By Malay Ojha | Published: 22 August 2026 at 06:12 PM
बिहार में अब सांसद, विधायक और विधान पार्षदों का फोन नजरअंदाज करना अधिकारियों के लिए भारी पड़ सकता है। सरकार ने जनप्रतिनिधियों के सम्मान और प्रोटोकॉल को लेकर अधिकारियों के लिए निर्देश सख्त कर दिए हैं। किसी सांसद या विधायक का फोन आने पर अधिकारी को उसे उठाना होगा। अगर किसी वजह से फोन नहीं उठा पाते हैं तो अधिकारी को जल्द से जल्द वापस फोन करना होगा।
सरकार की ओर से सामान्य प्रशासन विभाग ने इस संबंध में अधिकारियों को जरूरी निर्देश जारी किए हैं। इसमें सांसदों, विधायकों और विधान पार्षदों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने और उनके साथ बेहतर तालमेल बनाए रखने पर जोर दिया गया है। अधिकारियों से कहा गया है कि जनप्रतिनिधियों की ओर से उठाए गए जनता से जुड़े मामलों को गंभीरता से लिया जाए।
फोन के साथ संदेशों पर भी देना होगा ध्यान
सरकार के नए निर्देश का दायरा केवल फोन कॉल तक सीमित नहीं है। जनप्रतिनिधि अगर किसी जनहित के मामले को लेकर अधिकारी से संपर्क करते हैं या कोई जरूरी संदेश भेजते हैं तो उस पर भी ध्यान देना होगा। संबंधित मामले में जरूरी कार्रवाई करने के साथ जनप्रतिनिधि को इसकी जानकारी देने की व्यवस्था भी सुनिश्चित करने को कहा गया है।
जनता से जुड़े कामों को टालने पर भी सख्ती
सरकार का मानना है कि सांसद और विधायक सीधे जनता के बीच से चुनकर आते हैं और अपने क्षेत्र की समस्याओं को लेकर अधिकारियों से संपर्क करते हैं। ऐसे में उनकी ओर से उठाए गए उचित मामलों को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वह किसी जनप्रतिनिधि की ओर से आया है। अधिकारियों को जनता से जुड़े जरूरी मामलों पर समय रहते कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच तालमेल पर जोर
नए निर्देश में सरकार ने अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर तालमेल को जरूरी बताया है। सांसद, विधायक और विधान पार्षद अपने क्षेत्रों में सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और दूसरी स्थानीय समस्याओं को लेकर अधिकारियों से संपर्क करते हैं। ऐसे मामलों में बातचीत और समन्वय बेहतर रहेगा तो लोगों की समस्याओं का समाधान भी तेजी से हो सकेगा।
आखिर सरकार को क्यों जारी करना पड़ा ऐसा आदेश?
दरअसल, बिहार में लंबे समय से कई जनप्रतिनिधि अधिकारियों के फोन नहीं उठाने या उनकी बात पर जरूरी कार्रवाई नहीं होने की शिकायत करते रहे हैं। यह मुद्दा कई बार राजनीतिक बयानबाजी से लेकर सदन तक पहुंच चुका है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों तरफ के जनप्रतिनिधियों की ओर से अधिकारियों के रवैये पर सवाल उठते रहे हैं।
सदन में भी उठ चुका है अधिकारियों का मुद्दा
विधायकों और विधान पार्षदों की शिकायत रही है कि क्षेत्र की समस्याओं को लेकर जब वे संबंधित अधिकारियों से संपर्क करते हैं तो कई बार फोन नहीं उठाया जाता। फोन उठ भी जाए तो कार्रवाई में देरी होने की बात कही जाती है। जनप्रतिनिधियों का कहना है कि इससे जनता की समस्याओं को समय पर अधिकारियों तक पहुंचाने में परेशानी होती है।
सरकार ने अब प्रोटोकॉल साफ किया
इसी तरह की शिकायतों के बीच सरकार ने अधिकारियों के लिए जनप्रतिनिधियों के साथ व्यवहार और संपर्क को लेकर नियमों को एक बार फिर स्पष्ट किया है। नए निर्देश में साफ तौर पर कहा गया है कि सांसदों, विधायकों और विधान पार्षदों के साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाए और उनके साथ जरूरी मामलों पर संपर्क बनाए रखा जाए।
सिर्फ सम्मान नहीं, काम पर भी देना होगा जवाब
सरकार का जोर केवल जनप्रतिनिधियों का फोन उठाने पर नहीं है। निर्देश का दूसरा अहम हिस्सा जनप्रतिनिधियों की ओर से उठाए गए मामलों पर कार्रवाई से जुड़ा है। अगर कोई मामला जनता के हित से जुड़ा और उचित है तो अधिकारी को उस पर जरूरी कदम उठाना होगा। कार्रवाई के बारे में संबंधित जनप्रतिनिधि को जानकारी देने पर भी जोर दिया गया है।
अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बीच दूरी कम करने की कोशिश
सरकार के इस कदम को प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के बीच दूरी कम करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता की समस्याएं पहले जनप्रतिनिधियों तक पहुंचती हैं और फिर वे उन्हें प्रशासन के सामने रखते हैं। ऐसे में दोनों के बीच बेहतर संवाद जरूरी है। सरकार चाहती है कि छोटी-छोटी बातों को लेकर दोनों पक्षों के बीच टकराव की स्थिति न बने।
राजनीतिक विश्लेषक ने बताया क्यों अहम है फैसला
राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर संजय कुमार के मुताबिक सरकार का यह फैसला प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में अहम कदम हो सकता है। उनके अनुसार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल से जनता से जुड़े काम तेजी से आगे बढ़ सकते हैं।
जनप्रतिनिधियों को भी जनहित के मुद्दों पर बात करनी होगी
राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि बेहतर व्यवस्था के लिए सिर्फ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करना पर्याप्त नहीं है। जनप्रतिनिधियों को भी अधिकारियों से जनता से जुड़े जरूरी और उचित मामलों पर ही संवाद करना चाहिए। वहीं अधिकारियों को ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए समय पर जवाब और कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
बिहार में प्रशासनिक कामकाज पर पड़ेगा असर?
सरकार के इस निर्देश के बाद अब यह देखना अहम होगा कि जमीन पर इसका कितना असर दिखाई देता है। अगर अधिकारी जनप्रतिनिधियों के फोन और संदेशों पर समय पर जवाब देते हैं और जनता से जुड़े मामलों में तेजी से कार्रवाई होती है तो इससे प्रशासनिक कामकाज में सुधार आ सकता है।
अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाने का संदेश
सरकार के इस फैसले को अधिकारियों के लिए एक साफ संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है कि जनप्रतिनिधियों के साथ संवाद में लापरवाही नहीं चलेगी। खासकर उन मामलों में जहां किसी क्षेत्र के लोगों की समस्या जुड़ी हो, वहां अधिकारी को मामले की जानकारी लेकर जरूरी कदम उठाना होगा।
अब शिकायतों पर कार्रवाई का इंतजार
फिलहाल सरकार ने निर्देश जारी कर अपनी मंशा साफ कर दी है। अब निगाह इस बात पर होगी कि अधिकारी इन निर्देशों को किस तरह लागू करते हैं। अगर इसके बाद भी जनप्रतिनिधियों की ओर से फोन नहीं उठाने या जनता से जुड़े मामलों में कार्रवाई नहीं होने की शिकायत आती है तो सरकार आगे क्या कदम उठाती है, यह भी देखने वाली बात होगी।
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