By लाइव आर्यावर्त टीम | Published: 21 May 2026 at 06:23 AM
देश में बहुत जल्द ऐसी गाड़ियां सड़कों पर दिखाई दे सकती हैं जो पेट्रोल या डीजल नहीं, बल्कि गन्ने के रस और मक्के से तैयार एथेनॉल पर चलेंगी. केंद्र सरकार फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को तेजी से बढ़ावा देने की तैयारी में जुटी है. इसके जरिए पेट्रोल, डीजल और सीएनजी पर निर्भरता कम करने की बड़ी योजना बनाई जा रही है.
हालांकि, इस नई तकनीक को लेकर वाहन कंपनियों ने सरकार के सामने एक अहम शर्त रख दी है. कंपनियों का कहना है कि जब तक हाई-एथेनॉल ईंधन पेट्रोल से सस्ता नहीं होगा, तब तक ग्राहक फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियां खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाएंगे.
आखिर क्या होता है ई-85 और ई-100 फ्यूल?
ई-85 ऐसे ईंधन को कहा जाता है जिसमें 85 प्रतिशत एथेनॉल और 15 प्रतिशत पेट्रोल होता है. वहीं ई-100 पूरी तरह शुद्ध एथेनॉल आधारित ईंधन है. पेट्रोलियम मंत्रालय, तेल कंपनियों और वाहन निर्माताओं के बीच हुई हालिया बैठकों में इस तकनीक को लेकर विस्तार से चर्चा हुई है.
माइलेज पर पड़ता है सीधा असर
विशेषज्ञों के मुताबिक एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से थोड़ी कम होती है. इसका असर सीधे गाड़ियों की माइलेज पर पड़ता है. यही वजह है कि वाहन कंपनियां चाहती हैं कि एथेनॉल आधारित ईंधन काफी सस्ता मिले ताकि ग्राहकों को खर्च में फायदा नजर आए.
ब्राजील मॉडल का दिया गया उदाहरण
ऑटो कंपनियों ने ब्राजील का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता है, इसलिए फ्लेक्स-फ्यूल वाहन तेजी से लोकप्रिय हुए. भारत में भी अगर लोगों को ईंधन खर्च में राहत मिलेगी तभी यह तकनीक तेजी से आगे बढ़ पाएगी.
नई तकनीक के कारण बढ़ सकती है गाड़ियों की कीमत
हाई-एथेनॉल ईंधन सामान्य इंजनों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इसके लिए इंजन और फ्यूल सिस्टम में तकनीकी बदलाव करने पड़ेंगे. इससे गाड़ियों की कीमत बढ़ने की आशंका है. इसी वजह से वाहन कंपनियां सरकार से टैक्स में राहत की मांग कर रही हैं.
जीएसटी में कटौती की मांग तेज
फिलहाल फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों पर भी सामान्य गाड़ियों की तरह 18 से 40 प्रतिशत तक कर लगाया जाता है. वाहन कंपनियों का कहना है कि शुरुआती दौर में टैक्स कम किया जाए ताकि ग्राहक नई तकनीक को अपनाने के लिए प्रेरित हों.
इलेक्ट्रिक गाड़ियों से तुलना को लेकर सरकार सतर्क
सरकार फिलहाल कारों पर बड़ा टैक्स घटाने से बच रही है. इसकी वजह यह है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर केवल 5 प्रतिशत जीएसटी लगता है. ऐसे में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को ज्यादा राहत देने पर दोनों तकनीकों के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है.
देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है पूरा मिशन
सरकार फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक को केवल नई सुविधा नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा के बड़े हथियार के रूप में देख रही है. भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, जिस पर हर साल भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है.
परिवहन क्षेत्र सबसे बड़ा उपभोक्ता
आंकड़ों के अनुसार देश में पेट्रोल की खपत का सबसे बड़ा हिस्सा परिवहन क्षेत्र में होता है. डीजल की मांग का भी बड़ा भाग वाहनों से जुड़ा है. ऐसे में एथेनॉल का उपयोग बढ़ने से तेल आयात पर निर्भरता कम हो सकती है.
वाहन कंपनियां नई तकनीक के लिए तैयार
भारतीय मानक ब्यूरो ने हाई-एथेनॉल पेट्रोल के लिए नए मानक जारी कर दिए हैं. कई बड़ी वाहन कंपनियां पहले ही फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल और प्रोटोटाइप पेश कर चुकी हैं. उद्योग जगत का कहना है कि नई तकनीक अपनाने के लिए तैयारियां लगभग पूरी हैं.
एथेनॉल उत्पादन में देश ने पकड़ी रफ्तार
देश में एथेनॉल उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ी है. मौजूदा समय में उत्पादन क्षमता मांग से कहीं ज्यादा बताई जा रही है. सरकार का लक्ष्य आने वाले वर्षों में एथेनॉल मिश्रण को और तेज करना है.
पानी की खपत बनी सबसे बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि गन्ने से एथेनॉल बनाने में काफी पानी खर्च होता है. ऐसे में कृषि कचरे और दूसरी पीढ़ी के एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देना जरूरी होगा ताकि पर्यावरण संतुलन भी बना रहे.

