By Malay Ojha | Published: 02 August 2026 at 09:17 PM
दुनिया में तेल की सप्लाई को लेकर बढ़ी चिंता के बीच तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक प्लस ने बड़ा फैसला लिया है। सऊदी अरब, रूस समेत सात प्रमुख देशों ने सितंबर में कच्चे तेल का उत्पादन रोजाना 1.88 लाख बैरल बढ़ाने पर सहमति जताई है। यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब ईरान के साथ जारी युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए संकट ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव बढ़ा दिया है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए यह फैसला राहत की उम्मीद जगा सकता है।
ओपेक प्लस की रविवार को हुई ऑनलाइन बैठक में सितंबर के उत्पादन लक्ष्य में रोजाना 1.88 लाख बैरल की बढ़ोतरी को मंजूरी दी गई। यह लगातार छठा महीना है, जब संगठन के प्रमुख सात देशों ने उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है। इस फैसले में सऊदी अरब, रूस, इराक, कुवैत, कजाखस्तान, अल्जीरिया और ओमान शामिल हैं।
2023 की बड़ी कटौती वापस लेने की प्रक्रिया पूरी
इस फैसले के साथ अप्रैल 2023 में घोषित 16.5 लाख बैरल प्रतिदिन की अतिरिक्त स्वैच्छिक उत्पादन कटौती को वापस लेने की प्रक्रिया पूरी हो गई है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि ओपेक प्लस की सभी उत्पादन कटौतियां खत्म हो गई हैं। वर्ष 2022 से जुड़ी करीब 20 लाख बैरल प्रतिदिन की एक अन्य कटौती अभी 2026 के अंत तक लागू है। इसलिए आने वाले महीनों में बाजार में वास्तविक तेल उपलब्धता का आकलन सिर्फ इस नए उत्पादन बढ़ोतरी के आधार पर नहीं किया जा सकता।
होर्मुज संकट के बीच क्यों अहम है फैसला?
ओपेक प्लस का यह फैसला ऐसे समय आया है जब होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही को लेकर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। यह समुद्री रास्ता दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है और यहां किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और सप्लाई पर पड़ सकता है। ईरान से जुड़े संघर्ष और क्षेत्र में जारी तनाव ने पहले ही तेल कारोबार को अनिश्चित बना रखा है। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने का फैसला बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति का संकेत देता है।
सिर्फ उत्पादन बढ़ाने से संकट खत्म नहीं होगा
हालांकि, तेल उत्पादन बढ़ाने का फैसला अपने आप में वैश्विक तेल संकट का पूरा समाधान नहीं है। असली सवाल यह है कि बढ़ाया गया तेल बाजार तक कितनी तेजी से पहुंचता है। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही प्रभावित रहती है या निर्यात के रास्ते में बाधाएं बनी रहती हैं, तो उत्पादन बढ़ने के बावजूद वास्तविक सप्लाई पर उसका असर सीमित रह सकता है। यही वजह है कि बाजार की नजर सिर्फ ओपेक प्लस के फैसले पर नहीं, बल्कि मध्य पूर्व के मौजूदा हालात और समुद्री रास्तों की स्थिति पर भी बनी हुई है।
अक्टूबर में क्या होगा, इस पर अभी तस्वीर साफ नहीं
सितंबर के लिए उत्पादन बढ़ाने का फैसला तो हो गया है, लेकिन अक्टूबर और उसके बाद की नीति को लेकर अभी स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है। ओपेक प्लस बाजार की मांग, उपलब्ध आपूर्ति, तेल की कीमतों और भू-राजनीतिक परिस्थितियों पर नजर रखेगा। मौजूदा हालात को देखते हुए यह संभावना जताई जा रही है कि सितंबर के बाद उत्पादन बढ़ाने की रफ्तार को कुछ समय के लिए रोका जा सकता है। संगठन पहले भी यह संकेत देता रहा है कि बाजार की स्थिति बिगड़ने पर उत्पादन बढ़ाने की प्रक्रिया को रोकने या जरूरत पड़ने पर फैसले में बदलाव की गुंजाइश रखी जाएगी।
तेल की कीमतों पर क्या होगा असर?
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत कई चीजों पर निर्भर करती है। इनमें मांग, उत्पादन, भंडार, समुद्री रास्तों की स्थिति और युद्ध जैसे भू-राजनीतिक संकट सबसे अहम हैं। ओपेक प्लस की ओर से उत्पादन बढ़ाने का फैसला बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति की उम्मीद पैदा करता है। अगर यह अतिरिक्त तेल वास्तव में अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है और दूसरी तरफ मांग में बहुत तेज बढ़ोतरी नहीं होती, तो कीमतों पर नीचे आने का दबाव बन सकता है। लेकिन मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने या तेल की आवाजाही बाधित होने की स्थिति में उत्पादन बढ़ोतरी का असर कमजोर भी पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ओपेक प्लस का फैसला?
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव सीधे देश के आयात खर्च पर असर डालता है। अगर आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतें नीचे आती हैं और वैश्विक सप्लाई में सुधार होता है, तो भारत के तेल आयात पर होने वाला खर्च कम हो सकता है। इससे देश के व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा पर भी दबाव कुछ कम होने की संभावना रहती है।
क्या पेट्रोल-डीजल के दाम घटेंगे?
कच्चे तेल की कीमत में गिरावट आने का मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम तुरंत कम हो जाएंगे। घरेलू ईंधन की कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के दाम के अलावा डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, कर, परिवहन खर्च और तेल कंपनियों की मूल्य नीति जैसे कई कारकों का असर पड़ता है। इसलिए ओपेक प्लस के उत्पादन बढ़ाने के फैसले से पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की संभावना जरूर बन सकती है, लेकिन इसे तत्काल कीमतों में कटौती की गारंटी नहीं माना जा सकता।
महंगाई पर भी पड़ सकता है असर
अगर कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक गिरावट आती है और भारत को पर्याप्त मात्रा में तेल उचित कीमत पर मिलता है, तो इसका फायदा अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों को भी मिल सकता है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कमी या स्थिरता से परिवहन लागत पर दबाव घट सकता है। इसका असर माल ढुलाई, उत्पादन और रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर भी देखने को मिल सकता है। ऐसे में तेल की सप्लाई मजबूत होना महंगाई के मोर्चे पर भी राहत देने वाला कदम साबित हो सकता है।
अब बाजार की नजर होर्मुज और अक्टूबर के फैसले पर
ओपेक प्लस ने सितंबर के लिए उत्पादन बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया है, लेकिन आगे की दिशा अभी भी मध्य पूर्व के हालात पर काफी हद तक निर्भर करेगी। अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल की आवाजाही सामान्य होती है और वैश्विक बाजार में आपूर्ति बढ़ती है, तो कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। इसके उलट अगर संकट और गहराता है, तो उत्पादन बढ़ाने के बावजूद बाजार में असली सप्लाई की कमी बनी रह सकती है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सितंबर के बाद ओपेक प्लस उत्पादन बढ़ाने की रफ्तार जारी रखता है या बाजार की स्थिति को देखते हुए कुछ समय के लिए ब्रेक लगाता है। संगठन की अगली महत्वपूर्ण बैठक 6 सितंबर को होने वाली है, जहां आगे की उत्पादन नीति पर बाजार की नजर रहेगी।
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