By Malay Ojha | Published: 31 October 2026 at 12:13 PM
भारत के अपने सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम NavIC को बड़ी मजबूती मिली है। ISRO ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर की रात GSLV-F18 रॉकेट से 2,232 किलोग्राम वजनी नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेज दिया। करीब 18 मिनट की उड़ान के बाद सैटेलाइट को तय ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित कर दिया गया।
चार सैटेलाइट के साथ मजबूत हुआ NavIC
NVS-03 के जुड़ने के बाद NavIC को चार सैटेलाइट का न्यूनतम ऑपरेशनल कॉन्फिगरेशन मिल गया है। यह भारत की स्वतंत्र लोकेशन, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाओं के लिए अहम उपलब्धि मानी जा रही है। खासकर रणनीतिक और सैन्य जरूरतों के लिहाज से अपनी सैटेलाइट नेविगेशन व्यवस्था भारत की विदेशी सिस्टम पर निर्भरता कम कर सकती है।
युद्ध के समय क्यों अहम है अपना नेविगेशन सिस्टम?
युद्ध या किसी आपात स्थिति में दूसरे देशों के नेविगेशन सिस्टम पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। ऐसे हालात में अगर किसी विदेशी सिस्टम की सेवाएं बाधित हों, तो NavIC भारत के लिए एक अहम विकल्प बन सकता है। सेना को सैनिकों, सैन्य वाहनों और युद्धपोतों की लोकेशन जानने के साथ कई दूसरी रणनीतिक गतिविधियों में सटीक नेविगेशन की जरूरत पड़ती है।
आखिर क्या है NavIC?
NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। आसान शब्दों में इसे भारत का अपना सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम कहा जा सकता है। यह GPS की तरह लोकेशन और दिशा की जानकारी देता है, लेकिन इसका मुख्य दायरा भारत और उसकी सीमाओं से करीब 1,500 किलोमीटर तक का क्षेत्र है।
तीन अहम सेवाएं देता है NavIC
यह सिस्टम मुख्य रूप से पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग की सेवाएं देता है। यानी किसी वस्तु या व्यक्ति की सटीक लोकेशन, किसी जगह तक पहुंचने की दिशा और सटीक समय की जानकारी हासिल की जा सकती है।
सिग्नल से कैसे पता चलती है लोकेशन?
NavIC के सैटेलाइट लगातार सिग्नल भेजते हैं। जमीन पर मौजूद रिसीवर इन सिग्नल को पकड़ते हैं और समय व दूरी से जुड़ी जानकारी के आधार पर लोकेशन का पता लगाया जाता है। इसी तकनीक का इस्तेमाल वाहनों, जहाजों और दूसरी सेवाओं की ट्रैकिंग में किया जा सकता है।
NVS-03 में लगी स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक
नए सैटेलाइट की एक बड़ी खासियत इसमें लगी स्वदेशी रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक है। सैटेलाइट नेविगेशन में समय की सटीकता बेहद जरूरी होती है, क्योंकि सिग्नल के समय के आधार पर ही किसी जगह की सही स्थिति का अनुमान लगाया जाता है।
L1 सिग्नल से बढ़ेगी NavIC की क्षमता
NVS-03 में L1 के साथ L5 और S बैंड पर सिग्नल भेजने की क्षमता है। L1 सिग्नल को NavIC की क्षमता बढ़ाने की दिशा में अहम माना जा रहा है। इससे भारत की अपनी नेविगेशन सेवाओं को और मजबूत करने में मदद मिलेगी।
अब अपनी तय कक्षा तक पहुंचेगा सैटेलाइट
लॉन्च के बाद NVS-03 को जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट में स्थापित किया गया है। अब सैटेलाइट अपने ऑनबोर्ड प्रोपल्शन सिस्टम की मदद से 32.5 डिग्री पूर्व में अपनी अंतिम जियोसिंक्रोनस कक्षा तक पहुंचेगा।
सेना के साथ आम लोगों को भी होगा फायदा
NavIC सिर्फ सेना के लिए नहीं है। इसका इस्तेमाल ट्रेनों, वाहनों और समुद्री जहाजों की रियल टाइम ट्रैकिंग में भी किया जा सकता है। इससे परिवहन और ट्रैकिंग से जुड़ी सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
‘वन नेशन, वन टाइम’ में भी अहम भूमिका
भारत में सटीक और एकसमान समय व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में भी NavIC की भूमिका अहम है। यह देश के ‘वन नेशन, वन टाइम’ प्रोजेक्ट से भी जुड़ा है, जिसका मकसद भारतीय मानक समय यानी IST की सटीकता और विश्वसनीयता को मजबूत करना है।
20वीं उड़ान में GSLV की एक और सफलता
ISRO प्रमुख वी नारायणन के मुताबिक, मिशन के दौरान रॉकेट के सभी सिस्टम ने उम्मीद के मुताबिक काम किया। GSLV की 20वीं उड़ान में NVS-03 को सफलतापूर्वक तय कक्षा में स्थापित किया गया। लगातार दो GSLV मिशनों के बीच सिर्फ 56 दिनों का अंतर भी इस उपलब्धि की खास बात रही।
भारतीय उद्योगों की भी बड़ी भागीदारी
इस मिशन में भारतीय उद्योगों की भूमिका भी अहम रही। ISRO के अनुसार, मिशन के बजट का करीब 80 फीसदी हिस्सा भारतीय उद्योगों पर खर्च किया गया है। NVS-03 का सफल प्रक्षेपण भारत की स्वदेशी अंतरिक्ष और नेविगेशन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ा कदम है।
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