By Malay Ojha | Published: 14 July 2026 at 07:15 PM
बिहार में शराबबंदी कानून के बीच पटना हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि सिर्फ किसी व्यक्ति के मुंह से शराब जैसी गंध आने को शराब पीने का पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर एक पुलिस अधिकारी की सेवा समाप्त करने के आदेश को गलत ठहराते हुए राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ इतनी बड़ी कार्रवाई करने से पहले ठोस और वैज्ञानिक साक्ष्य होना जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश मीनाक्षी मदन राय और न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल शराब की गंध महसूस होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित व्यक्ति ने शराब का सेवन किया है। अदालत ने माना कि बिना पर्याप्त वैज्ञानिक जांच के किसी कर्मचारी को दोषी ठहराना कानून के अनुरूप नहीं है।
राज्य सरकार की अपील भी हुई खारिज
खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए पहले दिए गए उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें संबंधित पुलिस अधिकारी के निलंबन और बाद में की गई विभागीय कार्रवाई को अवैध माना गया था। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य इतने मजबूत नहीं थे कि उनके आधार पर सेवा से बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा दी जा सके।
क्या था पूरा मामला?
मामला पुलिस अधिकारी धर्मराज सिंह से जुड़ा है। अदालत में बताया गया कि उन्होंने करीब 32 वर्षों तक पुलिस विभाग में सेवा दी। घटना के समय वह मोतिहारी पुलिस लाइन की रिजर्व फोर्स में सहायक अवर निरीक्षक के पद पर तैनात थे। औचक निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने दावा किया कि उनके मुंह से शराब जैसी गंध आ रही थी। इसके बाद उन्हें हिरासत में लेकर ब्रेथ एनालाइजर से जांच कराई गई और विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई।
जांच रिपोर्ट पर अदालत ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि ब्रेथ एनालाइजर की रिपोर्ट में न तो शराब की मात्रा दर्ज थी और न ही इसकी पुष्टि के लिए रक्त या मूत्र की जांच कराई गई। अदालत ने कहा कि केवल प्रारंभिक जांच के आधार पर किसी व्यक्ति को शराब सेवन का दोषी नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि वैज्ञानिक और चिकित्सकीय जांच के बिना केवल अनुमान के आधार पर किसी कर्मचारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं है।
कर्मचारी ने दवाओं का दिया था हवाला
विभागीय कार्रवाई के दौरान धर्मराज सिंह ने कारण बताओ नोटिस के जवाब में कहा था कि वह खांसी की दवा सहित कुछ अन्य दवाओं का सेवन कर रहे थे। उनका कहना था कि इन्हीं दवाओं के कारण उनके मुंह से अल्कोहल जैसी गंध आ सकती थी। हालांकि विभाग ने इस दलील पर विचार किए बिना उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। यही फैसला बाद में अदालत में चुनौती का विषय बना।
डॉक्टर की रिपोर्ट भी नहीं बनी मजबूत साक्ष्य
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि विभाग जिस चिकित्सकीय रिपोर्ट का हवाला दे रहा था, वह भी कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरी। अदालत ने पाया कि संबंधित डॉक्टर से न तो कोई पूछताछ की गई और न ही उनकी गवाही दर्ज कराई गई। इतना ही नहीं, विभागीय जांच रिपोर्ट में भी डॉक्टर की राय का समुचित उल्लेख नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में उस रिपोर्ट को निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
ब्रेथ एनालाइजर अंतिम प्रमाण नहीं
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ब्रेथ एनालाइजर केवल एक प्रारंभिक जांच का माध्यम हो सकता है। इसे शराब सेवन का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब अन्य वैज्ञानिक जांच उपलब्ध न हो। अदालत ने कहा कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ गंभीर दंडात्मक कार्रवाई करने से पहले निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रमाणिक जांच आवश्यक है।
बहाली का रास्ता साफ
सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि पुलिस अधिकारी के खिलाफ की गई विभागीय कार्रवाई में गंभीर त्रुटियां थीं। इसी आधार पर अदालत ने राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी और अधिकारी को राहत देने वाले पूर्व आदेश को बरकरार रखा। इस फैसले को बिहार में शराबबंदी से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
Aryavarta Live के WhatsApp Channel से जुड़ें और हर महत्वपूर्ण अपडेट सीधे अपने मोबाइल पर पाएं।
WhatsApp चैनल जॉइन करें

