By aryavartalive | Published: 08 July 2026 at 10:00 PM
बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में इस बार मुकाबला सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक संदेशों के बीच भी माना जा रहा है। सभी प्रमुख दलों ने अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं, लेकिन जिन प्रत्याशियों की सबसे अधिक चर्चा हो रही है, उनमें सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के उम्मीदवार नवीन कुमार तिवारी का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। इसकी वजह उनका राजनीतिक अनुभव नहीं, बल्कि उनकी जीवन यात्रा है, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
नवीन तिवारी का चुनाव मैदान में उतरना इसलिए भी चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि उनकी कहानी कई लोगों को महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शुरुआती जिंदगी की याद दिला रही है। हालांकि दोनों राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं और दोनों नेताओं की राजनीतिक यात्राएं भी अलग-अलग हैं, लेकिन गरीबी, संघर्ष और ऑटो चलाकर जीवनयापन करने का एक समान अध्याय दोनों की कहानी को जोड़ता है।
नवीन कुमार तिवारी खुद को आम लोगों का प्रतिनिधि बताते हैं। उनका कहना है कि वे एक ग्रेजुएट हैं, लेकिन बेरोजगारी और आर्थिक परिस्थितियों के कारण आजीविका चलाने के लिए पटना की सड़कों पर ऑटो चलाते हैं। वे ऑटो चालक होने के साथ-साथ ऑटो यूनियन के पदाधिकारी भी हैं। स्थानीय लोग उन्हें “युवा ग्रेजुएट कॉकरोच” के नाम से जानते हैं। यही पहचान अब उनकी चुनावी छवि का सबसे बड़ा आधार बन गई है।
गोपनीय मतदान से चुने गए सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार
सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) ने इस बार उम्मीदवार चयन के लिए अलग तरीका अपनाया। पार्टी ने अपने सदस्यों के बीच गोपनीय मतदान कराया, जिसमें नवीन कुमार तिवारी को सबसे अधिक समर्थन मिला। इसके बाद पार्टी ने उन्हें आधिकारिक रूप से बांकीपुर विधानसभा सीट से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। पार्टी का दावा है कि उसने संगठन के कार्यकर्ताओं की राय को प्राथमिकता देते हुए उम्मीदवार चुना है।
क्यों हो रही है एकनाथ शिंदे से तुलना?
एकनाथ शिंदे का जन्म 9 फरवरी 1964 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के एक साधारण परिवार में हुआ था। आर्थिक तंगी के कारण उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के लिए उन्हें ऑटो रिक्शा चलाना पड़ा। बाद में उन्होंने सामाजिक कार्यों के माध्यम से राजनीति में कदम रखा और शिवसेना से जुड़ गए। पार्टी के लिए लगातार काम करते हुए उन्होंने संगठन में अपनी पहचान बनाई। वर्ष 1997 में वे पहली बार ठाणे नगर निगम के पार्षद चुने गए। इसके बाद उनका राजनीतिक सफर लगातार आगे बढ़ता गया। 2004 में वे विधायक बने, फिर मंत्री बने और अंततः महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे। वर्तमान में वे महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री हैं। उनकी यात्रा अक्सर इस उदाहरण के रूप में पेश की जाती है कि संघर्ष से निकला व्यक्ति भी राजनीति के सर्वोच्च पदों तक पहुंच सकता है।
इसी वजह से बांकीपुर के चुनाव में कई लोग नवीन कुमार तिवारी की तुलना एकनाथ शिंदे से कर रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि जिस तरह महाराष्ट्र में एक ऑटो चालक ने अपनी मेहनत और राजनीतिक सक्रियता के दम पर मुख्यमंत्री बनने तक का सफर तय किया, उसी तरह बिहार में भी एक साधारण ऑटो चालक राजनीति में नई पहचान बना सकता है। हालांकि यह तुलना केवल उनकी संघर्षपूर्ण पृष्ठभूमि और पेशे को लेकर की जा रही है। दोनों की राजनीतिक परिस्थितियां, दल और विचारधाराएं पूरी तरह अलग हैं।
जनता के मुद्दों को चुनाव का मुख्य आधार बना रहे नवीन तिवारी
नवीन कुमार तिवारी भी अपने प्रचार के दौरान खुद को आम लोगों की आवाज बताने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई और आम नागरिक की रोजमर्रा की परेशानियों को करीब से देखा और महसूस किया है। ऑटो चलाने के दौरान रोज अलग-अलग वर्गों के लोगों से मिलने का अनुभव उन्हें जनता की समस्याओं को समझने का अवसर देता रहा है। उनका दावा है कि यदि जनता उन्हें मौका देती है तो वे इन्हीं मुद्दों को विधानसभा में मजबूती से उठाएंगे।
बांकीपुर सीट पर इस बार मुकाबला कई दलों के बीच है, लेकिन नवीन कुमार तिवारी का चुनाव प्रचार उनकी व्यक्तिगत संघर्ष यात्रा के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई दे रहा है। सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) भी इसी छवि को जनता के सामने प्रमुखता से रख रही है। पार्टी का मानना है कि राजनीति में केवल बड़े नेताओं या स्थापित चेहरों को ही मौका नहीं मिलना चाहिए, बल्कि मेहनत करने वाले आम लोगों को भी लोकतंत्र में अपनी जगह बनाने का अवसर मिलना चाहिए।
हालांकि राजनीति में संघर्ष की कहानी जितनी महत्वपूर्ण होती है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण जनता का जनादेश होता है। एकनाथ शिंदे का सफर वर्षों की राजनीतिक सक्रियता, संगठनात्मक जिम्मेदारियों और लगातार चुनावी सफलताओं के बाद मुख्यमंत्री पद तक पहुंचा। वहीं नवीन कुमार तिवारी अभी अपनी राजनीतिक यात्रा के शुरुआती पड़ाव पर हैं। ऐसे में यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि वे बिहार के “एकनाथ शिंदे” साबित होंगे या नहीं।
क्या बांकीपुर में संघर्ष की कहानी बनेगी चुनावी ताकत?
फिलहाल इतना जरूर है कि बांकीपुर उपचुनाव में नवीन कुमार तिवारी ने अपनी साधारण पृष्ठभूमि और संघर्ष की कहानी के कारण चुनावी चर्चा का केंद्र जरूर बना लिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ऑटो चालक से विधानसभा पहुंचने का उनका सपना मतदाताओं के समर्थन से पूरा होता है या नहीं। 30 जुलाई को होने वाला मतदान इस सवाल का जवाब तय करेगा कि क्या बिहार की राजनीति में भी संघर्ष की यह कहानी नया अध्याय लिख पाएगी।
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