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स्पीकर की चाय पार्टी में विपक्ष का बहिष्कार, फिर कनिमोझी क्यों पहुंचीं? डीएमके के कदम के पीछे क्या है

By Malay Ojha | Published: 13 August 2026 at 02:13 PM

संसद का मानसून सत्र गुरुवार को खत्म होते ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बार फिर दूरी साफ दिखाई दी। दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष की ओर से आयोजित चाय पार्टी में कांग्रेस समेत विपक्ष के प्रमुख नेता नहीं पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह समेत सत्तापक्ष के कई बड़े नेता मौजूद रहे। लेकिन विपक्षी दलों के बहिष्कार के बीच द्रमुक की कनिमोझी करुणानिधि का पहुंचना सबसे ज्यादा चर्चा में रहा।

लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी संसद सत्र खत्म होने के बाद होने वाली एक पारंपरिक बैठक मानी जाती है। इसका मकसद पूरे सत्र के दौरान चले राजनीतिक टकराव के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बातचीत का माहौल बनाना होता है। लेकिन इस बार कांग्रेस के प्रमुख नेता राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे समेत विपक्ष के कई नेता इसमें शामिल नहीं हुए। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस की ओर से पहले प्रियंका गांधी को भेजने पर भी विचार किया गया था, जबकि सोनिया गांधी और खरगे के भी जाने की चर्चा थी।

कांग्रेस ने क्यों बनाई दूरी?
कांग्रेस से जुड़े सूत्रों के मुताबिक इस बार पार्टी ने चाय पार्टी में शामिल नहीं होने का फैसला इसलिए किया क्योंकि उसे लगा कि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से सत्र के समापन पर वह पारंपरिक संबोधन नहीं दिया गया, जिसमें सदन के कामकाज और पूरे सत्र का आकलन किया जाता है। विपक्ष का मानना था कि जब सदन के कामकाज को लेकर उसकी कई आपत्तियां बनी हुई हैं, तब महज औपचारिक मुलाकात में शामिल होने का कोई खास मतलब नहीं है।

असली सवाल द्रमुक को लेकर
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि जब कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने चाय पार्टी से दूरी बनाई तो द्रमुक की कनिमोझी वहां क्यों पहुंचीं? इसे केवल एक सामान्य शिष्टाचार मुलाकात मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। द्रमुक और कांग्रेस के रिश्तों में हाल के महीनों में बड़ा बदलाव आया है। दोनों दलों का पुराना गठबंधन अब खत्म हो चुका है और संसद में भी द्रमुक ने कांग्रेस से अलग बैठने की मांग की थी।

कांग्रेस से दूरी ने बदला राजनीतिक समीकरण
तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस और द्रमुक का रिश्ता लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने द्रमुक से अलग होकर अभिनेता विजय की पार्टी के साथ जाने का फैसला किया। इसके बाद द्रमुक ने भी संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग की। कनिमोझी ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र में बदले हुए राजनीतिक हालात का हवाला देते हुए द्रमुक सांसदों के लिए अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की थी।

क्या चाय पार्टी में पहुंचना सत्ता पक्ष के करीब जाने का संकेत है?
यहीं से कनिमोझी की मौजूदगी का राजनीतिक मतलब तलाशा जा रहा है। हालांकि इसे द्रमुक के सत्तापक्ष के साथ जाने या किसी नए गठजोड़ का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। द्रमुक ने हाल के दिनों में केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन को लेकर अपना रुख बदला जरूर है, लेकिन उसका मुख्य जोर न्यायपूर्ण परिसीमन पर है। पार्टी का कहना है कि ऐसा कोई बदलाव नहीं होना चाहिए जिससे जनसंख्या नियंत्रण करने वाले दक्षिणी राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व कमजोर हो जाए।

परिसीमन पर द्रमुक का रुख अभी भी सख्त
इस बात को और साफ तौर पर समझना जरूरी है। 12 अगस्त को तमिलनाडु विधानसभा ने मौजूदा परिसीमन प्रस्ताव के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। इसमें लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 पर बनाए रखने और उसी संख्या के भीतर महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की मांग की गई। द्रमुक ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। इसलिए कनिमोझी का चाय पार्टी में पहुंचना परिसीमन के मौजूदा प्रस्ताव को समर्थन देने के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

फिर बातचीत का रास्ता क्यों खुला रखना चाहती है द्रमुक?
द्रमुक की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह तमिलनाडु के हितों से जुड़े मुद्दों पर केंद्र के साथ टकराव के बावजूद बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं करना चाहती। परिसीमन ऐसा ही मुद्दा है। यदि भविष्य में इससे जुड़ा कोई संवैधानिक संशोधन या विधेयक संसद में आता है तो द्रमुक को अपने राज्य के हितों की बात मजबूती से रखने के लिए सत्ता पक्ष, अध्यक्ष और दूसरे दलों के साथ संवाद की जरूरत होगी।

दो-तिहाई बहुमत का सवाल भी अहम
परिसीमन से जुड़ा कोई संवैधानिक संशोधन अगर संसद में आता है तो उसके लिए सामान्य विधेयक जैसी साधारण बहुमत की प्रक्रिया पर्याप्त नहीं होगी। ऐसे संशोधन के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है। यही वजह है कि आने वाले समय में क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। दक्षिण भारत के राज्यों को आशंका है कि आबादी के आधार पर सीटों का नया बंटवारा हुआ तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनका संसद में राजनीतिक वजन घट सकता है।

द्रमुक और कांग्रेस के रास्ते अब अलग
कनिमोझी का चाय पार्टी में पहुंचना ऐसे समय हुआ है जब द्रमुक और कांग्रेस के राजनीतिक रास्ते पहले जैसे नहीं रहे। कांग्रेस के साथ गठबंधन टूटने के बाद द्रमुक ने संसद में अपनी अलग पहचान और अलग राजनीतिक रणनीति को आगे बढ़ाना शुरू किया है। यही कारण है कि कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद कनिमोझी का लोकसभा अध्यक्ष के कार्यक्रम में शामिल होना पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति को दिखाने वाला कदम माना जा रहा है। हालांकि इससे द्रमुक के सत्तापक्ष के साथ किसी समझौते का निष्कर्ष निकालना फिलहाल ठीक नहीं होगा।

संकेत छोटा, सियासी मायने बड़े
संसद की चाय पार्टी भले ही औपचारिक कार्यक्रम हो, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में कनिमोझी की मौजूदगी ने इसे राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया है। कांग्रेस जहां अपने पुराने सहयोगी द्रमुक से अलग रास्ते पर है, वहीं द्रमुक अब राष्ट्रीय राजनीति में अपने फैसले खुद लेने की स्थिति दिखाना चाहती है। खासकर परिसीमन जैसे बड़े मुद्दे पर पार्टी विरोध भी करना चाहती है और बातचीत के दरवाजे भी बंद नहीं करना चाहती। इसलिए कनिमोझी का चाय पार्टी में पहुंचना किसी नए गठबंधन का ऐलान नहीं, बल्कि द्रमुक की अलग राजनीतिक राह और संवाद की रणनीति का संकेत ज्यादा दिखाई देता है।

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स्पीकर की चाय पार्टी में विपक्ष का बहिष्कार, फिर कनिमोझी क्यों पहुंचीं? डीएमके के कदम के पीछे क्या है

By Malay Ojha | Published: 13 August 2026 at 02:13 PM

संसद का मानसून सत्र गुरुवार को खत्म होते ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बार फिर दूरी साफ दिखाई दी। दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के बाद लोकसभा अध्यक्ष की ओर से आयोजित चाय पार्टी में कांग्रेस समेत विपक्ष के प्रमुख नेता नहीं पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह समेत सत्तापक्ष के कई बड़े नेता मौजूद रहे। लेकिन विपक्षी दलों के बहिष्कार के बीच द्रमुक की कनिमोझी करुणानिधि का पहुंचना सबसे ज्यादा चर्चा में रहा।

लोकसभा अध्यक्ष की चाय पार्टी संसद सत्र खत्म होने के बाद होने वाली एक पारंपरिक बैठक मानी जाती है। इसका मकसद पूरे सत्र के दौरान चले राजनीतिक टकराव के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बातचीत का माहौल बनाना होता है। लेकिन इस बार कांग्रेस के प्रमुख नेता राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे समेत विपक्ष के कई नेता इसमें शामिल नहीं हुए। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस की ओर से पहले प्रियंका गांधी को भेजने पर भी विचार किया गया था, जबकि सोनिया गांधी और खरगे के भी जाने की चर्चा थी।

कांग्रेस ने क्यों बनाई दूरी?
कांग्रेस से जुड़े सूत्रों के मुताबिक इस बार पार्टी ने चाय पार्टी में शामिल नहीं होने का फैसला इसलिए किया क्योंकि उसे लगा कि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से सत्र के समापन पर वह पारंपरिक संबोधन नहीं दिया गया, जिसमें सदन के कामकाज और पूरे सत्र का आकलन किया जाता है। विपक्ष का मानना था कि जब सदन के कामकाज को लेकर उसकी कई आपत्तियां बनी हुई हैं, तब महज औपचारिक मुलाकात में शामिल होने का कोई खास मतलब नहीं है।

असली सवाल द्रमुक को लेकर
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प सवाल यह है कि जब कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों ने चाय पार्टी से दूरी बनाई तो द्रमुक की कनिमोझी वहां क्यों पहुंचीं? इसे केवल एक सामान्य शिष्टाचार मुलाकात मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। द्रमुक और कांग्रेस के रिश्तों में हाल के महीनों में बड़ा बदलाव आया है। दोनों दलों का पुराना गठबंधन अब खत्म हो चुका है और संसद में भी द्रमुक ने कांग्रेस से अलग बैठने की मांग की थी।

कांग्रेस से दूरी ने बदला राजनीतिक समीकरण
तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस और द्रमुक का रिश्ता लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने द्रमुक से अलग होकर अभिनेता विजय की पार्टी के साथ जाने का फैसला किया। इसके बाद द्रमुक ने भी संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग की। कनिमोझी ने लोकसभा अध्यक्ष को लिखे पत्र में बदले हुए राजनीतिक हालात का हवाला देते हुए द्रमुक सांसदों के लिए अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की थी।

क्या चाय पार्टी में पहुंचना सत्ता पक्ष के करीब जाने का संकेत है?
यहीं से कनिमोझी की मौजूदगी का राजनीतिक मतलब तलाशा जा रहा है। हालांकि इसे द्रमुक के सत्तापक्ष के साथ जाने या किसी नए गठजोड़ का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। द्रमुक ने हाल के दिनों में केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन को लेकर अपना रुख बदला जरूर है, लेकिन उसका मुख्य जोर न्यायपूर्ण परिसीमन पर है। पार्टी का कहना है कि ऐसा कोई बदलाव नहीं होना चाहिए जिससे जनसंख्या नियंत्रण करने वाले दक्षिणी राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व कमजोर हो जाए।

परिसीमन पर द्रमुक का रुख अभी भी सख्त
इस बात को और साफ तौर पर समझना जरूरी है। 12 अगस्त को तमिलनाडु विधानसभा ने मौजूदा परिसीमन प्रस्ताव के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। इसमें लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 पर बनाए रखने और उसी संख्या के भीतर महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने की मांग की गई। द्रमुक ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। इसलिए कनिमोझी का चाय पार्टी में पहुंचना परिसीमन के मौजूदा प्रस्ताव को समर्थन देने के तौर पर नहीं देखा जा सकता।

फिर बातचीत का रास्ता क्यों खुला रखना चाहती है द्रमुक?
द्रमुक की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह तमिलनाडु के हितों से जुड़े मुद्दों पर केंद्र के साथ टकराव के बावजूद बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं करना चाहती। परिसीमन ऐसा ही मुद्दा है। यदि भविष्य में इससे जुड़ा कोई संवैधानिक संशोधन या विधेयक संसद में आता है तो द्रमुक को अपने राज्य के हितों की बात मजबूती से रखने के लिए सत्ता पक्ष, अध्यक्ष और दूसरे दलों के साथ संवाद की जरूरत होगी।

दो-तिहाई बहुमत का सवाल भी अहम
परिसीमन से जुड़ा कोई संवैधानिक संशोधन अगर संसद में आता है तो उसके लिए सामान्य विधेयक जैसी साधारण बहुमत की प्रक्रिया पर्याप्त नहीं होगी। ऐसे संशोधन के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है। यही वजह है कि आने वाले समय में क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। दक्षिण भारत के राज्यों को आशंका है कि आबादी के आधार पर सीटों का नया बंटवारा हुआ तो जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उनका संसद में राजनीतिक वजन घट सकता है।

द्रमुक और कांग्रेस के रास्ते अब अलग
कनिमोझी का चाय पार्टी में पहुंचना ऐसे समय हुआ है जब द्रमुक और कांग्रेस के राजनीतिक रास्ते पहले जैसे नहीं रहे। कांग्रेस के साथ गठबंधन टूटने के बाद द्रमुक ने संसद में अपनी अलग पहचान और अलग राजनीतिक रणनीति को आगे बढ़ाना शुरू किया है। यही कारण है कि कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद कनिमोझी का लोकसभा अध्यक्ष के कार्यक्रम में शामिल होना पार्टी की स्वतंत्र राजनीतिक स्थिति को दिखाने वाला कदम माना जा रहा है। हालांकि इससे द्रमुक के सत्तापक्ष के साथ किसी समझौते का निष्कर्ष निकालना फिलहाल ठीक नहीं होगा।

संकेत छोटा, सियासी मायने बड़े
संसद की चाय पार्टी भले ही औपचारिक कार्यक्रम हो, लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में कनिमोझी की मौजूदगी ने इसे राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया है। कांग्रेस जहां अपने पुराने सहयोगी द्रमुक से अलग रास्ते पर है, वहीं द्रमुक अब राष्ट्रीय राजनीति में अपने फैसले खुद लेने की स्थिति दिखाना चाहती है। खासकर परिसीमन जैसे बड़े मुद्दे पर पार्टी विरोध भी करना चाहती है और बातचीत के दरवाजे भी बंद नहीं करना चाहती। इसलिए कनिमोझी का चाय पार्टी में पहुंचना किसी नए गठबंधन का ऐलान नहीं, बल्कि द्रमुक की अलग राजनीतिक राह और संवाद की रणनीति का संकेत ज्यादा दिखाई देता है।

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