By Malay Ojha | Published: 21 August 2026 at 03:04 PM
बिहार में शराबबंदी को लेकर जारी बहस अब कानूनी नोटिस तक पहुंच गई है। पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता आनंद कुमार तिवारी ने नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के महानिदेशक, संचालन संस्था और बिहार के विकास से जुड़े चर्चित शोध-पत्र के चार लेखकों को नोटिस भेजकर कई आंकड़ों और निष्कर्षों पर जवाब मांगा है। नोटिस में सात दिनों के भीतर तथ्यात्मक, स्पष्ट और संतोषजनक जवाब देने को कहा गया है।
कानूनी नोटिस उन चार लेखकों को भी भेजा गया है, जिनके नाम इस शोध-पत्र से जुड़े हैं। इनमें डॉ. रत्ना सहाय, प्रो. संतोष गौतम, प्रो. निशीथ प्रकाश और डॉ. आकाश देव शामिल हैं। नोटिस भेजने वाले अधिवक्ता का कहना है कि सवाल किसी लेखक की अकादमिक स्वतंत्रता या उसकी राय पर नहीं, बल्कि उन आंकड़ों और निष्कर्षों पर है जिन्हें सार्वजनिक चर्चा में तथ्य और शोध के नतीजे के तौर पर पेश किया गया।
किस पेपर को लेकर शुरू हुआ विवाद?
पूरा मामला ‘मैक्रो पर्सपेक्टिव ऑफ बिहार्स डेवलपमेंट: अचीवमेंट्स, अनफिनिश्ड एजेंडा एंड द वे फॉरवर्ड’ नाम के शोध-पत्र से जुड़ा है। यह पेपर इंडिया पॉलिसी फोरम 2026 के दौरान सामने आया था। एनसीएईआर की वेबसाइट पर भी बिहार के विकास से जुड़े इस पेपर को फोरम के प्रमुख शोध-पत्रों में शामिल किया गया है।
राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया शोध
पेपर सामने आने के बाद इसके शराबबंदी से जुड़े हिस्से ने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी। राष्ट्रीय मीडिया की कई रिपोर्टों में इसे एनसीएईआर के अध्ययन या रिपोर्ट के तौर पर पेश किया गया। रिपोर्टों के मुताबिक, शोध में बिहार की शराबबंदी के आर्थिक और सामाजिक असर का आकलन करते हुए नीति में बदलाव की सिफारिश की गई है।
शराबबंदी के राजस्व वाले आंकड़े पर सवाल
कानूनी नोटिस में सबसे अहम सवाल शराबबंदी के कारण राज्य के राजस्व से जुड़े दावे को लेकर उठाया गया है। शोध-पत्र में कहा गया है कि शराब पर लगने वाला उत्पाद शुल्क शराबबंदी से पहले के तीन वर्षों में राज्य के राजस्व का करीब 14 प्रतिशत था। दूसरी ओर, मीडिया रिपोर्टों में पेपर के आधार पर यह भी बताया गया कि शराबबंदी हटाने पर राज्य के अपने राजस्व में 14 से 15 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है।
14 प्रतिशत के दावे का आधार क्या है?
नोटिस में इसी आंकड़े की गणना और उसके संदर्भ को स्पष्ट करने की मांग की गई है। सवाल यह है कि 14 प्रतिशत का आंकड़ा किस कुल राजस्व के आधार पर निकाला गया, इसमें किन मदों को शामिल किया गया और शोध में इस आंकड़े को किस आर्थिक संदर्भ में इस्तेमाल किया गया। नोटिस भेजने वाले पक्ष का कहना है कि ऐसे महत्वपूर्ण आंकड़े सार्वजनिक किए जाते हैं तो उनके स्रोत और गणना का आधार भी साफ होना चाहिए।
महिलाओं के खिलाफ अपराध पर भी सवाल
शोध-पत्र में शराबबंदी के मूल उद्देश्यों में से एक महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराध को कम करना बताया गया है। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, पेपर में यह निष्कर्ष सामने रखा गया कि शराबबंदी लागू होने के बाद महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में व्यापक कमी दिखाई नहीं देती। बल्कि कुछ मामलों में अपराध बढ़ने की बात कही गई है।
दर्ज अपराध से निष्कर्ष निकालने पर आपत्ति
कानूनी नोटिस में इस हिस्से के आंकड़ों और निष्कर्षों का आधार भी पूछा गया है। अधिवक्ता की ओर से यह जानना चाहा गया है कि दर्ज अपराध के आंकड़ों का विश्लेषण किस तरीके से किया गया और शराबबंदी तथा महिलाओं के खिलाफ अपराध के बीच संबंध स्थापित करने के लिए कौन से सांख्यिकीय तरीके अपनाए गए। सवाल यह भी है कि क्या अन्य सामाजिक और आर्थिक कारणों को इस विश्लेषण में ध्यान में रखा गया।
अवैध शराब और दूसरे नशे पर भी जवाब
शोध-पत्र में शराबबंदी के बाद अवैध शराब के कारोबार और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी की बात भी सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्टों में पेपर के हवाले से अवैध शराब के कारोबार, तस्करी और दूसरे नशीले पदार्थों के इस्तेमाल में बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है।
बिहार से जुड़े ठोस सबूत मांगे गए
नोटिस में इस दावे को लेकर भी स्पष्टीकरण मांगा गया है। सवाल है कि बिहार में लोगों के शराब से दूसरे नशीले पदार्थों की तरफ जाने के निष्कर्ष के पीछे कौन से ठोस आंकड़े और विश्वसनीय प्रमाण मौजूद हैं। यदि यह निष्कर्ष किसी सर्वेक्षण, सरकारी आंकड़े, अपराध संबंधी रिकॉर्ड या दूसरे शोध पर आधारित है, तो उसका स्रोत और तरीका स्पष्ट करने की मांग की गई है।
शराबबंदी हटाने की सिफारिश पर भी सवाल
पेपर में शराबबंदी को खत्म कर पुराने स्तर पर उत्पाद शुल्क व्यवस्था बहाल करने की सिफारिश की गई है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, शोध में इसे राज्य के राजस्व बढ़ाने और शराबबंदी लागू करने पर होने वाले खर्च को कम करने से जोड़ा गया है। ([Moneycontrol][5])
अकादमिक बहस पर रोक का दावा नहीं
नोटिस भेजने वाले अधिवक्ता की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया है कि मामला अकादमिक बहस को रोकने का नहीं है। किसी शोधकर्ता की राय अलग हो सकती है और किसी नीति पर अलग-अलग निष्कर्ष भी सामने आ सकते हैं। लेकिन जब किसी निष्कर्ष को शोध और आंकड़ों के आधार पर सार्वजनिक बहस में रखा जाता है, तो उसके पीछे इस्तेमाल किए गए स्रोत, आंकड़े और शोध पद्धति भी स्पष्ट होनी चाहिए।
सात दिन में जवाब की मांग
नोटिस के जरिए एनसीएईआर के संबंधित पदाधिकारियों और चारों लेखकों से सात दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया है। जवाब नहीं मिलने या जवाब संतोषजनक नहीं होने की स्थिति में आगे आधिकारिक प्रतिवाद जारी करने और जरूरत पड़ने पर संबंधित प्रकाशकों, मीडिया संस्थानों तथा अन्य मंचों से तथ्य सुधार या स्पष्टीकरण की मांग करने की बात कही गई है।
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