By Malay Ojha | Published: 30 June 2026 at 02:50 PM
अगर पत्नी आर्थिक रूप से पूरी तरह सक्षम है और पति से ज्यादा कमाई कर रही है, तो सिर्फ इस आधार पर उसे पति से गुजारा भत्ता नहीं दिलाया जाना चाहिए। कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक अहम मामले की सुनवाई के दौरान यही टिप्पणी करते हुए निचली अदालत का अंतरिम गुजारा भत्ता देने का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि हर मामले में यह मान लेना सही नहीं है कि पत्नी को पति से मेंटेनेंस मिलना ही चाहिए। फैसला सुनाते हुए अदालत ने आर्थिक स्थिति को सबसे अहम आधार बताया।
कर्नाटक हाई कोर्ट की न्यायाधीश जस्टिस चिल्लकुर सुमलता ने कहा कि फैमिली कोर्ट को गुजारा भत्ते से जुड़े मामलों में दोनों पक्षों की वास्तविक आर्थिक स्थिति का गंभीरता से आकलन करना चाहिए। अगर पत्नी खुद अच्छी आय अर्जित कर रही है, उसकी आर्थिक हालत मजबूत है और उस पर बच्चों की देखभाल जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारी भी नहीं है, तो ऐसे मामलों में पति पर गुजारा भत्ता देने का बोझ डालना उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत ने जेंडर आधारित सोच से बचने की दी सलाह
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि हर पत्नी को पति से गुजारा भत्ता मिलना ही चाहिए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ते का उद्देश्य उस व्यक्ति की मदद करना है जो आर्थिक रूप से स्वयं अपना जीवनयापन करने में सक्षम नहीं है। यदि पत्नी के पास पर्याप्त आय का स्रोत है और वह अपने खर्च आसानी से उठा सकती है, तो केवल वैवाहिक संबंध के आधार पर मेंटेनेंस देना उचित नहीं होगा।
पति ने हाई कोर्ट में क्या दलील दी?
यह मामला उस व्यक्ति की याचिका से जुड़ा था, जिसने निचली अदालत के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने उसे अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने 20 हजार रुपये अंतरिम गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था।
पति ने हाई कोर्ट में कहा कि उसकी मासिक आय लगभग 60 हजार रुपये है, जबकि उसकी पत्नी हर महीने एक लाख रुपये से अधिक कमाती है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने पत्नी की आय को नजरअंदाज करते हुए मेंटेनेंस देने का आदेश पारित कर दिया, जो पूरी तरह गलत है।
पत्नी की कमाई पर अदालत ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड का अध्ययन किया और पाया कि पत्नी की मासिक आय वास्तव में एक लाख रुपये से अधिक है। अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने आदेश देते समय इस महत्वपूर्ण तथ्य पर पर्याप्त विचार नहीं किया।
न्यायालय ने कहा कि जब कोई व्यक्ति अपनी जरूरतों को पूरा करने में पूरी तरह सक्षम है, तब उसे दूसरे पक्ष से अंतरिम गुजारा भत्ता दिलाने का कोई ठोस आधार नहीं बनता।
शादी के कर्ज का दावा साबित नहीं कर सकीं पत्नी
सुनवाई के दौरान पत्नी ने यह दलील दी कि शादी के दौरान लिए गए कर्ज की किश्तें उसे चुकानी पड़ रही हैं, इसलिए आर्थिक दबाव बना हुआ है। हालांकि अदालत ने पाया कि उसने अपने दावे के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेज पेश नहीं किया।
एफिडेविट में न तो कर्ज की कुल राशि का स्पष्ट उल्लेख था, न ही किस बैंक या संस्था से ऋण लिया गया, और न ही मासिक किस्तों का कोई ब्योरा दिया गया। ऐसे में अदालत ने माना कि केवल मौखिक दावा गुजारा भत्ता देने का आधार नहीं बन सकता।
अंतरिम आदेश को किया रद्द
इन तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने निचली अदालत द्वारा दिया गया 20 हजार रुपये प्रतिमाह अंतरिम गुजारा भत्ता का आदेश रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है और अपने खर्च स्वयं उठा सकती है। इसलिए पति को हर महीने अतिरिक्त राशि देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
अंतिम फैसले पर नहीं पड़ेगा असर
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल अंतरिम गुजारा भत्ते के आदेश तक सीमित है। मुख्य मामले की सुनवाई अभी बाकी है और अंतिम निर्णय ट्रायल कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही करेगा।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में परिस्थितियां बदलती हैं या पत्नी की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है, तो वह कानून के तहत उपलब्ध उचित कानूनी विकल्पों का सहारा ले सकती है। इस आदेश को भविष्य में दायर होने वाले किसी वैध आवेदन पर रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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