By Malay Ojha | Published: 15 July 2026 at 06:24 PM
पटना हाई कोर्ट के उस विवादित फैसले पर अब सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला की सलवार उतारने की कोशिश करना और उसकी छाती दबाकर छेड़छाड़ करना ‘दुष्कर्म की कोशिश’ के दायरे में नहीं आता। शीर्ष अदालत ने साफ संकेत दिए हैं कि इस आदेश की गहराई से जांच की जाएगी और पूरे मामले पर विस्तृत फैसला सुनाया जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि इतने संवेदनशील मामलों में बिना पर्याप्त कानूनी पड़ताल के दिए गए फैसले न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़े कर सकते हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल हैं, ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान पटना हाई कोर्ट के फैसले पर चिंता व्यक्त की। पीठ ने कहा कि अदालत इस आदेश का विस्तार से परीक्षण करेगी और इसके बाद एक विस्तृत आदेश जारी किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान उठा पटना हाई कोर्ट के फैसले का मुद्दा
यह मामला उस समय सुप्रीम कोर्ट के सामने आया, जब इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक अन्य विवादित फैसले पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई की जा रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पटना हाई कोर्ट ने भी हाल ही में ऐसा ही फैसला दिया है, जिसने कानूनी और सामाजिक स्तर पर बहस छेड़ दी है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर पहले से चल रही है सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट पहले से इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश की समीक्षा कर रहा है, जिसमें कहा गया था कि नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा खोलना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना ‘दुष्कर्म की कोशिश’ नहीं माना जा सकता। इस फैसले की देशभर में आलोचना हुई थी, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू की।
यौन अपराध मामलों में संवेदनशीलता पर विशेष जोर
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को भी मंजूरी दी। इस रिपोर्ट में यौन अपराध से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायिक संवेदनशीलता बनाए रखने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं। अदालत का मानना है कि ऐसे मामलों में न्यायिक भाषा, पीड़ित के प्रति व्यवहार और कानूनी दृष्टिकोण बेहद संवेदनशील होना चाहिए।
सभी अदालतों को दिए गए सख्त निर्देश
शीर्ष अदालत ने देश की सभी अदालतों से कहा है कि यौन अपराध से जुड़े मामलों की सुनवाई करते समय उसके द्वारा मंजूर किए गए दिशा-निर्देशों का पूरी गंभीरता से पालन किया जाए। अदालत का कहना है कि न्याय केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि पीड़ित की गरिमा और अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए।
पहले ही बनवाए गए थे नए दिशा-निर्देश
इस वर्ष की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी को निर्देश दिया था कि वह यौन अपराध के मामलों में सुनवाई के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रिया और न्यायिक व्यवहार को लेकर व्यापक दिशा-निर्देश तैयार करे। अदालत ने स्पष्ट किया था कि ये दिशा-निर्देश भारतीय सामाजिक परिस्थितियों और न्याय व्यवस्था की आवश्यकताओं के अनुरूप होने चाहिए, न कि केवल विदेशी कानूनों की नकल पर आधारित।
फैसलों पर बढ़ी कानूनी बहस
पटना और इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसलों के सामने आने के बाद देशभर में यह बहस तेज हो गई कि दुष्कर्म की कोशिश जैसे गंभीर अपराधों की कानूनी व्याख्या किस आधार पर की जानी चाहिए। कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल शारीरिक कृत्य ही नहीं, बल्कि आरोपी की मंशा, परिस्थितियां और पीड़िता के साथ हुए व्यवहार को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
अब सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत आदेश पर नजर
अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के आगामी विस्तृत आदेश पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि शीर्ष अदालत का फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए महत्वपूर्ण कानूनी आधार तैयार कर सकता है। साथ ही यह भी तय करेगा कि दुष्कर्म की कोशिश जैसे मामलों की व्याख्या किस तरह की जाएगी और अदालतें किन मानकों को अपनाएंगी।
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