By Malay Ojha | Published: 19 August 2026 at 06:06 PM
देशभर में युवाओं के बीच चल रहे आंदोलन और उससे जुड़े मुद्दों को लेकर बुधवार को अररिया के टाउन हॉल में ‘यूथ की बात’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम का मकसद युवाओं की समस्याओं को सुनना और उनके साथ सीधे संवाद करना था। इसमें पूर्व आईएएस अधिकारी और चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता कन्नन गोपीनाथन तथा सामाजिक कार्यकर्ता कामायनी स्वामी पैनलिस्ट के रूप में शामिल हुईं। जिले के अलग-अलग प्रखंडों से पहुंचे सैकड़ों युवाओं और लोगों ने शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, नीट विवाद, जंतर-मंतर आंदोलन, सीमांचल की स्थिति और बोलने की आजादी जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।
कार्यक्रम के दौरान दर्जनों युवाओं ने पैनल के सामने अपने सवाल रखे। किसी ने परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाया तो किसी ने शिक्षा के बाद रोजगार नहीं मिलने की समस्या सामने रखी। कई युवाओं ने आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों के साथ कथित पुलिस कार्रवाई और युवाओं की आवाज दबाए जाने का मुद्दा भी उठाया। वक्ताओं के बीच सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हुई कि पढ़ाई और मेहनत के बाद भी अगर परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं रहेगा तो युवाओं का भविष्य किस दिशा में जाएगा।
अररिया और बिहार की शिक्षा व्यवस्था के आंकड़ों ने चौंकाया
कार्यक्रम में आशीष रंजन ने बिहार और अररिया की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े कई आंकड़े सामने रखे। उनके अनुसार शिक्षा की मौजूदा स्थिति युवाओं की परेशानी को समझने के लिए काफी अहम है। उन्होंने कहा कि जब लंबे समय तक युवाओं को बेहतर शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं में भरोसेमंद व्यवस्था और रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं मिलेंगे तो असंतोष का सड़क पर आना स्वाभाविक है। उन्होंने दावा किया कि मौजूदा व्यवस्था ने युवाओं को आंदोलन के लिए मजबूर किया है।
नीट विवाद में जान गंवाने वालों को दी श्रद्धांजलि
कार्यक्रम के दौरान नीट परीक्षा विवाद से जुड़े घटनाक्रम में जान गंवाने वाले 21 युवाओं को श्रद्धांजलि दी गई। उनकी याद में एक मिनट का मौन भी रखा गया। इस दौरान मौजूद युवाओं ने परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग उठाई। वक्ताओं ने कहा कि प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों परिवारों और विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ी होती हैं, इसलिए इनमें किसी भी तरह की गड़बड़ी का असर केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं रहता।
‘हमें बेहतर शिक्षा और रोजगार चाहिए’
खरहट और रानीगंज से पहुंचे ज्योतिष ने कहा कि उनके जैसे युवाओं ने इस छात्र आंदोलन से इसलिए जुड़ाव महसूस किया क्योंकि उन्हें न तो वैसी शिक्षा मिल सकी, जिसकी उन्हें जरूरत थी और न ही पढ़ाई के बाद रोजगार के पर्याप्त अवसर मिले। उन्होंने कहा कि उनकी पीढ़ी ने जो मुश्किलें झेली हैं, आने वाली पीढ़ी को उनसे नहीं गुजरना चाहिए। युवाओं को अच्छी शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और आगे बढ़ने के बराबर अवसर मिलने चाहिए।
‘नीट विवाद से लाखों विद्यार्थियों का भरोसा टूटा’
युवा छात्रा बीबी फातिमा ने नीट परीक्षा विवाद को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि परीक्षा में कथित गड़बड़ी से लाखों विद्यार्थियों का सरकार और परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा प्रभावित हुआ है। उनका आरोप था कि जब युवा अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरे तो उन्हें परेशान किया गया। उन्होंने इसे युवाओं की आवाज दबाने की कोशिश बताया। फातिमा ने कहा कि युवा अब डरने वाले नहीं हैं और वे अपने अधिकारों तथा भविष्य से जुड़े सवाल लगातार उठाते रहेंगे।
‘सवाल पूछने पर मुझे 32 घंटे हिरासत में रखा’
युवा अधिवक्ता मोहम्मद आदिल ने कहा कि वह पटना में चल रहे आंदोलन में बतौर अधिवक्ता मदद करने पहुंचे थे। उनके मुताबिक उन्हें पुलिस ने करीब 32 घंटे तक गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार युवाओं के सवालों को दबाना चाहती है और उन्हें सवाल पूछने से रोकने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी इस तरह की स्थिति को आसानी से स्वीकार नहीं करेगी और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाती रहेगी।
कन्नन गोपीनाथन बोले- परीक्षा पर भरोसा टूटा तो युवा सड़क पर आए
पूर्व आईएएस अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने कहा कि नागरिक और सरकार के बीच एक भरोसे का रिश्ता होता है। युवाओं को यह भरोसा दिया जाता है कि अगर वे पढ़ाई करेंगे, मेहनत करेंगे और परीक्षा की तैयारी करेंगे तो उन्हें अपनी मेहनत का उचित परिणाम मिलेगा। उन्होंने कहा कि परीक्षा से जुड़ी गड़बड़ियों ने इसी भरोसे को चोट पहुंचाई है। यही वजह है कि युवा सड़कों पर उतरकर अपनी बात रखने को मजबूर हुए हैं।
‘आंदोलन की बड़ी जीत है कि सरकार से जवाब मांगा गया’
कन्नन गोपीनाथन ने कहा कि किसी भी लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है। उनके अनुसार युवाओं के आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने सरकार को जवाबदेह बनाने का सवाल मजबूती से खड़ा किया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि जनता और सरकार के बीच लगातार संवाद और जवाबदेही भी जरूरी है।
‘व्यक्ति की गरिमा सबसे जरूरी, सत्ता को सवालों के घेरे में रहना चाहिए’
कन्नन गोपीनाथन ने संविधान की प्रस्तावना में व्यक्ति की गरिमा को सबसे महत्वपूर्ण बातों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि सत्ता मिलने के बाद कई बार शासक और नेता आम नागरिक की गरिमा को नजरअंदाज करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में नागरिकों को आवाज उठानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकारों और नेताओं को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखना जरूरी है और लोकतंत्र में समय-समय पर सत्ता परिवर्तन भी व्यवस्था को जवाबदेह बनाए रखने का एक तरीका है।
युवाओं की बात सुनकर भावुक हुईं कामायनी स्वामी
सामाजिक कार्यकर्ता कामायनी स्वामी ने कहा कि कार्यक्रम में युवाओं की समस्याएं सुनते हुए कई बार उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने सवाल उठाया कि बेहतर शिक्षा की मांग के लिए छोटे-छोटे बच्चों और युवाओं को आखिर सड़कों पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ रही है। उन्होंने कहा कि सरकार को स्कूलों और कॉलेजों में विद्यार्थियों की समस्याएं सुनकर वहीं समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए।
‘शिक्षा के सवाल पर बिहार लगातार पिछड़ रहा’
कामायनी स्वामी ने कहा कि शिक्षा केवल नौकरी पाने का जरिया नहीं, बल्कि समाज और देश के भविष्य से जुड़ा सबसे जरूरी सवाल है। उन्होंने दावा किया कि बिहार शिक्षा के क्षेत्र में लगातार पिछड़ रहा है। उनके मुताबिक अगर परीक्षा व्यवस्था में भरोसा और पारदर्शिता वापस लानी है तो मौजूदा केंद्रीकृत परीक्षा व्यवस्था पर गंभीरता से विचार करना होगा। उन्होंने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी को खत्म कर अलग-अलग क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत परीक्षा व्यवस्था अपनाने की मांग रखी।
सीमांचल के युवाओं ने भी सामने रखी अपनी परेशानी
कार्यक्रम में सीमांचल की स्थिति भी चर्चा का प्रमुख विषय रही। युवाओं ने कहा कि इस इलाके में शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी का सीधा असर नई पीढ़ी पर पड़ता है। कई युवाओं ने कहा कि वे पढ़ना चाहते हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना चाहते हैं और अपने इलाके में रहकर बेहतर भविष्य बनाना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों और अवसरों की कमी उनके सामने बड़ी चुनौती है।
‘यूथ की बात’ ने दिखाया युवाओं के भीतर कितना असंतोष
अररिया के टाउन हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम की खास बात यह रही कि यहां युवाओं ने केवल भाषण सुनने के बजाय अपनी बात रखने और सवाल पूछने पर जोर दिया। शिक्षा से लेकर रोजगार और परीक्षा व्यवस्था से लेकर लोकतांत्रिक अधिकारों तक कई मुद्दे एक साथ सामने आए। कार्यक्रम में हुई चर्चा ने यह संकेत दिया कि युवाओं के बीच रोजगार और शिक्षा के साथ-साथ परीक्षा व्यवस्था में भरोसा, सरकार की जवाबदेही और अपनी बात खुलकर रखने का अधिकार भी बड़ा मुद्दा बन चुका है।
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