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बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव, 1.90 करोड़ लोगों की टीबी स्क्रीनिंग; अनावश्यक रेफरल पर भी सख्ती

By Malay Ojha | Published: 20 August 2026 at 05:25 PM

बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार के स्तर पर किए जा रहे बदलाव अब आंकड़ों में भी दिखाई देने लगे हैं। जनता दल यूनाइटेड ने दावा किया है कि स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के पद संभालने के बाद महज 104 दिनों में मरीजों के हित में कई अहम फैसले लिए गए हैं। इनमें जिला अस्पतालों में 36 तरह के ऑपरेशन की सुविधा, अनावश्यक रेफरल पर रोक, डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी दूर करने के लिए भर्ती तथा टीबी की बड़े स्तर पर जांच जैसे कदम प्रमुख हैं। खास तौर पर जुलाई में चलाए गए टीबी जांच अभियान में 1.90 करोड़ से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की गई।

जदयू के विधान पार्षद और मुख्य प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार, प्रदेश प्रवक्ता डॉ. अनुप्रिया यादव और प्रदेश प्रवक्ता चंदन कुमार सिंह ने संयुक्त प्रेस वार्ता में स्वास्थ्य विभाग की उपलब्धियों को सामने रखा। नेताओं ने कहा कि बिहार अब बीमारियों के गंभीर होने का इंतजार करने के बजाय उन्हें शुरुआती स्तर पर पहचानने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। 2 जुलाई से 31 जुलाई तक चले विशेष अभियान में 1.90 करोड़ से ज्यादा लोगों की टीबी स्क्रीनिंग हुई। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान कुल 1,90,91,155 लोगों की स्क्रीनिंग की गई।

लक्ष्य से कई गुना आगे पहुंची स्क्रीनिंग
इस अभियान को लेकर शुरुआती सरकारी लक्ष्य एक करोड़ स्क्रीनिंग का रखा गया था। अभियान के दौरान वास्तविक स्क्रीनिंग इससे काफी आगे निकल गई। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार 63,26,324 लोगों की स्क्रीनिंग का निर्धारित लक्ष्य था, जबकि जांच की संख्या 1,90,91,155 तक पहुंची। यानी राज्य ने तय लक्ष्य का करीब तीन गुना आंकड़ा पार किया। इस अभियान में जिलों के प्रदर्शन में भी बड़ा अंतर सामने आया और पटना सबसे आगे रहा।

बीमारी का इंतजार नहीं, मरीज की तलाश
जदयू नेताओं ने स्वास्थ्य विभाग की इस रणनीति को बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत बताया। उनका कहना था कि टीबी जैसी बीमारी के मामले में केवल अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों पर निर्भर रहने के बजाय संभावित मरीजों तक पहुंचकर जांच की जा रही है। इससे बीमारी की पहचान पहले हो सकती है और संक्रमित व्यक्ति का समय पर इलाज शुरू किया जा सकता है। जुलाई में बड़े पैमाने पर की गई स्क्रीनिंग इसी दिशा में उठाया गया कदम बताया गया।

अनावश्यक रेफरल पर डॉक्टरों की जवाबदेही
स्वास्थ्य व्यवस्था में दूसरा बड़ा बदलाव मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजे जाने की व्यवस्था को लेकर है। मुख्यमंत्री की स्वास्थ्य विभाग के साथ हुई समीक्षा बैठक में 15 अगस्त से अनुमंडलीय और जिला अस्पतालों से मेडिकल कॉलेज या उच्च स्वास्थ्य संस्थानों में अनावश्यक रेफरल पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था।

जिला अस्पतालों में ही बढ़ेगी इलाज की सुविधा
जदयू नेताओं ने कहा कि सरकार का जोर जिला स्तर पर ही अधिक से अधिक इलाज उपलब्ध कराने पर है। इसी कड़ी में जिला अस्पतालों में 36 तरह के ऑपरेशन की सुविधा सुनिश्चित करने का फैसला लिया गया है। इसका सीधा फायदा उन मरीजों को मिल सकता है, जिन्हें छोटी या मध्यम स्तर की सर्जरी के लिए बड़े शहरों या मेडिकल कॉलेज अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। हाल में मुख्यमंत्री ने भी जिला अस्पतालों में 36 तरह की सर्जरी उपलब्ध कराने की बात कही थी।

डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी दूर करने पर जोर
स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता केवल अस्पताल की इमारत या मशीनों से तय नहीं होती। इसके लिए पर्याप्त डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी भी जरूरी हैं। जदयू नेताओं के मुताबिक सरकार ने अस्पतालों में डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी दूर करने के लिए कई स्तर पर फैसले लिए हैं और कम समय में बड़ी संख्या में पदों पर नियुक्तियां की गई हैं। इससे अस्पतालों में मरीजों को इलाज उपलब्ध कराने की क्षमता बढ़ने की उम्मीद है।

वेंटिलेटर से लेकर डायलिसिस तक सुविधाओं पर जोर
प्रेस वार्ता में अस्पतालों में जरूरी चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करने का भी दावा किया गया। नेताओं के मुताबिक वेंटिलेटर और डायलिसिस जैसी सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ाने के साथ जांच की व्यवस्था को मजबूत करने पर काम हो रहा है। इसके अलावा मरीजों को 504 तरह की दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराने का लक्ष्य भी रखा गया है। सरकार का जोर अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने के साथ इलाज और जांच को मरीजों के लिए अधिक सुलभ बनाने पर है।

104 दिनों में लिए गए फैसलों को बताया बदलाव की शुरुआत
निशांत कुमार ने 8 मई को स्वास्थ्य मंत्री के रूप में पदभार संभाला था। उस समय उन्होंने ईमानदारी से काम करने और समाज के अंतिम व्यक्ति तक इलाज की सुविधा पहुंचाने की बात कही थी। अब जदयू नेताओं ने उनके शुरुआती कार्यकाल को स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव की दिशा में उठाए गए कदमों से जोड़ते हुए सरकार की उपलब्धियां गिनाईं।

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बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था में बड़ा बदलाव, 1.90 करोड़ लोगों की टीबी स्क्रीनिंग; अनावश्यक रेफरल पर भी सख्ती

By Malay Ojha | Published: 20 August 2026 at 05:25 PM

बिहार में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार के स्तर पर किए जा रहे बदलाव अब आंकड़ों में भी दिखाई देने लगे हैं। जनता दल यूनाइटेड ने दावा किया है कि स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार के पद संभालने के बाद महज 104 दिनों में मरीजों के हित में कई अहम फैसले लिए गए हैं। इनमें जिला अस्पतालों में 36 तरह के ऑपरेशन की सुविधा, अनावश्यक रेफरल पर रोक, डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी दूर करने के लिए भर्ती तथा टीबी की बड़े स्तर पर जांच जैसे कदम प्रमुख हैं। खास तौर पर जुलाई में चलाए गए टीबी जांच अभियान में 1.90 करोड़ से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की गई।

जदयू के विधान पार्षद और मुख्य प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार, प्रदेश प्रवक्ता डॉ. अनुप्रिया यादव और प्रदेश प्रवक्ता चंदन कुमार सिंह ने संयुक्त प्रेस वार्ता में स्वास्थ्य विभाग की उपलब्धियों को सामने रखा। नेताओं ने कहा कि बिहार अब बीमारियों के गंभीर होने का इंतजार करने के बजाय उन्हें शुरुआती स्तर पर पहचानने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। 2 जुलाई से 31 जुलाई तक चले विशेष अभियान में 1.90 करोड़ से ज्यादा लोगों की टीबी स्क्रीनिंग हुई। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान कुल 1,90,91,155 लोगों की स्क्रीनिंग की गई।

लक्ष्य से कई गुना आगे पहुंची स्क्रीनिंग
इस अभियान को लेकर शुरुआती सरकारी लक्ष्य एक करोड़ स्क्रीनिंग का रखा गया था। अभियान के दौरान वास्तविक स्क्रीनिंग इससे काफी आगे निकल गई। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार 63,26,324 लोगों की स्क्रीनिंग का निर्धारित लक्ष्य था, जबकि जांच की संख्या 1,90,91,155 तक पहुंची। यानी राज्य ने तय लक्ष्य का करीब तीन गुना आंकड़ा पार किया। इस अभियान में जिलों के प्रदर्शन में भी बड़ा अंतर सामने आया और पटना सबसे आगे रहा।

बीमारी का इंतजार नहीं, मरीज की तलाश
जदयू नेताओं ने स्वास्थ्य विभाग की इस रणनीति को बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत बताया। उनका कहना था कि टीबी जैसी बीमारी के मामले में केवल अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों पर निर्भर रहने के बजाय संभावित मरीजों तक पहुंचकर जांच की जा रही है। इससे बीमारी की पहचान पहले हो सकती है और संक्रमित व्यक्ति का समय पर इलाज शुरू किया जा सकता है। जुलाई में बड़े पैमाने पर की गई स्क्रीनिंग इसी दिशा में उठाया गया कदम बताया गया।

अनावश्यक रेफरल पर डॉक्टरों की जवाबदेही
स्वास्थ्य व्यवस्था में दूसरा बड़ा बदलाव मरीजों को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजे जाने की व्यवस्था को लेकर है। मुख्यमंत्री की स्वास्थ्य विभाग के साथ हुई समीक्षा बैठक में 15 अगस्त से अनुमंडलीय और जिला अस्पतालों से मेडिकल कॉलेज या उच्च स्वास्थ्य संस्थानों में अनावश्यक रेफरल पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था।

जिला अस्पतालों में ही बढ़ेगी इलाज की सुविधा
जदयू नेताओं ने कहा कि सरकार का जोर जिला स्तर पर ही अधिक से अधिक इलाज उपलब्ध कराने पर है। इसी कड़ी में जिला अस्पतालों में 36 तरह के ऑपरेशन की सुविधा सुनिश्चित करने का फैसला लिया गया है। इसका सीधा फायदा उन मरीजों को मिल सकता है, जिन्हें छोटी या मध्यम स्तर की सर्जरी के लिए बड़े शहरों या मेडिकल कॉलेज अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। हाल में मुख्यमंत्री ने भी जिला अस्पतालों में 36 तरह की सर्जरी उपलब्ध कराने की बात कही थी।

डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी दूर करने पर जोर
स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता केवल अस्पताल की इमारत या मशीनों से तय नहीं होती। इसके लिए पर्याप्त डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी भी जरूरी हैं। जदयू नेताओं के मुताबिक सरकार ने अस्पतालों में डॉक्टरों और कर्मचारियों की कमी दूर करने के लिए कई स्तर पर फैसले लिए हैं और कम समय में बड़ी संख्या में पदों पर नियुक्तियां की गई हैं। इससे अस्पतालों में मरीजों को इलाज उपलब्ध कराने की क्षमता बढ़ने की उम्मीद है।

वेंटिलेटर से लेकर डायलिसिस तक सुविधाओं पर जोर
प्रेस वार्ता में अस्पतालों में जरूरी चिकित्सा सुविधाओं को मजबूत करने का भी दावा किया गया। नेताओं के मुताबिक वेंटिलेटर और डायलिसिस जैसी सुविधाओं की उपलब्धता बढ़ाने के साथ जांच की व्यवस्था को मजबूत करने पर काम हो रहा है। इसके अलावा मरीजों को 504 तरह की दवाएं मुफ्त उपलब्ध कराने का लक्ष्य भी रखा गया है। सरकार का जोर अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने के साथ इलाज और जांच को मरीजों के लिए अधिक सुलभ बनाने पर है।

104 दिनों में लिए गए फैसलों को बताया बदलाव की शुरुआत
निशांत कुमार ने 8 मई को स्वास्थ्य मंत्री के रूप में पदभार संभाला था। उस समय उन्होंने ईमानदारी से काम करने और समाज के अंतिम व्यक्ति तक इलाज की सुविधा पहुंचाने की बात कही थी। अब जदयू नेताओं ने उनके शुरुआती कार्यकाल को स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव की दिशा में उठाए गए कदमों से जोड़ते हुए सरकार की उपलब्धियां गिनाईं।

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