By Malay Ojha | Published: 24 July 2026 at 01:55 PM
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग और उसके वीडियो को सोशल मीडिया तथा दूसरे डिजिटल मंचों पर प्रसारित किए जाने को लेकर शुक्रवार को सख्त रुख अपनाया। अदालत ने कार्यवाही के चुनिंदा हिस्सों को काटकर या संदर्भ से अलग करके सोशल मीडिया पर फैलाए जाने पर नाराजगी जताई और ऐसे क्लिप के प्रसारण पर रोक लगा दी। सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि अदालत की कार्यवाही को किस तरह और कितनी सीमा तक आम लोगों के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह मुद्दा आया कि लाइव स्ट्रीमिंग के जरिए सामने आने वाली कार्यवाही के कुछ हिस्सों को बाद में सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर अलग-अलग तरीके से पेश किया जाता है। कई बार किसी जज की टिप्पणी या सुनवाई के दौरान हुई बातचीत के छोटे से हिस्से को अलग करके प्रसारित किया जाता है, जिससे पूरी कार्यवाही का संदर्भ सामने नहीं आ पाता। अदालत ने इसी प्रवृत्ति पर चिंता जताई।
सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर लाइव स्ट्रीमिंग की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन मौजूदा सुनवाई में बहस इस बात पर केंद्रित रही कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई जा रही अदालती कार्यवाही का इस्तेमाल किस तरह किया जा रहा है और क्या उसके चुनिंदा हिस्सों को अलग करके प्रसारित करने से न्यायपालिका की छवि प्रभावित हो सकती है।
‘कोर्ट 24/7 मनोरंजन चैनल नहीं बन सकता’
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने डिजिटल दुनिया में आंकड़ों और सामग्री के नियमन को एक बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने अदालत की कार्यवाही तक पहुंच को लेकर भी एक नियंत्रित व्यवस्था की जरूरत की बात कही। उनके सुझाव का संकेत यह था कि कार्यवाही की पूरी जानकारी या प्रसारण हर किसी के लिए खुले तौर पर उपलब्ध कराने के बजाय, जरूरत के आधार पर पहुंच देने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि अदालत को चौबीसों घंटे चलने वाला मनोरंजन चैनल नहीं बनाया जा सकता। उनकी इस टिप्पणी को अदालती कार्यवाही के वीडियो और उसके छोटे-छोटे हिस्सों के सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित होने की मौजूदा प्रवृत्ति के संदर्भ में देखा जा रहा है।
वरिष्ठ वकील ने कहा- लाइव स्ट्रीमिंग से व्यक्तिगत परेशानी नहीं
सुनवाई में वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा कि व्यक्तिगत रूप से उन्हें अदालत की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग से कोई समस्या नहीं है। हालांकि, उन्होंने जस्टिस केवी विश्वनाथन की अदालत में हुई कार्यवाही के कुछ वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने का जिक्र किया।
वकील ने कहा कि कुछ मामलों में अदालती कार्यवाही को इस तरह पेश किया जा रहा है कि पूरा मामला गंभीर न्यायिक प्रक्रिया के बजाय मजाक का विषय बन जाता है। उनका इशारा उन वीडियो क्लिप की ओर था, जिन्हें सुनवाई के दौरान कही गई किसी खास बात या टिप्पणी को आधार बनाकर सोशल मीडिया पर तेजी से फैलाया जाता है।
मुख्य न्यायाधीश ने भी जताई चिंता
विकास सिंह की बात पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि अब हर किसी को इन चीजों को पढ़ने और देखने के लिए मजबूर होना पड़ता है। अदालत की टिप्पणी से यह साफ संकेत मिला कि न्यायिक कार्यवाही के चुनिंदा हिस्सों के लगातार प्रसारित होने से न्यायपालिका और जजों की टिप्पणियों को लेकर सार्वजनिक चर्चा का स्वरूप बदल रहा है।
अदालत की चिंता केवल लाइव स्ट्रीमिंग तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि लाइव कार्यवाही से सामने आने वाली सामग्री को बाद में किस तरह इस्तेमाल किया जाता है। किसी लंबी सुनवाई से कुछ सेकंड का हिस्सा निकालकर उसे अलग संदर्भ में दिखाने से आम दर्शक के सामने मामले की अधूरी तस्वीर पहुंच सकती है।
जजों की टिप्पणियां भी बन जाती हैं खबर
अदालत में सुनवाई के दौरान जज कई बार वकीलों से सवाल करते हैं, मौखिक टिप्पणियां करते हैं या किसी मुद्दे पर अपनी शुरुआती राय जाहिर करते हैं। ये बातें हमेशा अंतिम फैसले का हिस्सा नहीं होतीं। लेकिन लाइव स्ट्रीमिंग के दौर में ऐसी टिप्पणियां तुरंत सोशल मीडिया पर पहुंच जाती हैं और कुछ ही समय में उन पर खबरें और वीडियो सामने आने लगते हैं।
यही वजह है कि अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग को लेकर पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा के बीच संतुलन का सवाल लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। अदालत के सामने चुनौती यह है कि जनता को न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी भी मिले और कार्यवाही के किसी एक हिस्से को अलग करके गलत अर्थ निकालने की गुंजाइश भी कम हो।
अदालत की कार्यवाही तक सीमित पहुंच का सुझाव
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने डिजिटल स्पेस में उपलब्ध सामग्री को नियंत्रित करने की मुश्किलों का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत की कार्यवाही तक पहुंच सीमित रखने के तरीके पर विचार किया जाना चाहिए। उनके सुझाव के मुताबिक, जो पक्ष या व्यक्ति कार्यवाही देखना चाहता है, उसे इसके लिए स्पष्ट अनुरोध करने की व्यवस्था हो सकती है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य अदालत की कार्यवाही को पूरी तरह बंद करना नहीं, बल्कि उसके प्रसारण और इस्तेमाल को एक तय नियम के दायरे में लाना हो सकता है। हालांकि, सुनवाई के दौरान सामने आए विचारों से यह भी स्पष्ट है कि अदालत इस मुद्दे के सभी पहलुओं पर विचार कर रही है और अंतिम व्यवस्था का स्वरूप आगे की सुनवाई में साफ हो सकता है।
लाइव स्ट्रीमिंग और वीडियो क्लिप में अंतर अहम
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत की लाइव स्ट्रीमिंग और उसके बाद सोशल मीडिया पर छोटे-छोटे वीडियो क्लिप प्रसारित किए जाने को एक ही बात नहीं माना जा सकता। लाइव स्ट्रीमिंग का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है, जबकि किसी कार्यवाही के चुनिंदा हिस्से को अलग करके प्रसारित करने से उसका संदर्भ बदल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर वर्तमान में लाइव स्ट्रीमिंग की सुविधा उपलब्ध है। इसलिए इस मामले में अदालत की चिंता को लाइव स्ट्रीमिंग पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय उसके इस्तेमाल, रिकॉर्डिंग और डिजिटल मंचों पर चुनिंदा हिस्सों के प्रसारण को लेकर उठे सवालों के रूप में समझना अधिक सही होगा।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल मामले की सुनवाई जारी है और अदालत इस मुद्दे के अलग-अलग पहलुओं पर विचार कर रही है। सुनवाई में उठे सवालों से संकेत मिलता है कि आने वाले समय में अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग, उसकी रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया पर वीडियो क्लिप के प्रसारण को लेकर नियमों में बदलाव या नई व्यवस्था देखने को मिल सकती है।
अदालत के सामने सबसे बड़ी चुनौती पारदर्शिता और न्यायिक गरिमा के बीच संतुलन कायम करने की है। एक तरफ लाइव स्ट्रीमिंग को न्यायिक प्रक्रिया को जनता के करीब लाने का माध्यम माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ कार्यवाही के चुनिंदा हिस्सों के वायरल होने से पैदा होने वाली गलतफहमी और सनसनी को लेकर भी चिंता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आगे क्या दिशा तय करता है।
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