By Malay Ojha | Published: 23 July 2026 at 01:48 PM
सुप्रीम कोर्ट ने राजा रघुवंशी हत्याकांड मामले में सोनम रघुवंशी को मिली जमानत रद्द कर दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि सोनम को तीन हफ्ते के भीतर सरेंडर करना होगा। अदालत ने यह भी साफ किया कि अगर मुकदमे की सुनवाई अगले छह महीने में आगे नहीं बढ़ती या पूरी नहीं होती है, तो सोनम दोबारा जमानत के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट से मिली उनकी जमानत पर रोक लग गई है।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने मेघालय सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें सोनम रघुवंशी को जमानत दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का विवादित आदेश रद्द कर दिया और सोनम को आत्मसमर्पण के लिए तीन सप्ताह का समय दिया।
छह महीने बाद फिर मांग सकती हैं जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि सोनम के लिए आगे जमानत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया है। अदालत ने कहा कि अगर छह महीने के भीतर मुकदमे की सुनवाई में पर्याप्त प्रगति नहीं होती या सुनवाई पूरी नहीं होती, तो सोनम नई जमानत अर्जी दाखिल कर सकती हैं। यानी फिलहाल उन्हें जेल लौटना होगा, लेकिन लंबे समय तक मुकदमा आगे नहीं बढ़ने की स्थिति में वह फिर से अदालत का दरवाजा खटखा सकती हैं।
गिरफ्तारी में नियमों का उल्लंघन नहीं मिला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में सोनम को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी दी गई थी। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में जरूरी कानूनी नियमों का पालन नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए जाने और गिरफ्तारी के कारणों को पर्याप्त तरीके से न समझाने के बीच फर्क है। दोनों स्थितियों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
हत्या के बाद सोनम के गायब होने का भी जिक्र
अदालत ने मामले के तथ्यों पर भी गौर किया। सुनवाई के दौरान कहा गया कि हत्या की घटना के बाद सोनम वहां मौजूद नहीं थीं और उनका पता नहीं चल पा रहा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शादी के बाद सोनम अपने पति राजा रघुवंशी के साथ मेघालय गई थीं। हनीमून के दौरान राजा की हत्या कर दी गई और इसके बाद शव को कथित तौर पर एक खाई में फेंक दिया गया।
मेघालय सरकार ने जमानत को दी थी चुनौती
राजा रघुवंशी की हत्या के मामले में सोनम की गिरफ्तारी 9 जून 2026 को की गई थी। इसके बाद मामले की जांच आगे बढ़ी और सोनम ने अलग-अलग आधार पर जमानत के लिए अदालत का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट के सामने मेघालय सरकार की ओर से मुख्य आपत्ति यह थी कि हाईकोर्ट ने सोनम को जमानत देते समय मामले के पहले से मौजूद तथ्यों और परिस्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
जमानत के लिए कई अर्जियां दाखिल होने का जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सोनम की ओर से मेरिट के आधार पर रिहाई के लिए पहले भी कई जमानत अर्जियां दाखिल की गई थीं। इसके बाद एक और अर्जी दाखिल की गई, जिसमें गिरफ्तारी के आधार की जानकारी नहीं दिए जाने को मुख्य मुद्दा बनाया गया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उन्हें राहत दी थी। शीर्ष अदालत ने अब इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।
अनुच्छेद 22 के अधिकार पर भी हुई चर्चा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत किसी गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारण बताना जरूरी है। अदालत ने इस संदर्भ में अपने पहले के एक फैसले का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देना महत्वपूर्ण अधिकार है। हालांकि, इस मामले के तथ्यों को देखते हुए अदालत ने माना कि सोनम को गिरफ्तारी के कारण बताए गए थे और संबंधित दस्तावेज भी दिए गए थे।
अदालत ने कहा- गिरफ्तारी दोबारा होने से कानून नहीं रोकता
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर किसी मामले में गिरफ्तारी के आधार से जुड़ी कोई कानूनी कमी सामने आती है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि जांच एजेंसी जांच के लिए किसी व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया और जांच की जरूरतों को अलग-अलग नजरिए से देखना होगा। इस मामले में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पीठ ने माना कि सोनम फिलहाल जमानत पर रिहा रहने की हकदार नहीं हैं।
‘जमानत नियम, जेल अपवाद’ की बात भी कही
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि सामान्य तौर पर जमानत नियम है और जेल अपवाद। लेकिन अदालत के सामने ऐसा मामला था, जिसमें जमानत के लिए पहले ही मेरिट के आधार पर दायर अर्जियों पर विचार किया जा चुका था। ऐसे में दोबारा सामने आए आधार पर जमानत जारी रखना उचित नहीं माना गया। अदालत ने कहा कि इस स्तर पर जमानत जारी रहने से चल रहे मुकदमे की सुनवाई प्रभावित होने की आशंका हो सकती है।
सुनवाई के दौरान बदलते समाज पर भी चर्चा
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में बदलते सामाजिक माहौल और पारिवारिक रिश्तों पर भी चर्चा हुई। सुनवाई के दौरान पीठ की ओर से कहा गया कि आज की पीढ़ी के पास जानकारी पहले से कहीं ज्यादा है, लेकिन दबाव और मुश्किल परिस्थितियों से निपटने की क्षमता को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। इसी दौरान संयुक्त परिवार और छोटे परिवारों की बदलती भूमिका पर भी विचार सामने आया।
मोबाइल और बच्चों की आदतों पर भी हुई बात
सुनवाई के दौरान मोबाइल फोन और बच्चों की बदलती आदतों का उदाहरण भी सामने आया। अदालत की ओर से कहा गया कि कई बार बच्चे के रोने या परेशान होने पर माता-पिता उसे समझाने के बजाय तुरंत मोबाइल फोन दे देते हैं। इससे बच्चे को अपनी भावनाओं को समझने और उनसे निपटने का मौका नहीं मिलता। पीठ ने कहा कि बच्चों के भावनात्मक विकास में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण है और उन्हें केवल तकनीकी साधनों के सहारे शांत कराना सही तरीका नहीं है।
अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सोनम रघुवंशी को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा। इसके बाद मामले की सुनवाई आगे बढ़ेगी। हालांकि, अदालत ने छह महीने की अवधि के बाद उन्हें दोबारा जमानत मांगने की छूट दी है, लेकिन इसके लिए उन्हें नई जमानत अर्जी दाखिल करनी होगी। उस समय अदालत मामले की स्थिति और मुकदमे की प्रगति को देखते हुए फैसला करेगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद हाईकोर्ट से मिली जमानत खत्म हो गई है और सोनम के सामने अब तीन सप्ताह के भीतर सरेंडर करने की स्थिति है।
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