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सुप्रीम कोर्ट में हंगामे के बाद बड़ा फैसला, कागज फेंककर गाली देने वाले याचिकाकर्ता पर कार्रवाई से सीजेआई ने किया इनकार

By Malay Ojha | Published: 11 July 2026 at 11:12 AM

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभद्र व्यवहार करने वाले एक याचिकाकर्ता के खिलाफ फिलहाल कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। अदालत की सर्वोच्च प्रशासनिक व्यवस्था ने तय किया है कि इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने या अन्य दंडात्मक कदम उठाने की जरूरत नहीं है। यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि अदालत की गरिमा भंग करने वाले ऐसे लोग सस्ती लोकप्रियता हासिल करने में सफल न हो सकें।

सुप्रीम कोर्ट से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, घटना की पूरी जानकारी अदालत के रजिस्ट्रार ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को दी थी। सामान्य प्रक्रिया के तहत रजिस्ट्रार इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने की पहल कर सकते थे, लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाने का निर्देश दिया। अदालत का मानना है कि कुछ लोग जानबूझकर इस तरह की हरकतें केवल चर्चा में आने और प्रचार पाने के लिए करते हैं। ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई कई बार उनके मकसद को ही पूरा कर देती है।

सुनवाई के बीच अचानक शुरू हो गया हंगामा
यह घटना शुक्रवार को उस समय हुई जब न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मुख्य न्यायाधीश उस समय अदालत कक्ष में मौजूद नहीं थे। याचिकाकर्ता किसी अधिवक्ता के बिना स्वयं अपना पक्ष रख रहा था।

खुद को बताया ‘संप्रभु’, अदालत को देने लगा आदेश
सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता ने अदालत से कहा कि वह लखनऊ के सहायक पुलिस आयुक्त के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दे। उसकी भाषा और लहजा ऐसा था मानो वह अदालत को निर्देश दे रहा हो। इस पर न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन ने हैरानी जताते हुए पूछा कि क्या वह अदालत को आदेश दे रहा है।

कागज हवा में उछाले, फिर करने लगा गाली-गलौज
न्यायाधीश के सवाल के बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि उसकी ओर से सब कुछ रिकॉर्ड पर है। इसके तुरंत बाद उसने अपनी केस फाइल के कागज हवा में उछाल दिए और अदालत के भीतर अपशब्द बोलने लगा। अचानक हुई इस घटना से कुछ पल के लिए अदालत कक्ष में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए।

सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत संभाला मोर्चा
स्थिति बिगड़ती देख अदालत की सुरक्षा में तैनात कर्मियों ने तत्काल हस्तक्षेप किया। उन्होंने याचिकाकर्ता को हिरासत में लेकर अदालत कक्ष से बाहर निकाल दिया, जिससे सुनवाई दोबारा सामान्य तरीके से शुरू हो सकी। घटना के दौरान किसी तरह की शारीरिक झड़प की सूचना नहीं मिली।

रजिस्ट्रार के पास था प्राथमिकी दर्ज कराने का विकल्प
ऐसी परिस्थितियों में अदालत के रजिस्ट्रार के पास संबंधित व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार होता है। हालांकि इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि कोई औपचारिक कार्रवाई नहीं की जाएगी। अदालत का मानना है कि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने के लिए कई बार संयम भी उतना ही आवश्यक होता है जितनी कठोरता।

अदालत का संदेश—अनुशासन से बड़ा कुछ नहीं
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को न्यायपालिका के संतुलित दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि न्यायिक कार्यवाही के दौरान अनुशासनहीनता और अभद्र व्यवहार स्वीकार्य नहीं है, लेकिन हर मामले में प्रचार देने वाली कार्रवाई भी जरूरी नहीं होती। अदालत का उद्देश्य न्यायिक गरिमा बनाए रखना है, न कि ऐसे लोगों को अनावश्यक चर्चा का विषय बनाना।

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सुप्रीम कोर्ट में हंगामे के बाद बड़ा फैसला, कागज फेंककर गाली देने वाले याचिकाकर्ता पर कार्रवाई से सीजेआई ने किया इनकार

By Malay Ojha | Published: 11 July 2026 at 11:12 AM

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अभद्र व्यवहार करने वाले एक याचिकाकर्ता के खिलाफ फिलहाल कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होगी। अदालत की सर्वोच्च प्रशासनिक व्यवस्था ने तय किया है कि इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने या अन्य दंडात्मक कदम उठाने की जरूरत नहीं है। यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि अदालत की गरिमा भंग करने वाले ऐसे लोग सस्ती लोकप्रियता हासिल करने में सफल न हो सकें।

सुप्रीम कोर्ट से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, घटना की पूरी जानकारी अदालत के रजिस्ट्रार ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को दी थी। सामान्य प्रक्रिया के तहत रजिस्ट्रार इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने की पहल कर सकते थे, लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाने का निर्देश दिया। अदालत का मानना है कि कुछ लोग जानबूझकर इस तरह की हरकतें केवल चर्चा में आने और प्रचार पाने के लिए करते हैं। ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई कई बार उनके मकसद को ही पूरा कर देती है।

सुनवाई के बीच अचानक शुरू हो गया हंगामा
यह घटना शुक्रवार को उस समय हुई जब न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। मुख्य न्यायाधीश उस समय अदालत कक्ष में मौजूद नहीं थे। याचिकाकर्ता किसी अधिवक्ता के बिना स्वयं अपना पक्ष रख रहा था।

खुद को बताया ‘संप्रभु’, अदालत को देने लगा आदेश
सुनवाई शुरू होते ही याचिकाकर्ता ने अदालत से कहा कि वह लखनऊ के सहायक पुलिस आयुक्त के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दे। उसकी भाषा और लहजा ऐसा था मानो वह अदालत को निर्देश दे रहा हो। इस पर न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन ने हैरानी जताते हुए पूछा कि क्या वह अदालत को आदेश दे रहा है।

कागज हवा में उछाले, फिर करने लगा गाली-गलौज
न्यायाधीश के सवाल के बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि उसकी ओर से सब कुछ रिकॉर्ड पर है। इसके तुरंत बाद उसने अपनी केस फाइल के कागज हवा में उछाल दिए और अदालत के भीतर अपशब्द बोलने लगा। अचानक हुई इस घटना से कुछ पल के लिए अदालत कक्ष में मौजूद सभी लोग स्तब्ध रह गए।

सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत संभाला मोर्चा
स्थिति बिगड़ती देख अदालत की सुरक्षा में तैनात कर्मियों ने तत्काल हस्तक्षेप किया। उन्होंने याचिकाकर्ता को हिरासत में लेकर अदालत कक्ष से बाहर निकाल दिया, जिससे सुनवाई दोबारा सामान्य तरीके से शुरू हो सकी। घटना के दौरान किसी तरह की शारीरिक झड़प की सूचना नहीं मिली।

रजिस्ट्रार के पास था प्राथमिकी दर्ज कराने का विकल्प
ऐसी परिस्थितियों में अदालत के रजिस्ट्रार के पास संबंधित व्यक्ति के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने का अधिकार होता है। हालांकि इस मामले में प्रशासनिक स्तर पर विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि कोई औपचारिक कार्रवाई नहीं की जाएगी। अदालत का मानना है कि न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने के लिए कई बार संयम भी उतना ही आवश्यक होता है जितनी कठोरता।

अदालत का संदेश—अनुशासन से बड़ा कुछ नहीं
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को न्यायपालिका के संतुलित दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि न्यायिक कार्यवाही के दौरान अनुशासनहीनता और अभद्र व्यवहार स्वीकार्य नहीं है, लेकिन हर मामले में प्रचार देने वाली कार्रवाई भी जरूरी नहीं होती। अदालत का उद्देश्य न्यायिक गरिमा बनाए रखना है, न कि ऐसे लोगों को अनावश्यक चर्चा का विषय बनाना।

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