By Malay Ojha | Published: 25 July 2026 at 07:45 AM
ग्लासगो में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने आखिरकार अपना मेडल खाता खोल दिया है। बिहार के पैरा-एथलीट झंडू कुमार ने पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन करते हुए ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। झंडू ने 130.9 अंक हासिल कर तीसरा स्थान प्राप्त किया और भारत को प्रतियोगिता का पहला पदक दिलाया। पांच साल की उम्र में पोलियो की चपेट में आने वाले झंडू ने तमाम मुश्किलों को पीछे छोड़कर यह बड़ी उपलब्धि हासिल की है।
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के लिए यह पदक इसलिए भी खास है, क्योंकि प्रतियोगिता के शुरुआती मुकाबलों में भारतीय खिलाड़ियों को मेडल के लिए इंतजार करना पड़ा था। उद्घाटन समारोह के बाद शुक्रवार को जब असली खेल मुकाबले शुरू हुए तो भारतीय खिलाड़ियों ने कई स्पर्धाओं में अपनी चुनौती पेश की। पैरा खेलों में भी भारतीय खिलाड़ियों से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन शुरुआती मुकाबलों में सफलता नहीं मिली।
आखिरी मुकाबले में झंडू ने दिलाई खुशखबरी
दिन के आखिर में पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में झंडू कुमार ने भारतीय उम्मीदों को जिंदा रखा। राष्ट्रीय स्तर पर रिकॉर्ड बना चुके झंडू से शानदार प्रदर्शन की उम्मीद थी और उन्होंने अपने प्रदर्शन से इसे सही भी साबित किया। पहले प्रयास में उन्होंने 181 किलोग्राम वजन उठाया और 124.7 अंक हासिल किए।
दूसरे प्रयास में और मजबूत हुआ दावा
झंडू कुमार ने अपने दूसरे प्रयास में प्रदर्शन को और बेहतर किया। उन्होंने 190 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया और इसके साथ उनका स्कोर बढ़कर 130.9 अंक हो गया। इसके बाद उनकी नजर एक और बड़ी कोशिश पर थी। तीसरे प्रयास में उन्होंने 196 किलोग्राम वजन उठाने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हो सके। इसके बावजूद दूसरे प्रयास में हासिल किए गए 130.9 अंक उन्हें पदक की दौड़ में बनाए रखने के लिए काफी थे।
गोल्ड और सिल्वर से मामूली अंतर से चूके
झंडू कुमार का ब्रॉन्ज मेडल लगभग तय हो चुका था, लेकिन इसके बाद ग्रुप-ए के खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने पदक का रंग तय किया। नाइजीरिया के रिलुवान इदरीस ने 208 किलोग्राम वजन उठाकर 132.8 अंक हासिल किए और गोल्ड मेडल जीत लिया। वहीं इंग्लैंड के मैथ्यू हार्डिंग ने 199 किलोग्राम वजन उठाकर 131 अंक के साथ सिल्वर मेडल अपने नाम किया।
आखिरी प्रयास सफल होता तो बदल सकता था पदक
झंडू कुमार के प्रदर्शन को देखें तो वह गोल्ड और सिल्वर के काफी करीब थे। अगर वह तीसरे प्रयास में 196 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठा लेते तो उनके अंकों में बड़ा इजाफा हो सकता था और पदक का रंग भी बदल सकता था। पैरा पावरलिफ्टिंग में खिलाड़ियों के प्रदर्शन का आकलन उनके शरीर के वजन और उठाए गए वजन के आधार पर तय होने वाले अंकों से किया जाता है। ऐसे में झंडू के पास पदक को सिल्वर या गोल्ड में बदलने का मौका था।
पांच साल की उम्र में पोलियो ने बदली जिंदगी
झंडू कुमार की यह उपलब्धि सिर्फ एक खेल पदक नहीं है, बल्कि उनके संघर्ष की कहानी भी है। बिहार के नालंदा जिले के हरनौत से आने वाले झंडू जब महज पांच साल के थे, तभी पोलियो ने उनकी जिंदगी बदल दी। इस बीमारी के कारण उनके दोनों पैर प्रभावित हो गए और उन्हें दिव्यांगता के साथ जीवन आगे बढ़ाना पड़ा। हालांकि, झंडू ने अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपने सपनों के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया।
गरीबी के बीच सब्जी बेचकर चलाया घर
झंडू कुमार का संघर्ष सिर्फ बीमारी तक सीमित नहीं था। परिवार की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी। घर का खर्च चलाने के लिए उन्हें सब्जी बेचने का काम तक करना पड़ा। जीवन की मुश्किलों के बीच उन्होंने मेहनत करना जारी रखा। आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने ई-रिक्शा चलाना भी शुरू किया। इसके साथ ही वह लगातार अपनी फिटनेस और शरीर को मजबूत बनाने पर भी ध्यान देते रहे।
एक सलाह ने बदल दी झंडू की जिंदगी
झंडू कुमार की शारीरिक ताकत और मेहनत को देखते हुए बिहार के एक खेल अधिकारी ने उन्हें पावरलिफ्टिंग में हाथ आजमाने की सलाह दी। यही सलाह आगे चलकर उनके जीवन का बड़ा मोड़ साबित हुई। झंडू ने पावरलिफ्टिंग को गंभीरता से अपनाया और धीरे-धीरे इस खेल में अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी।
नेशनल गेम्स के लिए बेचनी पड़ी ई-रिक्शा
पावरलिफ्टिंग में आगे बढ़ने का रास्ता भी उनके लिए आसान नहीं था। आर्थिक तंगी ने कई बार उनके सामने बड़ी चुनौती खड़ी की। हालात ऐसे बने कि राष्ट्रीय खेलों में हिस्सा लेने के लिए उन्हें अपना ई-रिक्शा तक बेचना पड़ा। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और खेल के प्रति अपना जुनून बनाए रखा।
संघर्ष से निकला खिलाड़ी अब देश का सितारा
झंडू कुमार ने अपनी मेहनत, हौसले और लगातार संघर्ष के दम पर वह मुकाम हासिल किया है, जिसकी कल्पना शायद उनके शुरुआती दिनों में किसी ने नहीं की होगी। कभी बीमारी और गरीबी से जूझने वाले झंडू अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर उन्होंने न सिर्फ भारत का मेडल खाता खोला, बल्कि बिहार के खेल जगत को भी गौरवान्वित किया है।
भारत के लिए बड़ी उम्मीद बने झंडू
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में झंडू कुमार का ब्रॉन्ज मेडल भारतीय दल के लिए आगे की प्रतियोगिताओं से पहले बड़ी उम्मीद लेकर आया है। उनका प्रदर्शन उन खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों और शारीरिक चुनौतियों के बावजूद खेल की दुनिया में आगे बढ़ना चाहते हैं। झंडू ने साबित किया है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, मजबूत इरादे और लगातार मेहनत के दम पर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचा जा सकता है।
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