून में बदलाव पर विचार किया जा सकता है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने ये टिप्पणियां हमीरपुर के कैफुद्दीन समेत अन्य याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान दिए गए अपने 51 पन्नों के फैसले में की हैं। मामला बुलडोजर कार्रवाई और लोगों को उनके घरों से संरक्षण देने की मांग से जुड़ा था। इसी सुनवाई के दौरान अदालत ने भ्रष्टाचार की समस्या और उसके सामाजिक असर पर विस्तार से चिंता जताई। इस मामले की खंडपीठ में न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंद भी शामिल थे और कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर उन्होंने अलग राय रखी।
‘भ्रष्टाचार को अब सामान्य मानने लगा है समाज’
अदालत ने कहा कि देश में भ्रष्टाचार धीरे-धीरे इतना सामान्य होता जा रहा है कि लोग तब तक इसे गलत नहीं मानते, जब तक कोई व्यक्ति पकड़ा न जाए। न्यायमूर्ति श्रीधरन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सामाजिक संवेदनशीलता में आई कमी पर चिंता जताते हुए कहा कि राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का विवाद भी अगर लोगों को गंभीर रूप से विचलित नहीं कर पाया, तो यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। उनके अनुसार, यह समाज में ईमानदारी के स्तर में आई गिरावट को दिखाता है।
भ्रष्टाचारियों को सजा देने के कानून पर विचार की बात
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने अपने फैसले में कहा कि यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए गंभीर है, तो उसे भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 में बदलाव की संभावना पर विचार करना चाहिए। उन्होंने गंभीर भ्रष्टाचार के मामलों में मृत्युदंड का प्रावधान किए जाने के सुझाव का उल्लेख किया। हालांकि, यह अदालत की ओर से दिया गया कोई बाध्यकारी आदेश नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून की जरूरत को लेकर न्यायमूर्ति की टिप्पणी और सुझाव है।
अवैध निर्माण के पीछे भ्रष्ट अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
अदालत ने अवैध निर्माण के मामलों में सरकारी और नगर निकाय के अधिकारियों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठाए। फैसले में कहा गया कि कई बार अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध निर्माण खड़े हो जाते हैं। आरोप है कि कुछ अधिकारी रिश्वत लेकर नियमों की अनदेखी करते हैं और बाद में जब अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई होती है तो उसका सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों को उठाना पड़ता है, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से ऐसे मकान खरीदे होते हैं।
बिल्डर ही नहीं, संरक्षण देने वालों पर भी कार्रवाई की जरूरत
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अवैध निर्माण के लिए केवल बिल्डर या निर्माण कराने वाले व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी अधिकारी ने रिश्वत लेकर अवैध निर्माण को बढ़ावा दिया या उसे संरक्षण दिया है तो उसके खिलाफ भी कानून के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। अदालत की टिप्पणी का सीधा संकेत इस ओर था कि भ्रष्टाचार की पूरी व्यवस्था में शामिल लोगों की जवाबदेही तय किए बिना समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है।
भ्रष्टाचार से बढ़ रही अमीर-गरीब की खाई
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने भ्रष्टाचार के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पर भी चिंता जताई। अदालत के मुताबिक भ्रष्टाचार के जरिए कुछ लोगों के हाथों में गैरकानूनी तरीके से बड़ी मात्रा में संपत्ति जमा होती जाती है। इसका सीधा असर समाज की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ता है और अमीर तथा गरीब के बीच की दूरी बढ़ती जाती है।
अदालत ने आशंका जताई कि अगर भ्रष्टाचार पर समय रहते प्रभावी रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले समय में इसका असर केवल सरकारी व्यवस्था तक सीमित नहीं रहेगा। इससे समाज में असंतोष बढ़ सकता है और गंभीर सामाजिक परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। अदालत ने भ्रष्टाचार को देश की व्यवस्था और सामाजिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा माना।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट का भी जिक्र
फैसले में ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2025 की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया। न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा कि भ्रष्टाचार से जुड़े वैश्विक सूचकांक में भारत की स्थिति भी चिंता का विषय है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि केवल आंकड़ों में स्थिति देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार के प्रति समाज के रवैये में बदलाव लाना भी जरूरी है।
‘राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद आखिरी तिनका’
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी से जुड़े विवाद को भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी चिंता जाहिर करने के संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण माना। उन्होंने इसे ऐसी घटना के तौर पर देखा, जिसने भ्रष्टाचार को लेकर समाज की संवेदनशीलता पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। अदालत की टिप्पणी का आशय यह था कि जब लोगों की धार्मिक आस्था से जुड़े स्थान पर चढ़ावे की चोरी भी समाज को गहराई से विचलित नहीं करती, तो यह नैतिक मूल्यों के कमजोर पड़ने का संकेत है।
बुलडोजर कार्रवाई पर भी अदालत ने तय किए नियम
फैसले में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर भी महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं। न्यायमूर्ति श्रीधरन के अनुसार, किसी व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के बाद केवल इसी आधार पर उसके मकान को तुरंत गिरा देना उचित नहीं होना चाहिए। फैसले में कहा गया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद दो साल तक आरोपी के मकान को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी मकान में तीन साल या उससे अधिक समय से रह रहा है तो उसे हटाने या मकान गिराने से कम से कम एक साल पहले नोटिस देकर वैकल्पिक व्यवस्था का अवसर दिया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी आपराधिक मामले में आरोपी होने मात्र से उसके परिवार को अचानक बेघर न होना पड़े।
दूसरे जज ने कुछ बिंदुओं पर जताई असहमति
हालांकि, खंडपीठ में शामिल न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंद ने इस व्यवस्था के कुछ हिस्सों पर अलग राय रखी। उनका कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट किसी मामले में दो साल जैसी निश्चित समय सीमा तय नहीं कर सकता। उन्होंने आशंका जताई कि ऐसी व्यवस्था का भविष्य में गलत इस्तेमाल हो सकता है और कोई आरोपी कार्रवाई से बचने के लिए जानबूझकर प्राथमिकी दर्ज कराने का रास्ता अपना सकता है।
इस तरह, अदालत के फैसले में एक तरफ भ्रष्टाचार और अवैध निर्माण के खिलाफ बेहद सख्त रुख दिखाई दिया, वहीं दूसरी तरफ बुलडोजर कार्रवाई को लेकर आरोपी और उसके परिवार के अधिकारों की सुरक्षा पर भी जोर दिया गया। राम मंदिर चढ़ावा चोरी का जिक्र करते हुए भ्रष्टाचार पर की गई न्यायमूर्ति श्रीधरन की टिप्पणी ने इस फैसले को खास तौर पर चर्चा में ला दिया है। हालांकि मृत्युदंड को लेकर की गई बात को अदालत का कोई नया कानूनी आदेश नहीं माना जा सकता। यह भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कानून की जरूरत को लेकर न्यायमूर्ति की राय और सरकार के लिए विचार करने का सुझाव है।
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