By Malay Ojha | Published: 21 August 2026 at 02:32 PM
बिहार में स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की अधिकतम ऋण सीमा 4 लाख रुपये से घटाकर 2 लाख रुपये किए जाने के फैसले को लेकर सियासी विरोध शुरू हो गया है। राज्य सचिवमंडल सदस्य मनोज कुमार चंद्रवंशी ने इस बदलाव पर सरकार को घेरते हुए कहा कि महंगाई और बढ़ती शिक्षा लागत के बीच छात्रों को मिलने वाली आर्थिक मदद घटाना गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए बड़ी परेशानी खड़ी करेगा। उन्होंने सरकार से फैसला वापस लेकर 4 लाख रुपये की पुरानी सीमा बहाल करने की मांग की है।
मनोज कुमार चंद्रवंशी ने आरोप लगाया कि उच्च शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है, लेकिन सरकार छात्रों को आर्थिक सहारा देने के बजाय स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड की सीमा कम कर रही है। उनका कहना है कि जिस योजना का मकसद आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को आगे की पढ़ाई का मौका देना था, उसी में राशि घटाने से उन छात्रों के सामने नई मुश्किल खड़ी हो सकती है, जिनके परिवार पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने की स्थिति में नहीं हैं।
बैंक से कर्ज लेने की सलाह पर भी निशाना
उन्होंने सरकार की उस व्यवस्था पर भी सवाल उठाया, जिसमें 2 लाख रुपये से अधिक की जरूरत वाले छात्रों को दूसरी शिक्षा ऋण व्यवस्था का रास्ता अपनाने की सलाह दी जा रही है। चंद्रवंशी का कहना है कि सामान्य परिवारों के लिए बैंक से शिक्षा ऋण लेना उतना आसान नहीं होता, जितना सरकारी स्तर पर बताया जाता है। कागजी प्रक्रिया, बैंक की औपचारिकताएं और ऋण स्वीकृति की प्रक्रिया कई परिवारों के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।
गरीब परिवारों के बच्चों पर पड़ेगा असर
चंद्रवंशी ने कहा कि बिहार के बड़ी संख्या में छात्र आर्थिक कारणों से अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ने या मनपसंद पाठ्यक्रम में दाखिला नहीं लेने को मजबूर होते हैं। ऐसे में यदि शिक्षा ऋण की उपलब्ध सीमा कम होती है तो इसका सीधा असर उन विद्यार्थियों पर पड़ेगा, जिनके माता-पिता की आय सीमित है। खासकर तकनीकी, चिकित्सा, प्रबंधन और दूसरे महंगे पाठ्यक्रमों में पढ़ने वाले छात्रों के सामने फीस, किताब, रहने और अन्य खर्च जुटाने की चुनौती बढ़ सकती है।
योजना का मकसद ही आर्थिक रुकावट दूर करना था
बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की शुरुआत 2 अक्टूबर 2016 को की गई थी। इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय मदद उपलब्ध कराना रहा है। बिहार सरकार की आधिकारिक जानकारी में इस योजना के तहत पहले 4 लाख रुपये तक के ऋण की व्यवस्था का उल्लेख है। योजना में उच्च शिक्षा की फीस के साथ छात्रावास, रहने और पढ़ाई से जुड़े दूसरे खर्चों को भी शामिल किया गया था। ([Muzaffarpur][1])
योजना से कई तरह की पढ़ाई का रास्ता खुलता है
इस योजना के तहत सामान्य स्नातक पाठ्यक्रमों के साथ तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा के लिए भी ऋण की सुविधा का प्रावधान रहा है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, प्रबंधन और कानून जैसे पाठ्यक्रमों की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों के लिए आर्थिक मदद काफी महत्वपूर्ण होती है। ऐसे पाठ्यक्रमों की फीस सामान्य स्नातक पाठ्यक्रमों की तुलना में अधिक होने के कारण ऋण सीमा में कमी का असर अपेक्षाकृत ज्यादा पड़ सकता है।
शिक्षा महंगी होने का भी उठाया मुद्दा
मनोज चंद्रवंशी ने केंद्र की शिक्षा नीति पर भी सवाल उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र की सरकार के कार्यकाल में शिक्षा पर बजट में लगातार कटौती हुई है और शिक्षा का निजीकरण बढ़ा है। उनका कहना है कि जब निजी संस्थानों में पढ़ाई का खर्च बढ़ रहा है और परिवार पहले से महंगाई का दबाव झेल रहे हैं, तब सरकारी शिक्षा सहायता को मजबूत किया जाना चाहिए, न कि उसमें कटौती।
शिक्षा बजट के आंकड़ों पर राजनीतिक बहस
शिक्षा पर सरकारी खर्च को लेकर केंद्र और विपक्ष के बीच लंबे समय से राजनीतिक बहस होती रही है। हालांकि मनोज चंद्रवंशी द्वारा शिक्षा बजट को लेकर लगाए गए प्रतिशत संबंधी आरोप को अलग से आधिकारिक आंकड़ों से मिलान करना जरूरी है। बिहार के स्तर पर देखें तो वर्ष 2026-27 के बजट में शिक्षा के लिए कुल सरकारी खर्च का 21.7 प्रतिशत आवंटित किया गया है, जो राज्यों के औसत 14.5 प्रतिशत से अधिक है।
पहले 4 लाख रुपये की सुविधा का प्रावधान था
बिहार सरकार की वेबसाइट पर उपलब्ध योजना संबंधी जानकारी में 12वीं पास विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए 4 लाख रुपये तक के ऋण की व्यवस्था बताई गई है। अगस्त 2026 में भी राष्ट्रीय पोर्टल पर उपलब्ध योजना की जानकारी में 4 लाख रुपये की सीमा का उल्लेख किया गया था। ऐसे में हाल में सामने आए 2 लाख रुपये की नई सीमा संबंधी बदलाव को लेकर छात्रों और अभिभावकों के बीच स्थिति स्पष्ट होना भी जरूरी है।
सरकार से फैसला वापस लेने की मांग
मनोज कुमार चंद्रवंशी ने कहा कि सरकार को छात्रों की परेशानी को देखते हुए स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड की सीमा कम करने के फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए। उन्होंने 4 लाख रुपये की पुरानी सीमा बहाल करने की मांग की, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर और निम्न मध्यम वर्ग के विद्यार्थी अपनी उच्च शिक्षा जारी रख सकें।
छात्रों के भविष्य को लेकर सियासत तेज
स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड की राशि घटाने का मुद्दा ऐसे समय उठा है, जब बिहार में उच्च शिक्षा, रोजगार और युवाओं के भविष्य को लेकर राजनीतिक बहस पहले से तेज है। विपक्षी दल और सरकार विरोधी नेता इस फैसले को छात्रों से जोड़कर सवाल उठा रहे हैं, जबकि सरकार की ओर से नई व्यवस्था और वैकल्पिक शिक्षा ऋण योजनाओं को लेकर स्थिति स्पष्ट किए जाने की जरूरत है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा छात्रों और युवाओं के बीच भी राजनीतिक बहस का विषय बन सकता है।
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