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मरते पत्रकार, मौन व्यवस्था! राजेश अवस्थी की मौत ने फिर खोल दिए मीडिया जगत के जख्म

By Malay Ojha | Published: 24 May 2026 at 02:10 PM

वरिष्ठ पत्रकार राजेश अवस्थी की मौत की खबर ने मीडिया जगत को अंदर तक झकझोर दिया है। बताया जा रहा है कि उनका शव घर से दूर एक पेड़ के नीचे मिला। यह खबर सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि उस पूरे दर्द की कहानी है जिसे देश के हजारों पत्रकार हर दिन चुपचाप जी रहे हैं।

राजेश अवस्थी लंबे समय तक बड़े अखबारों से जुड़े रहे। उम्र के आखिरी पड़ाव में जिस इंसान ने पूरी जिंदगी दूसरों की आवाज दुनिया तक पहुंचाई, वही अपनी तकलीफ किसी तक नहीं पहुंचा पाया। कुछ लोगों का कहना है कि नौकरी छूटने और आर्थिक तंगी ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था।

पत्रकार की जिंदगी की सबसे बड़ी विडम्बना
पत्रकार दूसरों के हक, न्याय और संघर्ष की लड़ाई लड़ता है, लेकिन जब बात खुद की आती है तो वह सबसे अकेला इंसान बन जाता है। जो कलम सत्ता से सवाल पूछती है, वही कलम अपने दर्द पर अक्सर खामोश रह जाती है।

सेवा में भी संघर्ष, बुढ़ापे में भी बेबसी
सच्चाई यह है कि ज्यादातर पत्रकार नौकरी के दौरान ही सम्मानजनक जिंदगी नहीं जी पाते। तनख्वाह, असुरक्षा और लगातार दबाव के बीच जिंदगी गुजरती रहती है। फिर जब उम्र ढल जाती है और नौकरी छूट जाती है, तब वही पत्रकार आर्थिक संकट और अकेलेपन की अंधेरी सुरंग में धकेल दिया जाता है।

पत्रकारों के लिए आखिर खड़ा कौन होता है?
यह सवाल हमेशा अधूरा रह जाता है कि पत्रकारों की लड़ाई आखिर कौन लड़ेगा? न सरकारें गंभीर दिखती हैं, न विपक्ष और न ही बड़े मीडिया संस्थान। सबसे ज्यादा दर्दनाक बात यह है कि कई बार पत्रकारों का सबसे बड़ा शोषण उन्हीं संस्थानों में होता है जहां वे दिन-रात मेहनत करते हैं।

वेज बोर्ड की लड़ाई भी अधूरी रह गई
पत्रकारों के बेहतर भविष्य के लिए वेज बोर्ड बनाए गए, सिफारिशें आईं, अदालतों तक लड़ाई पहुंची, लेकिन जमीन पर बहुत कम बदलाव दिखाई दिया। कई पत्रकार अपने हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते दुनिया छोड़ गए।

मजीठिया वेज बोर्ड से उम्मीदें जरूर जगी थीं, लेकिन उसका पूरा लाभ कितने लोगों तक पहुंचा, यह सवाल आज भी हवा में तैर रहा है।

बड़े-बड़े भाषण, लेकिन पत्रकार आज भी अकेला
मीडिया की आजादी और पत्रकारिता की गिरती स्थिति पर चर्चा करने वालों की कमी नहीं है। मंचों पर लंबी बातें होती हैं, बहसें होती हैं, लेकिन जब किसी पत्रकार की जिंदगी बिखरती है तो उसके साथ खड़ा होने वाला शायद ही कोई दिखाई देता है।

हर शहर में मौजूद हैं हजारों ‘राजेश अवस्थी’
राजेश अवस्थी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन सच यह है कि आज भी हजारों पत्रकार उसी दर्द के साथ जिंदगी काट रहे हैं। कोई नौकरी बचाने की चिंता में टूट रहा है, कोई परिवार चलाने के संघर्ष में और कोई बुढ़ापे की असुरक्षा में।

उनकी आंखों में भी वही डर है, वही अकेलापन है और वही खामोश चीख, जो शायद कभी सुनी ही नहीं जाती।

क्या पत्रकारों की जिंदगी हमेशा ऐसी ही रहेगी?
यह सवाल अब सिर्फ मीडिया जगत का नहीं, पूरे समाज का है। जो लोग हर दिन समाज को जागरूक करते हैं, क्या उनकी जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि उनके टूटने की आवाज भी किसी तक नहीं पहुंचती?

राजेश अवस्थी की मौत सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि मीडिया जगत के सीने पर लगा वह घाव है जो शायद बहुत लंबे समय तक नहीं भरेगा।

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मरते पत्रकार, मौन व्यवस्था! राजेश अवस्थी की मौत ने फिर खोल दिए मीडिया जगत के जख्म

By Malay Ojha | Published: 24 May 2026 at 02:10 PM

वरिष्ठ पत्रकार राजेश अवस्थी की मौत की खबर ने मीडिया जगत को अंदर तक झकझोर दिया है। बताया जा रहा है कि उनका शव घर से दूर एक पेड़ के नीचे मिला। यह खबर सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि उस पूरे दर्द की कहानी है जिसे देश के हजारों पत्रकार हर दिन चुपचाप जी रहे हैं।

राजेश अवस्थी लंबे समय तक बड़े अखबारों से जुड़े रहे। उम्र के आखिरी पड़ाव में जिस इंसान ने पूरी जिंदगी दूसरों की आवाज दुनिया तक पहुंचाई, वही अपनी तकलीफ किसी तक नहीं पहुंचा पाया। कुछ लोगों का कहना है कि नौकरी छूटने और आर्थिक तंगी ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था।

पत्रकार की जिंदगी की सबसे बड़ी विडम्बना
पत्रकार दूसरों के हक, न्याय और संघर्ष की लड़ाई लड़ता है, लेकिन जब बात खुद की आती है तो वह सबसे अकेला इंसान बन जाता है। जो कलम सत्ता से सवाल पूछती है, वही कलम अपने दर्द पर अक्सर खामोश रह जाती है।

सेवा में भी संघर्ष, बुढ़ापे में भी बेबसी
सच्चाई यह है कि ज्यादातर पत्रकार नौकरी के दौरान ही सम्मानजनक जिंदगी नहीं जी पाते। तनख्वाह, असुरक्षा और लगातार दबाव के बीच जिंदगी गुजरती रहती है। फिर जब उम्र ढल जाती है और नौकरी छूट जाती है, तब वही पत्रकार आर्थिक संकट और अकेलेपन की अंधेरी सुरंग में धकेल दिया जाता है।

पत्रकारों के लिए आखिर खड़ा कौन होता है?
यह सवाल हमेशा अधूरा रह जाता है कि पत्रकारों की लड़ाई आखिर कौन लड़ेगा? न सरकारें गंभीर दिखती हैं, न विपक्ष और न ही बड़े मीडिया संस्थान। सबसे ज्यादा दर्दनाक बात यह है कि कई बार पत्रकारों का सबसे बड़ा शोषण उन्हीं संस्थानों में होता है जहां वे दिन-रात मेहनत करते हैं।

वेज बोर्ड की लड़ाई भी अधूरी रह गई
पत्रकारों के बेहतर भविष्य के लिए वेज बोर्ड बनाए गए, सिफारिशें आईं, अदालतों तक लड़ाई पहुंची, लेकिन जमीन पर बहुत कम बदलाव दिखाई दिया। कई पत्रकार अपने हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते दुनिया छोड़ गए।

मजीठिया वेज बोर्ड से उम्मीदें जरूर जगी थीं, लेकिन उसका पूरा लाभ कितने लोगों तक पहुंचा, यह सवाल आज भी हवा में तैर रहा है।

बड़े-बड़े भाषण, लेकिन पत्रकार आज भी अकेला
मीडिया की आजादी और पत्रकारिता की गिरती स्थिति पर चर्चा करने वालों की कमी नहीं है। मंचों पर लंबी बातें होती हैं, बहसें होती हैं, लेकिन जब किसी पत्रकार की जिंदगी बिखरती है तो उसके साथ खड़ा होने वाला शायद ही कोई दिखाई देता है।

हर शहर में मौजूद हैं हजारों ‘राजेश अवस्थी’
राजेश अवस्थी अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन सच यह है कि आज भी हजारों पत्रकार उसी दर्द के साथ जिंदगी काट रहे हैं। कोई नौकरी बचाने की चिंता में टूट रहा है, कोई परिवार चलाने के संघर्ष में और कोई बुढ़ापे की असुरक्षा में।

उनकी आंखों में भी वही डर है, वही अकेलापन है और वही खामोश चीख, जो शायद कभी सुनी ही नहीं जाती।

क्या पत्रकारों की जिंदगी हमेशा ऐसी ही रहेगी?
यह सवाल अब सिर्फ मीडिया जगत का नहीं, पूरे समाज का है। जो लोग हर दिन समाज को जागरूक करते हैं, क्या उनकी जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है कि उनके टूटने की आवाज भी किसी तक नहीं पहुंचती?

राजेश अवस्थी की मौत सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि मीडिया जगत के सीने पर लगा वह घाव है जो शायद बहुत लंबे समय तक नहीं भरेगा।

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