By Malay Ojha | Published: 21 August 2026 at 08:13 PM
बिहार में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ लैंगिक हिंसा के मामलों से निपटने के लिए जिला और प्रखंड स्तर पर काम करने वाले करीब 500 कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। महिला एवं बाल विकास निगम, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के जेंडर रिसोर्स सेंटर की ओर से आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण अभियान में राज्य के सभी 38 जिलों के कर्मियों ने हिस्सा लिया। प्रशिक्षण का सबसे अहम लक्ष्य ऐसे प्रशिक्षकों का नेटवर्क तैयार करना है, जो आगे अपने-अपने जिलों में भी जागरूकता और प्रशिक्षण कार्यक्रम चला सकें।
यह क्षमता-वर्धन कार्यशाला 18, 20 और 21 अगस्त को तीन अलग-अलग बैचों में ऑनलाइन आयोजित की गई। इसमें महिला एवं बाल विकास निगम से जुड़े विभिन्न स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों को लैंगिक हिंसा की पहचान, उसके कारणों, अलग-अलग रूपों और पीड़ितों पर पड़ने वाले असर की जानकारी दी गई। प्रशिक्षण को केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों में पीड़ितों की मदद करने के तरीकों पर भी जोर दिया गया।
सभी 38 जिलों से जुड़े कर्मचारी
कार्यशाला में बिहार के सभी 38 जिलों से लगभग 500 प्रतिभागियों की भागीदारी रही। इनमें जिला परियोजना पदाधिकारी, जिला परियोजना प्रबंधक, केस वर्कर, परामर्शदाता, केंद्र प्रशासक, जेंडर विशेषज्ञ, पैरा-लीगल वालंटियर, पैरा-मेडिकल स्टाफ, महिला हेल्पलाइन कर्मी और जिला मिशन समन्वयक शामिल रहे। यानी प्रशिक्षण में उन कर्मचारियों को जोड़ा गया, जिनकी सीधी भूमिका जरूरतमंद महिलाओं और बच्चों तक सरकारी सहायता पहुंचाने में होती है।
हिंसा को समझने से लेकर रोकथाम तक पर जोर
प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को बताया गया कि लैंगिक हिंसा केवल शारीरिक हमला नहीं है। इसके सामाजिक, मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक पहलुओं को भी समझना जरूरी है। हिंसा के पीछे मौजूद सामाजिक सोच, लैंगिक असमानता और भेदभाव जैसे कारणों पर भी चर्चा की गई। अधिकारियों और कर्मचारियों को इस बात की समझ विकसित करने पर जोर दिया गया कि किसी पीड़ित के साथ बातचीत करते समय संवेदनशीलता और गोपनीयता का किस तरह ध्यान रखा जाए।
कानून की जानकारी भी दी गई
कार्यशाला में महिलाओं और बच्चों से जुड़े प्रमुख कानूनी प्रावधानों की जानकारी भी दी गई। विशेषज्ञों ने समझाया कि हिंसा की शिकायत सामने आने के बाद पीड़ित को कानूनी सहायता, परामर्श, चिकित्सकीय मदद और दूसरी जरूरी सेवाओं से जोड़ने की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए। इसका उद्देश्य यह था कि जिला और प्रखंड स्तर के कर्मचारी केवल शिकायत दर्ज कराने तक सीमित न रहें, बल्कि जरूरत के अनुसार पीड़ित को आगे की सहायता उपलब्ध कराने में भी प्रभावी भूमिका निभाएं।
पीड़ित की जरूरत को केंद्र में रखने की कोशिश
प्रशिक्षण में पीड़ित-केंद्रित सहायता व्यवस्था पर विशेष जोर दिया गया। इसमें पीड़ित की सुरक्षा, सम्मान और जरूरतों को प्राथमिकता देने की बात कही गई। सरकारी योजनाओं, सहायता सेवाओं, संस्थागत सहयोग और अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय के बारे में भी प्रतिभागियों को जानकारी दी गई। साथ ही, किसी मामले में पीड़ित को किस संस्था या सेवा तक पहुंचाया जाना चाहिए, इसके लिए प्रभावी रेफरल व्यवस्था को समझाया गया।
कानून और समाजशास्त्र के विशेषज्ञों ने समझाया मामला
कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के विधि विभाग से डॉ. विजय कुमार विमल और समाजशास्त्र विभाग से डॉ. अमित जैन ने प्रशिक्षण दिया। दिल्ली उच्च न्यायालय की अधिवक्ता महक राठी और पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता पुरुषोत्तम कुमार ने भी कानूनी पहलुओं पर प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया। इससे प्रशिक्षण में कानून और सामाजिक परिस्थितियों दोनों को साथ रखकर विषय को समझने का अवसर मिला।
मैदानी अनुभव भी प्रशिक्षण का हिस्सा रहा
कार्यशाला में कार्यक्रम और नवाचार से जुड़ी संस्था क्रिया की टीम लीड शालिनी सिंह और ‘मेरी पंचायत मेरी शक्ति’ की कार्यक्रम समन्वयक आर्किना ने भी प्रशिक्षण दिया। राज्य जेंडर परामर्शदाता रिज़वान परवेज़ तथा महिला एवं बाल विकास निगम के वन स्टॉप सेंटर के नोडल अधिकारी राजीव राजन ने भी प्रतिभागियों के साथ जरूरी जानकारी और अनुभव साझा किए।
जिलों में तैयार होगा प्रशिक्षकों का नेटवर्क
इस पूरी पहल का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य सरकारी तंत्र के भीतर प्रशिक्षकों की मजबूत टीम तैयार करना है। प्रशिक्षण में चुने गए प्रतिभागियों को आगे भी विषय विशेषज्ञों के सहयोग से क्षमता बढ़ाने के अवसर दिए जाएंगे। इससे उम्मीद है कि एक बार प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले कर्मचारी आगे अपने जिलों में दूसरे कर्मियों और संबंधित संस्थाओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने में भूमिका निभा सकेंगे।
एक प्रशिक्षण से आगे बढ़ेगी व्यवस्था
आयोजक संस्थाओं की योजना प्रशिक्षण को एक बार की गतिविधि तक सीमित रखने की नहीं है। प्रशिक्षकों को लगातार मार्गदर्शन और प्रशिक्षण देकर ऐसा नेटवर्क विकसित करने की कोशिश की जा रही है, जो जिले स्तर पर लैंगिक हिंसा से जुड़े मामलों को समझने और उनसे प्रभावी तरीके से निपटने में मदद कर सके। इससे महिला एवं बाल विकास से जुड़ी सेवाओं में काम करने वाले कर्मियों की क्षमता को लंबे समय तक मजबूत करने में मदद मिलेगी।
जमीनी स्तर पर संवेदनशील सेवा की उम्मीद
बिहार के सभी जिलों से कर्मचारियों की भागीदारी इस अभियान को व्यापक बनाती है। जिला और प्रखंड स्तर पर काम करने वाले प्रशिक्षित कर्मियों के जरिए लैंगिक हिंसा की पहचान, रोकथाम और पीड़ितों को सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया को और बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है। खास तौर पर उन मामलों में, जहां पीड़ित को कानूनी, चिकित्सकीय, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक मदद की जरूरत होती है, प्रशिक्षित कर्मियों की भूमिका अहम हो सकती है।
प्रशिक्षण का असली लक्ष्य व्यवस्था को मजबूत करना
कुल मिलाकर यह पहल केवल अधिकारियों और कर्मचारियों को लैंगिक हिंसा के बारे में जानकारी देने तक सीमित नहीं है। इसका मकसद सरकारी सहायता तंत्र के भीतर ऐसी समझ विकसित करना है, जिससे हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं और बच्चों को समय पर सही सहायता मिल सके। प्रशिक्षकों का नेटवर्क बनने के बाद जिलों में जागरूकता और प्रशिक्षण गतिविधियों को लगातार आगे बढ़ाने की संभावना भी मजबूत होगी।
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