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DU कुलपति का बड़ा बयान: सेना को ‘सारे जहां से अच्छा’ बजाना बंद कर देना चाहिए?

By Malay Ojha | Published: 27 October 2026 at 11:36 AM

दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के कुलपति योगेश सिंह ने भारतीय सेना के बैंड में बजाए जाने वाले देशभक्ति गीत ‘सारे जहां से अच्छा’ को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा कि सेना को अपने बैंड में यह गीत बजाना बंद कर देना चाहिए। उनके इस बयान से राष्ट्रगीतों, देशभक्ति और मोहम्मद इकबाल की राजनीतिक विचारधारा को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

इकबाल के बाद के विचारों पर उठाए सवाल
योगेश सिंह ने सोमवार, 26 अक्टूबर को एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान यह टिप्पणी की। उनका तर्क था कि मोहम्मद इकबाल ने भले ही ‘सारे जहां से अच्छा’ जैसा लोकप्रिय देशभक्ति गीत लिखा हो, लेकिन बाद में उनके विचार बदल गए थे और उन्होंने पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया था। इसी आधार पर कुलपति ने सेना के बैंड में इस गीत के इस्तेमाल पर सवाल उठाया।

‘वंदे मातरम’ और ‘सारे जहां से अच्छा’ पर क्या बोले कुलपति?
यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ सदस्य आर. हरि की पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ वंदे मातरम’ के विमोचन के लिए आयोजित किया गया था। इसका आयोजन प्रज्ञा प्रवाह की दिल्ली इकाई ने इंडस स्क्रॉल्स प्रेस के सहयोग से किया था।

कार्यक्रम में योगेश सिंह ने ‘वंदे मातरम’ और ‘सारे जहां से अच्छा’ को लेकर अलग-अलग रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कुछ लोग इकबाल की रचना को गर्व से गाते हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम’ गाने से इनकार करते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने भारतीय सेना के बैंड में ‘सारे जहां से अच्छा’ बजाए जाने पर आपत्ति जताई।

आरिफ मोहम्मद खान ने रखी अलग राय
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल केरल और बिहार के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने योगेश सिंह के विचारों से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि समय के साथ किसी व्यक्ति की विचारधारा बदल सकती है, लेकिन इससे उसके जीवन के पहले के विचारों और योगदान को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

आरिफ मोहम्मद खान ने इकबाल के भारत प्रेम के शुरुआती दौर का जिक्र करते हुए उनकी राजनीतिक और बौद्धिक यात्रा को व्यापक संदर्भ में देखने की बात कही। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ को देश की सभ्यतागत पहचान, स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय एकता की आकांक्षा का प्रतीक भी बताया।

कांग्रेस पर भी साधा निशाना
कार्यक्रम में प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने भी ‘वंदे मातरम’ को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकारों के दौरान इस गीत को सीमित करके इसके केवल दो पदों को प्रमुखता दी गई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस गीत का श्रेय नहीं ले सकती।

नंदकुमार ने 2026 को ‘वंदे मातरम’ की चर्चा और लोकप्रियता के फिर से बढ़ने का समय बताया। उनके मुताबिक, यह गीत सार्वजनिक चर्चाओं में दोबारा प्रमुखता हासिल कर रहा है।

1904 में लिखा गया था ‘सारे जहां से अच्छा’
मोहम्मद इकबाल ने 1904 में ‘तराना-ए-हिंदी’ की रचना की थी, जिसे ‘सारे जहां से अच्छा’ के नाम से जाना जाता है। यह गीत भारत के लोकप्रिय देशभक्ति गीतों में शामिल है और भारतीय सशस्त्र बलों के बैंड में भी इसकी धुन का इस्तेमाल होता रहा है।

योगेश सिंह के बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि किसी रचना के रचनाकार की बाद की राजनीतिक विचारधारा को उसके साहित्यिक योगदान से किस तरह जोड़ा जाना चाहिए। इस मुद्दे पर कार्यक्रम में ही अलग-अलग राय सामने आईं।

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DU कुलपति का बड़ा बयान: सेना को ‘सारे जहां से अच्छा’ बजाना बंद कर देना चाहिए?

By Malay Ojha | Published: 27 October 2026 at 11:36 AM

दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के कुलपति योगेश सिंह ने भारतीय सेना के बैंड में बजाए जाने वाले देशभक्ति गीत ‘सारे जहां से अच्छा’ को लेकर सवाल खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा कि सेना को अपने बैंड में यह गीत बजाना बंद कर देना चाहिए। उनके इस बयान से राष्ट्रगीतों, देशभक्ति और मोहम्मद इकबाल की राजनीतिक विचारधारा को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

इकबाल के बाद के विचारों पर उठाए सवाल
योगेश सिंह ने सोमवार, 26 अक्टूबर को एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान यह टिप्पणी की। उनका तर्क था कि मोहम्मद इकबाल ने भले ही ‘सारे जहां से अच्छा’ जैसा लोकप्रिय देशभक्ति गीत लिखा हो, लेकिन बाद में उनके विचार बदल गए थे और उन्होंने पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया था। इसी आधार पर कुलपति ने सेना के बैंड में इस गीत के इस्तेमाल पर सवाल उठाया।

‘वंदे मातरम’ और ‘सारे जहां से अच्छा’ पर क्या बोले कुलपति?
यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ सदस्य आर. हरि की पुस्तक ‘द स्टोरी ऑफ वंदे मातरम’ के विमोचन के लिए आयोजित किया गया था। इसका आयोजन प्रज्ञा प्रवाह की दिल्ली इकाई ने इंडस स्क्रॉल्स प्रेस के सहयोग से किया था।

कार्यक्रम में योगेश सिंह ने ‘वंदे मातरम’ और ‘सारे जहां से अच्छा’ को लेकर अलग-अलग रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कुछ लोग इकबाल की रचना को गर्व से गाते हैं, लेकिन ‘वंदे मातरम’ गाने से इनकार करते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने भारतीय सेना के बैंड में ‘सारे जहां से अच्छा’ बजाए जाने पर आपत्ति जताई।

आरिफ मोहम्मद खान ने रखी अलग राय
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल केरल और बिहार के पूर्व राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने योगेश सिंह के विचारों से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि समय के साथ किसी व्यक्ति की विचारधारा बदल सकती है, लेकिन इससे उसके जीवन के पहले के विचारों और योगदान को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

आरिफ मोहम्मद खान ने इकबाल के भारत प्रेम के शुरुआती दौर का जिक्र करते हुए उनकी राजनीतिक और बौद्धिक यात्रा को व्यापक संदर्भ में देखने की बात कही। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ को देश की सभ्यतागत पहचान, स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय एकता की आकांक्षा का प्रतीक भी बताया।

कांग्रेस पर भी साधा निशाना
कार्यक्रम में प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक जे. नंदकुमार ने भी ‘वंदे मातरम’ को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली सरकारों के दौरान इस गीत को सीमित करके इसके केवल दो पदों को प्रमुखता दी गई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इस गीत का श्रेय नहीं ले सकती।

नंदकुमार ने 2026 को ‘वंदे मातरम’ की चर्चा और लोकप्रियता के फिर से बढ़ने का समय बताया। उनके मुताबिक, यह गीत सार्वजनिक चर्चाओं में दोबारा प्रमुखता हासिल कर रहा है।

1904 में लिखा गया था ‘सारे जहां से अच्छा’
मोहम्मद इकबाल ने 1904 में ‘तराना-ए-हिंदी’ की रचना की थी, जिसे ‘सारे जहां से अच्छा’ के नाम से जाना जाता है। यह गीत भारत के लोकप्रिय देशभक्ति गीतों में शामिल है और भारतीय सशस्त्र बलों के बैंड में भी इसकी धुन का इस्तेमाल होता रहा है।

योगेश सिंह के बयान ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि किसी रचना के रचनाकार की बाद की राजनीतिक विचारधारा को उसके साहित्यिक योगदान से किस तरह जोड़ा जाना चाहिए। इस मुद्दे पर कार्यक्रम में ही अलग-अलग राय सामने आईं।

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