By लाइव आर्यावर्त टीम | Published: 22 May 2026 at 06:58 AM
सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व माना गया है। इस पवित्र माह को अधिकमास और मलमास के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह महीना भगवान विष्णु को समर्पित होता है, इसलिए इसे अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस वर्ष पुरुषोत्तम मास 17 मई से शुरू होकर 15 जून तक रहेगा।
धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु का एक नाम पुरुषोत्तम भी है। इसी वजह से अधिकमास को पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा, मंत्र जाप, व्रत और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस माह में किए गए धार्मिक कार्यों का फल कई गुना अधिक मिलता है।
हर तीन साल में क्यों आता है मलमास
हिंदू पंचांग सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर तैयार किया जाता है। सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है, जबकि चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का माना जाता है। इसी वजह से हर साल दोनों में लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है। तीन वर्षों में यह अंतर करीब 33 दिनों तक पहुंच जाता है। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए अधिकमास जोड़ा जाता है।
अधिकमास और क्षयमास में क्या अंतर है
धर्म शास्त्रों में मलमास को मुख्य रूप से दो भागों में बांटा गया है। पहला अधिकमास और दूसरा क्षयमास। अधिकमास वह स्थिति होती है जब पूरे चंद्र मास में एक भी संक्रांति नहीं पड़ती। वहीं क्षयमास बेहद दुर्लभ माना गया है, क्योंकि इसमें एक ही महीने में दो संक्रांतियां आती हैं। मान्यता है कि क्षयमास लगभग 141 वर्षों में एक बार आता है।
मलमास में शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुरुषोत्तम मास आध्यात्मिक साधना और आत्मचिंतन का समय माना जाता है। इस दौरान सांसारिक सुख-सुविधाओं और उत्सवों से दूरी बनाने की सलाह दी जाती है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य बड़े मांगलिक कार्य इस माह में नहीं किए जाते।
इस दौरान कौन से काम करना शुभ माना गया है
पुराणों में बताया गया है कि मलमास के दौरान पूजा-पाठ, गीता और पुराणों का अध्ययन, मंत्र जाप, दान-पुण्य, व्रत और ध्यान करना बेहद शुभ माना जाता है। जरूरतमंदों की सहायता करने से भी विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता है कि इस माह में भक्ति और साधना करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

