By aryavartalive | Published: 29 June 2026 at 09:33 PM
पटना में वरिष्ठ पत्रकार अनूप नारायण सिंह से बातचीत के दौरान पूर्व सांसद आनंद मोहन ने कहा कि उनके मोतिहारी वाले बयान को तोड़-मरोड़कर सोशल मीडिया पर पेश किया गया। उन्होंने साफ किया कि उनका सवाल बिहार से चुने गए छह राजपूत सांसदों की योग्यता पर नहीं, बल्कि केंद्र सरकार में उस समाज को प्रतिनिधित्व नहीं मिलने को लेकर था।
बिहार की राजनीति में पूर्व सांसद आनंद मोहन जब भी कोई बयान देते हैं, वह चर्चा का विषय बन जाता है। इस बार मोतिहारी में दिया गया उनका एक बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। कुछ सेकेंड की वीडियो क्लिप को इस तरह फैलाया गया कि मानो उन्होंने बिहार से चुने गए छह राजपूत सांसदों को अयोग्य बता दिया हो।
क्या कहा था आनंद मोहन ने?
आनंद मोहन ने मोतिहारी में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान सवाल उठाते हुए कहा था कि बिहार से राजपूत समाज के छह सांसद लोकसभा पहुंचे हैं, लेकिन केंद्र सरकार में उस समाज को प्रतिनिधित्व क्यों नहीं मिला। इसी दौरान उन्होंने कहा, “क्या बिहार से जीते छह सांसद इतने अयोग्य हैं कि उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया?”
समर्थकों ने दी सफाई
उनके समर्थकों का कहना है कि बयान का अर्थ बिल्कुल अलग था। उनका दावा है कि आनंद मोहन सांसदों की क्षमता पर सवाल नहीं उठा रहे थे, बल्कि केंद्र में प्रतिनिधित्व नहीं मिलने पर सवाल कर रहे थे। सोशल मीडिया पर बयान का एक हिस्सा काटकर चलाया गया, जिससे पूरे मामले का अर्थ ही बदल गया।
सम्मान और हिस्सेदारी की लड़ाई का दावा
आनंद मोहन ने कहा कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति, पार्टी या नेता के खिलाफ नहीं है। वह सम्मान और राजनीतिक हिस्सेदारी की बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अपनी बात रखना किसी तरह की बगावत नहीं है और हर समाज को सम्मान तथा उचित प्रतिनिधित्व मिलने की मांग करने का पूरा अधिकार है।
‘राजपूत किसी के गुलाम नहीं हैं’
पूर्व सांसद ने अपने पुराने बयान को दोहराते हुए कहा, “राजपूत किसी के गुलाम नहीं हैं। जहां सम्मान मिलेगा, राजपूत वहीं खड़े होंगे।” उनके इस बयान को आगामी विधानसभा चुनाव से जोड़कर भी देखा जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आनंद मोहन लगातार अपने समर्थक वर्ग के बीच संवाद बढ़ाने और राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।
नीतीश कुमार को लेकर पुराने बयान पर कायम
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर दिए गए अपने पुराने बयान पर भी आनंद मोहन पीछे हटने को तैयार नहीं दिखे। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने यह कहा था कि “पूरी तरह फिटफाट नीतीश कुमार को जिंदा दफन कर दिया गया है”, तो उसका मतलब केवल इतना था कि यदि मुख्यमंत्री पूरी तरह सक्रिय और सक्षम हैं तो फिर उन्होंने मुख्यमंत्री पद क्यों छोड़ा। उनके मुताबिक यह सवाल केवल उनका नहीं, बल्कि राज्य की जनता भी जानना चाहती है।
सवर्ण आयोग को लेकर भी किया दावा
आनंद मोहन ने बातचीत के दौरान यह दावा भी किया कि बिहार में सवर्ण आयोग के गठन के पीछे उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों की समस्याओं को उठाने और उन्हें न्याय दिलाने के लिए उन्होंने लगातार प्रयास किया है।
रिहाई के बाद लगातार सक्रिय हैं आनंद मोहन
जेल से रिहाई के बाद आनंद मोहन लगातार बिहार के अलग-अलग जिलों का दौरा कर रहे हैं। वह समाज के विभिन्न वर्गों से मुलाकात कर रहे हैं और सम्मान, प्रतिनिधित्व तथा सामाजिक भागीदारी जैसे मुद्दों को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की कोशिश कर रहे हैं।
बड़ा सवाल छोड़ गया बयान
मोतिहारी से उठे इस विवाद ने बिहार की राजनीति में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। क्या किसी समाज के सम्मान और हिस्सेदारी की मांग करना अपमान माना जाना चाहिए, या लोकतंत्र में अपनी बात रखने का अधिकार हर नागरिक को है? फिलहाल यह बहस राजनीतिक गलियारों से निकलकर सोशल मीडिया तक पहुंच चुकी है।
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